संघर्ष अगर हिम्मत में बदल जाए इंसान किसी भी सपने को हकीकत में बदल सकता है. ये महज कोई कहावत नहीं है बल्कि जिंदगी का वो फलसफा है, जिससे इंसान गांठ बांध ले तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है. ऐसी ही प्रेरित करने वाली कहानी है हार्दिक कौशल की. जिन्होंने बचपन में हुए एक दर्दनाक हादसे में दोनों हाथ गंवाने दिए. लेकिन इसके बावजूद, हार्दिक ने हाल ही में राजस्थान सिविल जज परीक्षा उत्तीर्ण की है.
#WATCH | Chandigarh: On clearing the Rajasthan Civil Judge Examination after losing both hands in an electric accident, Hardik Kaushal says, "Nothing is physically challenging; I think it's all in the mind... Whatever has happened has happened; it is all in the past. You cannot… pic.twitter.com/ptXzCcEnpI
— ANI (@ANI) January 11, 2026
हार्दिक का कहना है कि चुनौतियां ज्यादा मानसिक होती हैं, शारीरिक नहीं. हार्दिक की कहानी सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानसिक शक्ति और परिवार के अटूट समर्थन की भी कहानी है. एएनआई से बातचीत में हार्दिक ने कहा कि शारीरिक रूप से कुछ भी मुश्किल नहीं है; मुझे लगता है कि यह सब दिमाग का खेल है. जो हो गया सो हो गया; वह सब अतीत की बात है. आप उसके बारे में कुछ नहीं कर सकते।.आप जो कर सकते हैं, वह यह है कि आप अपनी ज़िंदगी कैसे जीते हैं?"
ये भी पढ़ें : फर्जी वीडियो और गुरुओं की बेअदबी के खिलाफ AAP का प्रदर्शन, BJP, कांग्रेस और अकाली दल नेताओं का किया घेराव
हार्दिक ने अपनी सफलता का श्रेय मजबूत माइंडसेट और परिवार के भरोसे को दिया, दादा की सीख हमेशा साथ रही कि लोग सवाल करेंगे, लोग आपके पास आएंगे. आपकी मानसिक शक्ति इतनी मजबूत होनी चाहिए कि आप उसे अपने ऊपर हावी न होने दें.
परिवार का भरोसा आया कितना काम
हार्दिक बताते हैं कि जब उन्होंने लिखना शुरू किया, वे 5–7 साल परिवार से दूर रहे. उन्होंने कहा कि मेरे परिवार ने कभी सवाल नहीं किया कि मैं खुद कर सकता हूं या नहीं, क्योंकि वे जानते थे कि मैं कर सकता हूं... ऐसे समर्थन के साथ आपको खुद से पूछना पड़ता है,मैं क्या कर रहा हूं? मैं खुद कर सकता हूं.”
हादसा, प्रोस्थेटिक्स और फिर कोहनियों से नई शुरुआत
सात साल की उम्र में हार्दिक एक हाई-टेंशन वायर की चपेट में आ गए थे. इस हादसे में उनकी नसों को गंभीर नुकसान पहुंचा और डॉक्टरों को दोनों हाथ अमप्यूट करने पड़े. शुरुआत में उन्होंने प्रोस्थेटिक लिम्ब्स के सहारे काम करना सीखा, मगर खाने जैसी बुनियादी चीज़ों में भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता. स्कूल में एक टीचर उन्हें पहले खाना खिलातीं, फिर खुद खातीं, यह निर्भरता उन्हें खलने लगी.
ये भी पढ़ें : कड़ाके की ठंड में मिसाल बने राजू भिखारी, गरीबों को बांटे 500 कंबल
कक्षा 6 में हार्दिक ने फैसला किया कि वे कोहनियों से लिखना और रोज़मर्रा के काम करना सीखेंगे. गर्मियों की छुट्टियों में उन्होंने खुद को कमरे में बंद कर लिया और दो महीने तक अभ्यास किया. परिवार को तब तक नहीं बताया जब तक वे पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो गए कि वे बिना प्रोस्थेटिक्स भी लिख सकते हैं. कक्षा 9 में हार्दिक ने प्रोस्थेटिक्स पूरी तरह छोड़ दिए और लिखने सहित दैनिक कामों के लिए सिर्फ़ कोहनियों पर निर्भर रहने लगे. उनकी लगन और निरंतर प्रयास ने शारीरिक दिक्कतों को पीछे छोड़ दिया और वे आगे बढ़ते रहे. आज उनकी उपलब्धि कई युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
हार्दिक की कहानी क्यों खास है?
हार्दिक की सफलता ने बताया कि चुनौतियों को मानसिक दृढ़ता से हराया जा सकता है. उनके इस सफर में परिवार का भरोसा और सकारात्मकता भी काफी काम आई. कोहनियों से लिखना और जीना सीखकर स्वयं-निर्भरता का उदाहरण पेश किया. हार्दिक ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद राजस्थान सिविल जज परीक्षा पास कर उच्च लक्ष्य हासिल किया. जो कि हम सभी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं