राजस्थान सरकार के एक फैसले ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. अब पुलिस थानों की कम्युनिटी लाइजन ग्रुप यानी CLG में राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी सदस्य बन सकेंगे. गृह विभाग की ओर से 2008 के आदेश में संशोधन के बाद इस व्यवस्था का रास्ता साफ हुआ है. सरकार इसे पुलिस और जनता के बीच बेहतर समन्वय की पहल बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक दखल बढ़ाने वाला फैसला बता रहा है. पुलिस और आम जनता के बीच संवाद का सबसे अहम माध्यम माने जाने वाले कम्युनिटी लाइजन ग्रुप यानी CLG की संरचना में बड़ा बदलाव किया गया है.
राजनीतिक लोग भी बनाए जा सकेंगे CLG सदस्य
गृह विभाग की ओर से जारी संशोधित आदेश के बाद अब राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी CLG के सदस्य बनाए जा सकेंगे. नियमों के अनुसार प्रत्येक समूह में महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से कम से कम दो-दो प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य होगा. सदस्य उसी थाना या पंचायत क्षेत्र का निवासी होना चाहिए और उसका सामाजिक व नैतिक चरित्र अच्छा होना जरूरी होगा.
हालांकि सदस्यता के लिए कुछ स्पष्ट शर्तें भी तय की गई हैं. किसी भी ऐसे व्यक्ति को CLG में जगह नहीं मिलेगी, जिसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो, जो किसी अपराध में दोषी ठहराया गया हो, किसी गिरोह से जुड़ा होने का संदेह हो या जो भूमि और संपत्ति विवादों में शामिल रहा हो.
समूह के मूल उद्देश्य प्रभावित होने का खतरा
रिटायर्ड एडिशनल डीसीपी राजेंद्र त्यागी का मानना है कि राजनीतिक दलों से जुड़े लोग स्थानीय समाज में प्रभाव रखते हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति में लोगों को समझाने और माहौल शांत करने में उनकी भूमिका उपयोगी हो सकती है. लेकिन उन्होंने इसके संभावित नुकसान भी गिनाए. उनका कहना है कि यदि एक ही थाना क्षेत्र की CLG में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े पदाधिकारी शामिल होंगे तो बैठकों और फैसलों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हावी हो सकती है, जिससे समूह का मूल उद्देश्य प्रभावित होने का खतरा रहेगा.
उधर नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था पहले से चुनौती बनी हुई है. उनके मुताबिक हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. ऐसे समय में CLG में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एंट्री का फैसला पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश जैसा दिखाई देता है. CLG का काम इलाक़े में अपराध की सूचना पुलिस को देना है और लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति में पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना. देखना यह होगा यह निर्णय कितना सही साबित होता है.
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