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आमेर महल का होगा एक्सरे, सदियों पुराने रंगों का राज खोलेगी XRF मशीन

राजस्थान के संरक्षित स्मारकों में आमेर महल में पहली बार XRF तकनीक का इस्तेमाल होगा और बिना छुए भित्ति चित्रों का वैज्ञानिक परीक्षण होगा.

आमेर महल का होगा एक्सरे, सदियों पुराने रंगों का राज खोलेगी XRF मशीन
राजस्थान में पहली बार अत्याधुनिक एक्स-रे फ्लोरोसेंस मशीन से संरक्षण का काम हो रहा है
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  • राजस्थान में पहली बार धरोहरों के संरक्षण के लिए अत्याधुनिक एक्स-रे फ्लोरोसेंस मशीन का उपयोग किया जा रहा है
  • आमेर महल की भित्ति चित्रकारी से बिना छेड़छाड़ के प्राकृतिक रंगों और उनके रासायनिक तत्वों का विश्लेषण हो रहा है
  • इस तकनीक से मूल रंगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और चित्रों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता बनी रहेगी

विश्व धरोहर आमेर महल की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी को संरक्षित करने के लिए राजस्थान में पहली बार एक करोड़ रुपये कीमत की अत्याधुनिक एक्स-रे फ्लोरोसेंस (XRF) मशीन का उपयोग शुरू किया गया है. यह मशीन बिना किसी प्रकार की छेड़छाड़ या नुकसान पहुंचाए महल की दीवारों पर बने प्राकृतिक रंगों,उनके रासायनिक तत्वों और मूल संरचना का वैज्ञानिक विश्लेषण कर रही है. संरक्षण विशेषज्ञ इसे आमेर महल की ऐतिहासिक धरोहर के लिए एक बड़ा तकनीकी बदलाव मान रहे हैं जिससे सदियों पुराने रंगों का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा और संरक्षण कार्य पहले से कहीं अधिक सटीक एवं सुरक्षित होगा वही वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग विश्वभर में सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में लगातार बढ़ रहा है.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के प्रोजेक्ट मैनेजर कीर्ति पाल सिंह ने बताया की आमेर महल के सिंहपोल, गणेशपोल,भोजनशाला और मानसिंह महल में बनी ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी के संरक्षण का जिम्मा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की विशेषज्ञ टीम को सौंपा गया है. 

आमेर महल में विश्लेषण करती संरक्षकों की टीम

आमेर महल में विश्लेषण करती संरक्षकों की टीम
Photo Credit: NDTV

दिल्ली से आई विशेषज्ञों की टीम

करीब 2.32 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत पहले चरण में मल्टी स्पेक्ट्रम इमेजिंग के माध्यम से चित्रों की सूक्ष्म जांच की गई अब दूसरे चरण में दिल्ली से आई विशेषज्ञ टीम XRF तकनीक के जरिए प्राकृतिक रंगों (पिगमेंट) का वैज्ञानिक परीक्षण कर रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि सदियों पहले इन चित्रों में किन प्राकृतिक खनिजों और तत्वों का उपयोग किया गया था.

XRF तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी प्रकार का नमूना काटने,खुरचने या निकालने की आवश्यकता नहीं होती. मशीन एक्स-रे किरणों के माध्यम से चित्रों में मौजूद रासायनिक तत्वों की पहचान करती है और कुछ ही मिनटों में उनकी संरचना का विस्तृत डेटा उपलब्ध करा देती है. 

इससे यह स्पष्ट होगा कि किसी विशेष चित्र में कौन-सा प्राकृतिक रंग,धातु अथवा खनिज इस्तेमाल हुआ था और सदियों के दौरान उसमें कितना परिवर्तन आया है. इस अध्ययन से न केवल भित्ति चित्रों के संरक्षण में मदद मिलेगी,बल्कि आमेर महल की ऐतिहासिक चित्रकला और उस दौर की कलात्मक तकनीकों पर भी नए शोध के रास्ते खुलेंगे.

 परियोजना की लागत 2.32 करोड़ रुपये है

परियोजना की लागत 2.32 करोड़ रुपये है
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रंग रहेंगे सुरक्षित

इतिहास और कला संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती मूल रंगों को सुरक्षित रखना होती है. यदि सफाई या मरम्मत के दौरान गलत रसायनों का प्रयोग हो जाए तो सदियों पुरानी चित्रकला हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है. लेकिन XRF तकनीक पहले ही यह जानकारी उपलब्ध करा देगी कि किस सतह पर कौन-से रसायन सुरक्षित रहेंगे और किनसे नुकसान हो सकता है. इससे संरक्षण कार्य पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर होगा तथा मूल रंगों की चमक और पहचान बरकरार रखी जा सकेगी.

कई स्थानों पर समय के साथ भित्ति चित्रों के रंग फीके पड़ चुके हैं या उनका कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है. XRF विश्लेषण के बाद विशेषज्ञ वर्तमान में उपलब्ध रंगों की तुलना मूल प्राकृतिक रंगों से कर सकेंगे इससे री-टचिंग के दौरान वही रंग संयोजन अपनाया जाएगा जो मूल कलाकारों ने सदियों पहले प्रयोग किया था वही परिणामस्वरूप चित्रों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता बनी रहेगी और नया कार्य अलग से दिखाई भी नहीं देगा.

मशीन एक्स-रे किरणों के माध्यम से कुछ ही मिनटों में विश्लेषण कर देती है

मशीन एक्स-रे किरणों के माध्यम से कुछ ही मिनटों में विश्लेषण कर देती है
Photo Credit: NDTV

भोजनशाला में लगी मशीन

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) की डिवीज़न  साइंटिफिक ऑफिसर अंजलि शर्मा ने बताया कि फिलहाल यह अत्याधुनिक मशीन आमेर महल की भोजनशाला में कार्य कर रही है. इसके बाद गणेशपोल, सिंहपोल और मानसिंह महल के भित्ति चित्रों का भी इसी तकनीक से परीक्षण किया जाएगा. हर स्थान से प्राप्त वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर संरक्षण की अलग-अलग रणनीति तैयार की जाएगी ताकि प्रत्येक चित्र की मूल संरचना सुरक्षित रह सके.

आमेर महल अधीक्षक राकेश छोलक ने बताया किराजस्थान के संरक्षित स्मारकों में पहली बार इस स्तर पर XRF तकनीक का उपयोग हो रहा है. यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में चित्तौड़गढ़,कुंभलगढ़, जैसलमेर, रणथंभौर सहित प्रदेश के अन्य ऐतिहासिक किलों, महलों और स्मारकों की चित्रकला के संरक्षण में भी इसी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है. यह पहल राज्य में धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक विरासत के प्रभावी समन्वय की नई मिसाल बनेगी.

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