खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को देखते हुए सरकार अब प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रही है. किसानों को रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रशिक्षण देने के साथ आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है. बारां जिले में इस योजना का दायरा लगातार बढ़ रहा है. वर्तमान में जिले के 45 क्लस्टरों में 5 हजार 6 सौ 25 किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं. कई किसान अब एक एकड़ से आगे बढ़कर बड़े रकबे में भी प्राकृतिक खेती कर रहे हैं, और बेहतर उत्पादन के साथ लागत में कमी का लाभ उठा रहे हैं.
स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर
कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक राजेश विजय ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में खेती में यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग लगातार बढ़ा है. इसके कारण मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ खाद्यान्नों में रासायनिक अवशेषों की मात्रा बढ़ रही है, जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है. कैंसर, हार्मोनल असंतुलन सहित कई गंभीर बीमारियों को बढ़ावा मिलने की आशंका बनी रहती है.
दूसरी ओर हर सीजन में यूरिया और डीएपी की मांग बढ़ने से किसानों को खाद के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ता है. कई बार समय पर खाद उपलब्ध नहीं होने से खेती प्रभावित होती है. ऐसे में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक व्यवहारिक और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है.
5 हजार से अधिक किसानों को लाभ
कृषि अनुसंधान अधिकारी दुर्गेश कुमावत ने बताया कि जिले में प्राकृतिक खेती के लिए 45 क्लस्टर संचालित किए जा रहे हैं. प्रत्येक क्लस्टर में 125 किसानों का चयन किया गया है, जिनकी कुल 50 हेक्टेयर भूमि योजना में शामिल है. प्रत्येक किसान की एक एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती का प्रदर्शन कराया जा रहा है. किसानों को विभिन्न चरणों में प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक खेती की तकनीक, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उपाय, प्राकृतिक खाद तैयार करने और फसलों की सुरक्षा के तरीके सिखाए जाते हैं. जिले में अभी कुल 5 हजार 6 सौ 25 किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ कर लाभ ले रहे है.
फसलों की लागत में आई कमी
कृषि अनुसंधान अधिकारी कुमावत ने बताया कि प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता. किसान अपने खेत और आसपास उपलब्ध संसाधनों से ही जीवामृत, बीजामृत, धनजीवामृत, पंचगव्य और वानस्पतिक काढ़ा तैयार करते हैं. इन्हें बनाने में गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन, नीम की पत्तियां, विभिन्न फलों और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है. मिश्रण फसलों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराने के साथ रोग और कीट नियंत्रण में भी प्रभावी साबित हो रहे हैं. अधिकांश सामग्री किसानों के घर या खेत में ही उपलब्ध होती है, इसलिए खेती की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आती है.
किसानों को मिल रहा अनुदान
वरिष्ठ कृषि पर्यवेक्षक चंद्रमोहन सुमन ने बताया कि योजना के तहत चयनित प्रत्येक किसान को प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए 4-4 हजार रुपए का अनुदान भी दिया जाता है. इससे किसानों का उत्साह बढ़ रहा है, और वे धीरे-धीरे अधिक क्षेत्र में प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं. विभाग की ओर से किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर, फील्ड डेमो और तकनीकी मार्गदर्शन भी उपलब्ध करवा रहा है. जिससे किसान इस पद्धति को सफलतापूर्वक अपनाकर अधिक से अधिक लाभ ले सकें.
यूरिया-डीएपी के झंझट से भी राहत
प्राकृतिक खेती से जुड़े किसान हरिपुरा निवासी संतोष गौड़, रोहित गौड़, हरीश मीणा आदि का कहना है कि प्राकृतिक खेती से जुड़ने के बाद रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च काफी कम हो गया है. पहले खाद खरीदने और यूरिया-डीएपी के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता था, लेकिन अब इस परेशानी से राहत मिली है. प्राकृतिक संसाधनों से तैयार खाद और कीटनाशकों का उपयोग करने से उत्पादन लागत घटी है, जबकि मिट्टी की सेहत में भी सुधार देखने को मिल रहा है. साथ ही फसलों का उत्पादन ओर गुणवत्ता आदि में भी काफी सुधार हुआ है. साथ ही केमिकलों के उपयोग से होने वाली बीमारियों से बचाव भी हो रहा है. ऐसे ने उनके खेतों पर बिना केमिकल के उग रही सब्जी एवं अन्य उत्पादों की खरीद के लिए भी लोग उनसे जुड़ रहे है.
(अर्जुन अरविंंद की रिपोर्ट )
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