- विमान हादसे में अजित पवार के निधन के बाद सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनी.
- वित्त विभाग आज भी मुख्यमंत्री के पास है जबकि एनसीपी इसे अपना स्वाभाविक अधिकार मानती है और विवाद जारी है.
- सुनेत्रा पवार को NCP का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया, लेकिन पार्टी में पार्थ के प्रभाव को लेकर असहजता है.
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले छह महीने कई अप्रत्याशित घटनाओं के गवाह रहे. 28 जनवरी 2026 को अजित पवार की विमान दुर्घटना में हुई मृत्यु ने केवल एक नेता को नहीं छीना, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के पूरे नेतृत्व ढांचे को अचानक बदल दिया. तीन दिन बाद, 31 जनवरी को उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. उस समय सबसे बड़ा सवाल यही था—क्या सामाजिक कार्यों से जुड़ी एक अपेक्षाकृत गैर-आक्रामक नेता, अजित पवार जैसी तेजतर्रार राजनीतिक शैली का स्थान ले पाएंगी? छह महीने बाद तस्वीर यह है कि सुनेत्रा पवार ने अपनी राजनीति की अलग शैली गढ़ने की कोशिश की है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं.
बारामती से शुरुआत, हार के बाद भी पीछे नहीं हटीं
सुनेत्रा पवार की सक्रिय राजनीतिक यात्रा 2024 लोकसभा चुनाव से शुरू हुई, जब अजित पवार ने उन्हें बारामती से अपनी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ उम्मीदवार बनाया. चुनाव में हार मिली और बाद में स्वयं अजित पवार ने भी स्वीकार किया कि यह निर्णय राजनीतिक रूप से कठिन साबित हुआ. इसके बावजूद उन्होंने सुनेत्रा को राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया. राज्यसभा सांसद बनने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया.
एक हादसा जिसने पूरी जिंदगी बदल दी
28 जनवरी 2026 को अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु ने सब कुछ बदल दिया. परिवार शोक में था, लेकिन पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट भी था. वरिष्ठ नेताओं, बेटे पार्थ पवार और जय पवार, तथा महायुति के सहयोगी भाजपा और शिवसेना ने सुनेत्रा पवार को नेतृत्व संभालने का आग्रह किया. तीन दिन बाद उन्होंने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर पार्टी को बिखरने से बचाने की जिम्मेदारी स्वीकार की.
उस समय इस फैसले की आलोचना भी हुई कि शोक के बीच इतनी जल्दी सत्ता संभालना उचित था या नहीं, लेकिन समर्थकों का तर्क था कि राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें तत्काल निर्णय लेने पर मजबूर किया.

वित्त विभाग आज भी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
अजित पवार के पास उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्रालय भी था. उनके निधन के बाद बजट सत्र नजदीक था और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वित्त विभाग अपने पास रख लिया ताकि बजट स्वयं प्रस्तुत कर सकें. उस समय यह संदेश दिया गया कि बाद में विभाग एनसीपी को लौटाया जाएगा.
लेकिन छह महीने बाद भी वित्त विभाग मुख्यमंत्री के पास ही है. पार्टी के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल कई बार सार्वजनिक रूप से यह दावा कर चुके हैं कि वित्त विभाग एनसीपी का स्वाभाविक अधिकार है. राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार ने भी भाजपा नेतृत्व से इस विषय पर चर्चा की, लेकिन अब तक स्थिति नहीं बदली. एनसीपी के लिए वित्त मंत्रालय केवल एक विभाग नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान माना जाता है.
कम बोलने वाली नेता, यही सबसे बड़ी आलोचना
उपमुख्यमंत्री बनने के बाद सुनेत्रा पवार ने सरकारी बैठकों, संगठनात्मक कार्यक्रमों और महायुति के संयुक्त मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ उन्होंने अनेक सरकारी कार्यक्रमों में भाग लिया, लेकिन राजनीतिक विवादों पर उनकी चुप्पी लगातार चर्चा का विषय बनी रही.
आलोचकों का कहना है कि वे सरकार और पार्टी के कठिन राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर सामने नहीं आतीं. समर्थकों का तर्क है कि वह टकराव नहीं बल्कि संवाद की राजनीति में विश्वास रखती हैं.

उपमुख्यमंत्री से राष्ट्रीय अध्यक्ष तक
26 फरवरी 2026 को उन्हें सर्वसम्मति से एनसीपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया. इसके बाद संगठन की कमान उनके हाथ में आई, जबकि सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें मार्गदर्शन दिया. हालांकि, पार्टी के भीतर यह चर्चा भी रही कि कई निर्णयों पर पार्थ पवार का प्रभाव बढ़ रहा है. वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा, लेकिन संगठन के भीतर इस पर असहजता की चर्चा लगातार होती रही.
चुनाव आयोग वाला पत्र और बढ़ा विवाद
सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर अजित पवार के निधन से लेकर उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक पार्टी द्वारा लिए गए सभी फैसलों और जारी किए गए सभी आधिकारिक पत्राचार को शून्य (निरस्त) घोषित किया जाए. बाद में पार्टी पदाधिकारियों की सूची में सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल के नामों को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ. इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए. हाल ही में चुनाव आयोग ने भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की वैधता पर स्पष्टीकरण मांगा है.
कुछ फैसलों ने दिलाई राजनीतिक पहचान
- सुनेत्रा पवार ने केवल संतुलन की राजनीति ही नहीं की, बल्कि कुछ ऐसे फैसले भी लिए जिनकी राजनीतिक हलकों में सराहना हुई.
- उन्होंने पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि को आगे बढ़ाते हुए ज़ीशान सिद्दीकी को विधान परिषद भेजा, जो निर्विरोध निर्वाचित हुए.
- इसी तरह, महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष रूपाली चाकणकर को लेकर लगातार उठ रहे विवाद के बीच उन्होंने उनसे पहले महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग और बाद में पार्टी के महिला प्रकोष्ठ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा. इसे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक इच्छाशक्ति के रूप में देखा गया.
नरहरी झिरवाल के साथ मजबूती से खड़ी रहीं
एफडीए मंत्री नरहरी झिरवाल के विभाग में एसीबी की कार्रवाई और बाद में वायरल वीडियो विवाद के दौरान विपक्ष लगातार उनके इस्तीफे की मांग करता रहा. राजनीतिक हलकों में कई बार यह माना गया कि उनका इस्तीफा लगभग तय है, लेकिन सुनेत्रा पवार उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं और अंततः उन्हें पद से हटाया नहीं गया.
एक तीर से दो निशाने?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, संगठन में बढ़ती असंतुष्टि को संतुलित करने के लिए सुनेत्रा पवार ने रणनीतिक फैसले लिए. राज्यसभा के लिए प्रफुल्ल पटेल के करीबी नेता को मौका दिया गया, वहीं विधान परिषद के लिए सुनील तटकरे के बेटे को उम्मीदवार बनाया गया. दोनों निर्विरोध चुने गए. इससे वरिष्ठ नेतृत्व को संदेश भी गया और संगठनात्मक संतुलन भी बना रहा.
पहले स्थापना दिवस पर सख्त संदेश
अजित पवार के निधन के बाद आयोजित एनसीपी के स्थापना दिवस पर सुनेत्रा पवार ने स्पष्ट कहा कि पार्टी हित सर्वोपरि रहेगा, कार्यकर्ताओं को अवसर मिलेगा और आवश्यकता पड़ने पर वह "अजितदादा की तरह कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटेंगी." उन्होंने शिव-शाहू-फुले-आंबेडकर की विचारधारा और यशवंतराव चव्हाण के विकास मॉडल पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराया. कार्यक्रम के दौरान अजित पवार का उल्लेख करते हुए वह भावुक भी हो गईं.
'गूंगी गुड़िया' विवाद और संयमित प्रतिक्रिया
हाल के दिनों में महाराष्ट्र कांग्रेस ने उन्हें "गूंगी गुड़िया" कहकर निशाना बनाया. राज्यभर में एनसीपी कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए, लेकिन सुनेत्रा पवार की प्रतिक्रिया केवल एक वाक्य में सीमित रही—"समय आने पर जवाब दूंगी." उनके समर्थक इसे संयम बताते हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक झिझक का प्रमाण मानते हैं.
क्या वह अजित पवार बन पाएंगी? शायद यही सबसे गलत सवाल है
अजित पवार अपनी तेज, आक्रामक और स्पष्टवादी राजनीति के लिए जाने जाते थे. सुनेत्रा पवार का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग है. उन्होंने पति को खोने के गहरे व्यक्तिगत दुख के बीच एक साथ सरकार और पार्टी—दोनों की जिम्मेदारी संभाली. वह रोज़ सीख रही हैं, निर्णय ले रही हैं और अपनी राजनीतिक शैली विकसित कर रही हैं.
उनके सामने वित्त विभाग वापस लाना, पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखना, वरिष्ठ नेताओं का विश्वास मजबूत करना और जनता के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करना जैसी बड़ी चुनौतियां हैं.
महाराष्ट्र की राजनीति अब यह नहीं देख रही कि सुनेत्रा पवार, अजित पवार जैसी बन पाती हैं या नहीं. असली परीक्षा यह है कि क्या वह "सुनेत्रा पवार" के रूप में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बना पाएंगी. इसका जवाब आने वाले महीनों और उनके राजनीतिक फैसलों में छिपा है.
यह भी पढ़ें - गूंगी गुड़िया बताने पर सुनेत्रा पवार का जवाब- समय आने पर बोलूंगी; फडणवीस की पत्नी ने क्या कहा
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं