इस बार विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो गया. इनमें सबसे अधिक चर्चा पश्चिम बंगाल की हुई जहां बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस की 15 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ डाला. इस बार बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी और बीजेपी के बीच जबरदस्त जंग छिड़ी थी जिसमें बीजेपी ने बाजी मार ली. पश्चिम बंगाल में बीजेपी को 206 और टीएमसी को 81 सीटें मिलीं. पिछली बार की तुलना में बीजेपी को 129 सीटों का फायदा हुआ और टीएमसी को 133 सीटों का नुकसान हुआ. ममता बनर्जी की पार्टी को निश्चित रूप से बंगाल में बड़ा झटका लगा. लेकिन, टीएमसी के लिए असम से सफलता की एक सुखद खबर आई जहां पार्टी ने एक सीट पर जीत पाई है.
23 सीटों पर टीएमसी ने उतारे थे उम्मीदवार
तृणमूल कांग्रेस ने इस बार असम में 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी नेता सुष्मिता देव ने मार्च में टिकटों की घोषणा के समय कहा था कि उनकी पार्टी अपने दम पर असम में सरकार तो नहीं बना सकती लेकिन पार्टी जनहित के मुद्दों को लेकर सकारात्मक भूमिका निभाना चाहती है. उन्होंने तब कहा था कि हमारा चाहे एक एमएलए हो, या दस या पंद्रह एमएलए हो, हमारे लिए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं और हमारी सफलता इस बात से आंकी जानी चाहिए कि हम इन मु्द्दों को कितने प्रभावी तरीके से उठा सकते हैं.

शर्मन अली अहमद चुनाव से एक महीने पहले TMC में शामिल हुए थे
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तृणमूल को दिलाई जीत
तृणमूल कांग्रेस ने इस बार विधानसभा चुनाव में असम की मांडिया सीट पर जीत पाई है. यह सीट पश्चिमी बरपेटा जिले की है जो अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है. मांडिया से टीएमसी उम्मीदवार शर्मन अली अहमद ने टीएमसी को जीत दिलाई. शर्मन अली ने अपने करीबी कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुल ख़ालिक़ को 27,561 मतों से मात दी.

चौथी बार विधानसभा पहुंचे
शर्मन अली चौथी बार विधायक बने हैं. इससे पहले वे अलग पार्टियों से एमएलए चुने गए थे. वह सबसे पहले 2011 में ऑल इंडिया युनाईटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (AIUDF) के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार असम की विधानसभा में पहुंचे. इसके बाद वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और 2016 और 2021 में दूसरी और तीसरी बार विधायक बने.
लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना करने के बाद पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था. इसके बाद वह एक छोटी पार्टी राइजर दल में चले गए. लेकिन जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो चुनाव से एक महीने पहले वह तृणमूल में शामिल हो गए और यह फैसला उनके लिए भी और तृणमूल कांग्रेस के लिए भी फायदेमंद साबित हुआ.
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