कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाब के नवनियुक्त प्रभारी सचिन पायलट आज 49 साल के हो गए हैं. 7 सितंबर 1977 को जन्मे पायलट के राजनीतिक जीवन में इस बार जन्मदिन का मौका खास है. उनके 49वें जन्मदिन से ठीक पहले कांग्रेस ने उन्हें पंजाब का प्रभारी महासचिव बनाया है. ऐसे समय में जब पंजाब कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों और अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है, पायलट के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को मजबूत करने की बड़ी जिम्मेदारी है.
पायलट का राजनीतिक सफर करीब ढाई दशक से ज्यादा का है. इस दौरान वे सांसद, केंद्रीय मंत्री, राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं. उनकी राजनीति की शुरुआत पिता राजेश पायलट की विरासत से हुई, लेकिन उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान भी बनाई.
दिग्गज नेता राजेश पायलट के पुत्र
सचिन पायलट कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट के बेटे हैं. राजेश पायलट भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट रहे थे. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी उन्होंने हिस्सा लिया था. सेना के बाद उन्होंने राजनीति का रुख किया और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए.
सचिन पायलट ने दिल्ली के एयर फोर्स बाल भारती स्कूल से पढ़ाई की. इसके बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक किया. उन्होंने आईएमटी गाजियाबाद से मार्केटिंग में डिप्लोमा और अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल से प्रबंधन की पढ़ाई की.राजनीति में आने से पहले पायलट ने कॉरपोरेट और मीडिया क्षेत्र में भी काम किया. वे बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो से जुड़े रहे और जनरल मोटर्स में भी काम किया.
राजनीति के साथ सचिन पायलट का सेना से भी खास जुड़ाव रहा है. वर्ष 2012 में वे भारतीय प्रादेशिक सेना में अधिकारी के रूप में शामिल हुए. वे प्रादेशिक सेना की 124 सिख बटालियन से जुड़े और कैप्टन बने. इस तरह पायलट की सार्वजनिक जिंदगी में राजनीति के साथ सेना और कॉरपोरेट क्षेत्र का अनुभव भी जुड़ा रहा.
दौसा से पहली बार बने सांसद
सचिन पायलट ने 2004 के लोकसभा चुनाव में दौसा से चुनाव लड़ा. महज 26 साल की उम्र में वे सांसद चुने गए. इसके साथ ही वे देश के सबसे कम उम्र के सांसदों में शामिल हुए. 2009 में उन्होंने अजमेर लोकसभा सीट से चुनाव जीता. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया. उस समय कांग्रेस ने उन्हें युवा नेतृत्व के प्रमुख चेहरों में आगे रखा.
2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी हार के बाद वर्ष 2014 में सचिन पायलट को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया. उस समय कांग्रेस विपक्ष में थी और प्रदेश में भाजपा की सरकार थी. पायलट ने अगले चार साल संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया. उन्होंने प्रदेशभर में दौरे किए और कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संपर्क बढ़ाया. 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौटी.
टोंक विधानसभा सीट से चुनाव जीतने के बाद पायलट को राजस्थान का उपमुख्यमंत्री बनाया गया. अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे.

अशोक गहलोत और सचिन पायलट ने मतभेदों को पुरानी बात बताया है
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गहलोत-पायलट मतभेद
राजस्थान की राजनीति में इसी दौर में गहलोत और पायलट के बीच नेतृत्व को लेकर मतभेद भी सामने आने लगे. 2020 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच राजनीतिक विवाद खुलकर सामने आया. पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हुए. इसके बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया.
यह पायलट के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था. इस घटनाक्रम के बाद भी वे कांग्रेस में बने रहे. पार्टी नेतृत्व की मध्यस्थता के बाद विवाद को शांत करने की कोशिश हुई, लेकिन राजस्थान में गहलोत-पायलट के बीच नेतृत्व की खींचतान लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति का अहम मुद्दा बनी रही.
राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ी भूमिका
2023 में कांग्रेस ने सचिन पायलट को राष्ट्रीय महासचिव बनाया और उन्हें छत्तीसगढ़ का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया. इसके साथ ही उनकी भूमिका राजस्थान की राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय संगठन में हो गई.
पायलट को अलग-अलग राज्यों में पार्टी के चुनावी और संगठनात्मक काम की जिम्मेदारियां भी मिलीं. केरल विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें वरिष्ठ पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी दी गई. इससे कांग्रेस संगठन में उनकी भूमिका और बढ़ी.

राहुल गांधी, गोविंद सिंह डोटासरा, टीकाराम जूली और सचिन पायलट
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पंजाब की जिम्मेदारी
5 सितंबर 2026 को कांग्रेस ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया. उन्होंने भूपेश बघेल की जगह ली है.
पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार है. कांग्रेस के सामने सत्ता में वापसी की चुनौती है और इसके साथ ही पार्टी के भीतर नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है.
पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने का सबसे अहम पहलू उनका राजस्थान का अनुभव है. 2014 से 2018 के बीच उन्होंने राजस्थान कांग्रेस को विपक्ष से सत्ता तक पहुंचाने के लिए संगठन पर काम किया था.
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