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'भूलो और माफ करो' या फिर पुरानी रार? गहलोत ने फिर खोली पायलट की मानेसर वाली 'फाइल'

मानेसर प्रकरण के बहाने अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर बयान दिया तो सियासत गरमा गई. साथ ही उनका दावा है कि 25 सितंबर 2022 की बगावत पार्टी हाईकमान के खिलाफ नहीं, बल्कि पायलट के खिलाफ थी.

'भूलो और माफ करो' या फिर पुरानी रार? गहलोत ने फिर खोली पायलट की मानेसर वाली 'फाइल'
कांग्रेस नेता सचिन पायलट पर अशोक गहलोत का बयान.

राजस्थान में अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की सियासी जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान समय-समय पर फिर उभर आती है और सुर्खियां बटोर लेती हैं. रविवार (7 जून) को गहलोत का दिया बयान इसी सियासी ड्रामे का ताजा अध्याय है. गहलोत ने 25 सितंबर 2022 के उस चर्चित घटनाक्रम का जिक्र किया,  जब उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए दिल्ली भेजने और राजस्थान की कमान सचिन पायलट को सौंपने की चर्चा जोरों पर थी. उसी दौरान करीब 100 कांग्रेस विधायकों के बगावती तेवर सामने आए थे. गहलोत ने दावा किया कि वह टकराव पार्टी हाईकमान के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस व्यक्ति के खिलाफ था, जिसे उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी चल रही थी यानी सचिन पायलट.

गहलोत ने कहा, "25 सितंबर की घटना उस व्यक्ति के खिलाफ थी, जिसका नाम अगले मुख्यमंत्री के तौर पर चल रहा था- पायलट साहब. ऐसी स्थिति बनी कि 100 विधायक एकजुट हो गए और उन्होंने कहा कि हममें से किसी को भी मुख्यमंत्री बना दो, लेकिन उस व्यक्ति को नहीं, जिसने मानेसर जाकर हमारी सरकार गिराने की कोशिश की थी. हमने पार्टी का साथ दिया, सरकार बचाई, लेकिन जिसे सरकार गिराने की कोशिश का चेहरा माना गया, उसे मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं कर सकते थे. बाद में इसे हाईकमान के खिलाफ बगावत बताकर पेश किया गया."

पायलट को बात समझनी चाहिए- गहलोत

अगर मैंने हाईकमान के खिलाफ बगावत की होती तो क्या मैं मुख्यमंत्री बना रहता?
सचिन पायलट को भी यह बात समझनी चाहिए. हम उनके दुश्मन नहीं हैं. बचपन से ही हमारे मन में उनके लिए स्नेह रहा है. चाहे सचिन हों या मेरा बेटा वैभव, जब हम सांसद थे तब ये दोनों 2-3 साल के बच्चे थे. मैं आज भी उन्हें उसी नजर से देखता हूं. लेकिन अब राजनीति में उन्हें कौन सलाह देता है, यह मुझे नहीं पता."

गहलोत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब पिछले सप्ताह पुष्कर में कांग्रेस का चिंतन शिविर आयोजित हुआ था. राजस्थान और दिल्ली के जिला अध्यक्षों के लिए आयोजित इस प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन 1 जून को राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. लेकिन पूरे शिविर की चर्चा गहलोत की गैरमौजूदगी को लेकर रही. सूत्रों के मुताबिक, पूर्व मुख्यमंत्री ने हेलिपैड पर राहुल गांधी से मुलाकात की, फिर खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए जयपुर लौट गए. इसके चलते वह पुष्कर में मुख्य कार्यक्रम के इतर हुई एक अहम बैठक में शामिल नहीं हो सके, जिसमें कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे. हालांकि गहलोत खेमे ने इन अटकलों को खारिज किया है. गहलोत समर्थकों का कहना है कि पुष्कर शिविर में राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा में पार्टी के नेता के अलावा कोई बड़ा वरिष्ठ नेता मौजूद ही नहीं था. उनके मुताबिक, किसी भी तरह की महत्वपूर्ण बैठक नहीं हुई थी. केवल एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं और जिला अध्यक्षों के साथ एक अनौपचारिक बातचीत हुई थी.

पुष्कर शिविर पर गहलोत खेमे का दावा

गहलोत खेमे का यह भी दावा है कि किशनगढ़ एयरपोर्ट पर राहुल गांधी से बातचीत के दौरान गहलोत ने स्वास्थ्य खराब होने की कोई बात नहीं कही थी. लेकिन इन सफाइयों के बावजूद पुष्कर में गहलोत की अनुपस्थिति ने राजस्थान की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस आगामी चुनावों को देखते हुए राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन पर विचार कर सकती है.

पीसीसी चीफ की दावेदारी पर अटकलें तेज 

सूत्रों का कहना है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सचिन पायलट को फिर से राजस्थान की राजनीति के केंद्र में लाया जा सकता है और उन्हें संगठन की कमान सौंपी जा सकती है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गहलोत की हालिया टिप्पणियां इसी संभावना के बीच आई हैं और उनका मकसद पुराने घावों को फिर से कुरेदना है, ताकि पार्टी को 2020 की बगावत याद दिलाई जा सके.

2020 में सचिन पायलट की बगावत के बाद जिस तरह गहलोत ने "भूल जाओ और माफ कर दो" की लाइन ली थी, उसे दोहराते हुए उन्होंने कहा, "मैंने कहा था भूलो और माफ करो. हर इंसान से गलती हो सकती है. उनसे गलती हुई और उन्हें इसे स्वीकार करना चाहिए. अगर उस समय उन्होंने मेरी भावनाओं को समझा होता, तो वे भी मेरी सलाह मानते- भूलो और माफ करो."

पायलट खेमे से फिलहाल चुप्पी 

लेकिन, राजस्थान कांग्रेस की दरारें बताती हैं कि गहलोत अभी भी 2020 की उस बगावत को भूलने के मूड में नहीं हैं, जिसने उनकी सरकार को लगभग गिरा दिया था. दूसरी तरफ, पायलट खेमे ने फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. हालांकि, उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि सचिन पायलट को किसी सफाई की जरूरत नहीं है. क्योंकि 25 सितंबर 2022 का पूरा घटनाक्रम कांग्रेस नेतृत्व के प्रतिनिधि और पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने हुआ था. खड़गे बाद में कांग्रेस अध्यक्ष बने, जबकि अशोक गहलोत राजस्थान की सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहे. 

लेकिन सवाल अब भी वही है क्या कांग्रेस राजस्थान में पुरानी लड़ाई को पीछे छोड़ पाएगी या गहलोत-पायलट की यह सियासी रार चुनाव से पहले फिर नया मोड़ लेगी? फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान कांग्रेस में सत्ता, संगठन और नेतृत्व की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. और इस सियासी पटकथा का अगला दृश्य कब सामने आ जाए, कोई नहीं जानता.

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