संसद परिसर में राम मंदिर में हुई कथित चंदा चोरी को लेकर बीते दिनों निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने जो ड्रामा किया था, उसे लेकर अब उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. वाराणसी में FIR हो चुकी है, प्रयागराज कोर्ट ने समन भेज दिया है और बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने भी दिल्ली पुलिस ने शिकायत दर्ज करवाई है. इस बीच पप्पू यादव ने अपने खिलाफ केस होने पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि 'स्पीकर के आदेश के बिना आप केस कैसे कर सकते हैं? कोई लॉ नहीं है क्या?'
VIDEO | Monsoon Session: Independent MP Pappu Yadav (@pappuyadavjapl) says, "Without the Speaker's order, how can you file a case, it is a matter of Parliament, the daughter of Sushma Swaraj is there only to file cases against Rahul Gandhi, the Prayagraj court has given a notice,… pic.twitter.com/e0VpdU4m7h
— Press Trust of India (@PTI_News) August 5, 2026
किस केस की बात कर रहे पप्पू यादव?
31 जुलाई को संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने राम मंदिर में कथित चंदा चोरी को लेकर एक स्किट किया था. इसमें पप्पू यादव साधु के भेष में आए थे. विपक्षी सांसद उन्हें चंदा देते हैं और उसके बाद वह दान पेटी लेकर भागने लगते हैं.
विपक्षी सांसदों के इस प्रदर्शन को बीजेपी ने सनातन का अपमान बताया है. इस मामले में वाराणसी में पप्पू यादव, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अयोध्या से सपा सांसद अवधेश प्रसाद के खिलाफ FIR दर्ज की गई है.
🔴#BREAKING| पप्पू यादव ने नाटकीय मंचन के तौर पर संसद में किया विरोध प्रदर्शन #MonsoonSession | #PapuYadav | @vikasbha | @BabaManoranjan pic.twitter.com/zn5jww9Upb
— NDTV India (@ndtvindia) July 31, 2026
प्रयागराज कोर्ट ने भी इस मामले में पप्पू यादव को समन जारी किया है और 11 अगस्त को पेश होने का आदेश दिया है. वहीं, बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने भी पप्पू यादव और राहुल गांधी के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.
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क्या सांसद पर नहीं हो सकता केस?
सांसदों को कुछ छूट और विशेषाधिकार जरूर मिले हैं, लेकिन ये पूरी तरह से असीमित नहीं है. कुछ मामलों में सांसदों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.
लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को संसद के अंदर 'कहने' की छूट मिली हुई है. अगर सांसद सदन में कुछ कहते हैं तो उस पर न तो कोई केस दर्ज किया जा सकता है और न ही कोई अदालत कार्यवाही शुरू कर सकती है.
संविधान का अनुच्छेद 105 कहता है कि सांसद के पास संसद के नियम और आदेश के अधीन रहते हुए संसद में 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' रहेगी.

अनुच्छेद 105(2) कहता है कि संसद या उसकी किसी समिति के सामने किसी सांसद की कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी भाषण को लेकर उसके खिलाफ किसी भी अदालत में कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती.
संविधान में यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि सांसद बिना किसी बाहरी डर, केस या कानूनी कार्रवाई के डर के जनता के मुद्दों को खुलकर और बेबाकी से सदन में रख सकें.
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तो कब हो सकती है FIR?
सांसदों को विशेषाधिकार जरूर मिले हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें सदन या संसद में कुछ भी करने की छूट है.
संविधान और संसदीय नियम सांसदों को सिर्फ सिविल मामलों में थोड़ी छूट देते हैं, लेकिन क्रिमिनल मामलों में नहीं. सिविल मामलों में भी सिर्फ गिरफ्तारी से ही छूट मिलती है, लेकिन क्रिमिनल मामलों में ये छूट भी नहीं मिलती. सिविल मामलों में भी गिरफ्तारी से छूट पूरी तरह असीमित नहीं है.
इसके अलावा, संसद के अंदर दिया गया कोई बयान या कृत्य करने पर कोई केस नहीं हो सकता. लेकिन संसद परिसर में सांसद कुछ करता है तो क्रिमिनल केस दर्ज कराया जा सकता है. उदाहरण के लिए, 2023 में जब बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने विवादित बयान दिया था और ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठा था तो तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि 'अगर किसी भाषण में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है तो इम्यूनिटी के तहत उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती.'
लेकिन अगर कोई सांसद संसद के भीतर गंभीर आपराधिक कृत्य करता है या रिश्वत लेता है तो FIR भी हो सकती है और मुकदमा भी चल सकता है. मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि 'रिश्वत लेना एक अपराध है और इसे संसदीय विशेषाधिकारों के तहत छूट नहीं दी जा सकती.'
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फिर स्पीकर की इजाजत कब?
संसद के अंदर का बॉस लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा के सभापति ही होते हैं. अगर संसद परिसर के भीतर कोई कानूनी कार्रवाई करनी है तो उसके लिए ही स्पीकर की इजाजत लेनी होगी.
कानूनन सांसदों को सिविल मामलों में ही गिरफ्तारी से छूट है. नियम के मुताबिक, किसी भी सांसद को संसद सत्र शुरू होने से 40 दिन पहले, संसद सत्र के दौरान और संसद सत्र खत्म होने के 40 दिन बाद तक सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. हालांकि, क्रिमिनल मामले में गिरफ्तारी में ऐसी छूट नहीं मिलती है. किसी क्रिमिनल मामले में संसद परिसर से बाहर गिरफ्तारी हो रही है तो स्पीकर को बस सूचना देनी होती है.

संसदीय नियमों के तहत, संसद परिसर के भीतर से किसी सांसद की गिरफ्तारी बगैर स्पीकर की इजाजत के नहीं होगी. अगर किसी सांसद को संसद परिसर के बाहर से गिरफ्तार या हिरासत में लिया जाता है या कोई अदालत सजा सुनाती है तो इसकी जानकारी तुरंत स्पीकर को देनी होगी.
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फिर संसद के अंदर क्या कार्रवाई हो सकती है?
अगर कोई सांसद सदन या संसद परिसर में कोई आपत्तिजनक कृत्य करता है तो उस पर सदन के स्पीकर कार्रवाई कर सकते हैं. लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति चाहें तो ऐसे सांसद को सदन से कुछ दिन या पूरे सत्र के लिए निलंबित कर सकते हैं.
अगर मामला गंभीर है तो इसे विशेषाधिकार हनन कमेटी के पास भेजा जा सकता है. कमेटी जांच करती है और सिफारिश देती है. कमेटी की सिफारिश के आधार पर सदन के स्पीकर या सभापति कार्रवाई कर सकते हैं.
विशेषाधिकार हनन पर सांसद को न सिर्फ अपनी सदस्यता गंवानी पड़ सकती है, बल्कि जेल भी जाना पड़ सकता है. 1978 में एक मामले में इंदिरा गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पास हुआ था. तब स्पीकर ने उन्हें निष्कासित कर दिया था और एक दिन के लिए जेल भी भेज दिया था. इससे पहले 1976 में सुब्रमण्यम स्वामी की भी सदस्यता चली गई थी.
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