- हाफलोंग विधानसभा सीट पर इस बार मुख्य मुकाबला बीजेपी, कांग्रेस और एनपीपी के बीच ही नजर आ रहा है
- बीजेपी ने युवा और नया चेहरा रूपाली लंगथासा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि नंदिता गोरलोसा को टिकट नहीं मिला
- कांग्रेस ने अनुभवी और प्रभावशाली नेता नंदिता गोरलोसा को उम्मीदवार बनाकर अपनी मजबूत स्थिति जताई है
असम की इकलौती हिल स्टेशन सीट हाफलोंग पर इस बार विधानसभा चुनाव में सियासी लड़ाई बेहद दिलचस्प नजर आ रही है. यूं तो यहां से चार दलों के उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि इस विधानसभा सीट पर असल मुकाबला बीजेपी, कांग्रेस और एनपीपी के बीच सिमटता जा रहा है. नेतृत्व के चयन, दल‑बदल की आहट और पहचान से जुड़े संवेदनशील मुद्दों ने इस सीट को चुनावी मौसम की सबसे ज्यादा चर्चित और नजर रखी जाने वाली सीटों में शामिल कर दिया है.

चार उम्मीदवार मैदान में, लेकिन मुकाबला तीन दलों के बीच
असम चुनाव की हाफलोंग विधानसभा सीट पर इस बार ASDC, BJP, कांग्रेस और NPP के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से बीजेपी, कांग्रेस और एनपीपी के बीच ही रहने वाला है. कुल मिलाकर तीनों दलों ने ऐसे चेहरे उतारे हैं जिनकी अपनी‑अपनी राजनीतिक पकड़, सामाजिक स्वीकार्यता और अलग चुनावी रणनीति है, जिससे सीट पर मुकाबला बेहद रोचक बन गया है.

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बीजेपी ने युवा चेहरे पर लगाया दांव
बीजेपी ने इस सीट से रूपाली लंगथासा को उम्मीदवार बनाया है, जो फिलहाल डिमा हसाओ ऑटोनॉमस काउंसिल (MAC) की सदस्य हैं. गौर करने वाली बात ये है कि उनकी उम्मीदवारी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पार्टी ने मौजूदा कैबिनेट मंत्री नंदिता गोरलोसा को टिकट नहीं दिया. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि रूपाली लंगथासा एक फ्रेश और युवा चेहरा जरूर हैं, लेकिन अभी तक पूरे विधानसभा क्षेत्र में उनकी मजबूत जनाधार वाली पकड़ बनती नहीं दिख रही है, जो बीजेपी के लिए चुनौती बन सकती है.

कांग्रेस ने उतारी अनुभवी नेता नंदिता गोरलोसा
असम में चुनाव से पहले बड़ा सियासी मोड़ तब आया, जब कांग्रेस ने नंदिता गोरलोसा को हाफलोंग से उम्मीदवार बनाया. नंदिता गोरलोसा इससे पहले डिमा हसाओ ऑटोनॉमस काउंसिल की सदस्य रह चुकी हैं और कैबिनेट मंत्री के तौर पर भी काम कर चुकी हैं. उनकी पहचान एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में जरूर है और उनका शैक्षणिक बैकग्राउंड भी उन्हें बाकियों से अलग बनाता है. राजनीतिक हलकों में उन्हें एक मजबूत और प्रभावशाली उम्मीदवार माना जा रहा है.
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एनपीपी का जोर भूमि अधिकारों के मुद्दे पर
नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) ने इस सीट से डैनियल लंगथासा को मैदान में उतारा है. डैनियल लंगथासा डिमा हसाओ में भूमि अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाने के लिए जाने जाते हैं. स्वदेशी जमीन की सुरक्षा को लेकर उनकी मुखर भूमिका ने खासकर युवाओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें खास पहचान दिलाई है. डैनियल लंगथासा और उनकी पत्नी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी हैं, जिससे उनकी पहुंच और राजनीतिक संदेश का दायरा और बढ़ा है।

बीजेपी को झटका, कार्यकर्ताओं का झुकाव दूसरे दलों की ओर
जिले की राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है. जहां जमीनी स्तर पर यह चर्चा है कि बीजेपी के कई कार्यकर्ता और स्थानीय नेता कांग्रेस और एनपीपी की ओर रुख कर रहे हैं. ऐसे में अगर यह रुझान आगे भी जारी रहता है तो इसका असर बीजेपी की संगठनात्मक मजबूती पर पड़ सकता है. वहीं बूथ स्तर पर पकड़ कमजोर होना किसी भी करीबी मुकाबले में निर्णायक साबित हो सकता है.
जिलों के पुनर्गठन का बयान बना नया सियासी मुद्दा
हाफलोंग की राजनीति को और जटिल बनाते हुए हाल ही में असम के मुख्यमंत्री के उस बयान ने बहस छेड़ दी है, जिसमें चुनाव के बाद डिमा हसाओ को दो जिलों में बांटने की संभावना जताई गई. डिमासा स्टूडेंट्स यूनियन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है और आरोप लगाया है कि इससे सांप्रदायिक आधार पर विभाजन हो सकता है. यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है.
2010 से चला आ रहा है अलग जिले की मांग का विवाद
गैर‑डिमासा समुदायों की ओर से अलग जिले की मांग 2010 से चली आ रही है, जब नॉर्थ कछार हिल्स जिले का नाम बदलकर डिमा हसाओ किया गया था. हकीकत में यह मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील बना हुआ है और चुनाव के नजदीक आते ही फिर से जोर पकड़ रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि यह बहस मतदाताओं की सोच और मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकती है.
चुनाव की सबसे ज्यादा नजर वाली सीटों में हाफलोंग
नेतृत्व की विश्वसनीयता, पार्टी के भीतर उठापटक, जमीनी स्तर पर बदलती निष्ठाएं और पहचान से जुड़े मुद्दों के चलते हाफलोंग सीट इस बार असम चुनाव की सबसे अहम और चर्चित सीटों में शामिल हो गई है. जैसे‑जैसे मतदान नजदीक आएगा, यह सीट असम की सियासत की दिशा तय करने वाले संकेत भी दे सकती है.
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