राजस्थान में दौसा जिले के नांगल राजावतन (नांगल प्यारीवास) में मीणा हाईकोर्ट एक स्थित है. आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर मीणा हाईकोर्ट में करीब 1 लाख लोगों के इकट्ठा होने का दावा गया. जैसे इसका नाम मीणा हाईकोर्ट है, पर इसका न्यायिक प्रणाली से कोई कानूनी संबंध नहीं है. पर मीणा हाईकोर्ट आदिवासी मीणा समाज के लिए जन अदालत व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में बहुत खास है. यह स्थान मीणा समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और पंच-पटेलों की बैठकों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है. आईए जानते हैं कि इसका इतिहास क्या है, क्यों इतनी मशहूर है?
साल 1993 से जुड़ी है कहानी
मीणा हाईकोर्ट को लेकर समझने के लिए हमें अतीत में जाना पड़ेगा. बात वर्ष 1993 की है, जब एक युवक की हत्या के मामले में प्रेम-प्रसंग की बात सामने आई. इसके बाद पांच पंच-पटेलों ने प्रेमी और प्रेमिका के खिलाफ पारंपरिक सामाजिक कार्रवाई की. बताया जाता है कि दोनों का मुंह काला किया गया. इसके बाद प्रेमी को गधे पर बैठाकर और प्रेमिका का मुंह काला कर गधे की रस्सी पकड़ाकर गांव में घुमाया गया.
पंच-पटेलों की रिहाई के लिए इकट्ठा हुआ मीणा समाज
इस घटना के सामने के बाद पुलिस और प्रशासन में हड़कंप मच गया. पुलिस ने पांच पंच-पटेलों को गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद समाज में नाराजगी बढ़ने लगी. पंच-पटेलों की गिरफ्तारी के खिलाफ समाज के लोगों ने उनकी रिहाई की मांग को लेकर लामबंदी शुरू कर दी. देखते ही देखते यह एक बड़ा सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया और बड़ी संख्या में लोग दौसा की ओर कूच कर दिए.

मामला सुलझाने के लिए बुलाए गए किरोड़ी लाल
जानकारी के मुताबिक, पंच-पटेलों की रिहाई की मांग को लेकर करीब 50 हजार लोगों की भीड़ जुटी थी. समाज के लोग अपने पंच-पटेलों की रिहाई पर अड़े रहे. इसी दौरान तत्कालीन महुवा विधायक डॉ. किरोड़ीलाल मीणा को भी बुलाया गया. उन्होंने मामले में हस्तक्षेप करते हुए समाधान का प्रयास किया. लगातार बढ़ते सामाजिक दबाव के बीच प्रशासन ने गिरफ्तार पंच-पटेलों को रिहा कर दिया. इसी घटनाक्रम के बाद प्यारीवास के इस स्थान को प्रतीकात्मक रूप से ‘मीणा हाईकोर्ट' नाम दिए जाने की बात सामने आती है.
किरोड़ी लाल मीणा ने आज विश्व आदिवासी दिवस कार्यक्रम के दौरान 33 साल पुरानी घटना का जिक्र किया है. बाबा ने बताया कि एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार दिया. पुलिस से मांग की गई कि अपराधी को पकड़ो. पर पुलिस ने ऐसा नहीं किया. इसके बाद 84 गांव के पंच-पटेलों ने अंधा फैसला दिया.

किरोड़ी लाल मीणा
समय के साथ प्रचलित हुआ मीणा हाईकोर्ट का नाम
समय के साथ ‘मीणा हाईकोर्ट' नाम इतना प्रचलित हो गया कि राजस्थान के अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मीणा समाज के लोगों के बीच भी इसकी पहचान बन गई. आज यह स्थान समाज की बैठकों और सामुदायिक विचार-विमर्श के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां पंच-पटेलों की बैठकें आयोजित होती हैं, जिनमें समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाती है. सामाजिक परंपराओं, आपसी विवादों और सामुदायिक विषयों पर विचार-विमर्श के कारण यह स्थान मीणा समाज की सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है.
मीणा हाईकोर्ट को लेकर सबसे खास बात यही है कि यह कोई संवैधानिक, सरकारी या न्यायिक न्यायालय नहीं है. यहां न न्यायाधीश बैठते हैं और न ही अदालत की तरह कानूनी फैसले सुनाए जाते हैं. ‘हाईकोर्ट' नाम पूरी तरह सामाजिक और प्रतीकात्मक पहचान से जुड़ा है. प्यारीवास का मीणा हाईकोर्ट अब केवल एक स्थान नहीं, बल्कि मीणा समाज की सामाजिक एकजुटता, परंपरा और सामुदायिक पहचान का प्रतीक बन चुका है. समय के साथ मीणा हाईकोर्ट की भूमिका भी बदलती नजर आ रही है. पारंपरिक सामाजिक बैठकों के साथ अब शिक्षा, युवाओं, रोजगार, सामाजिक विकास और समाज की नई पीढ़ी से जुड़े मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में आने लगे हैं.
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