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अजित पवार की चिता की आग ठंडी होने से पहले शपथ चौंकाने वाला-सामना

शिवसेना (उद्धव) के मुखपत्र सामना में आज दिवंगत अजित पवार पर संपादकीय प्रकाशित किया गया है. अखबार ने कई मुद्दों को उठाया है.

अजित पवार की चिता की आग ठंडी होने से पहले शपथ चौंकाने वाला-सामना
लोकभवन में शपथ लेतीं सुनेत्रा पवार (फाइल फोटो)
मुंबई:

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में चल रहे घटनाक्रम और अजित पवार के निधन के बाद बदली राजनीतिक तस्वीर को लेकर शिवसेना (उद्धव) ने अपने मुखपत्र ‘सामना' के संपादकीय के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर तीखा हमला बोला है. संपादकीय में इसे महाराष्ट्र की राजनीति का 'बेहद घटिया दौर' करार देते हुए बीजेपी नेतृत्व, विशेषकर अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस पर साजिशनुमा राजनीति करने का आरोप लगाया गया है.

सामना के अनुसार, अजित पवार के मन में अपने चाचा शरद पवार के प्रति सम्मान और आत्मीयता थी, इसी भावना से दोनों राष्ट्रवादी दलों के संभावित विलय की चर्चा और प्रक्रिया शुरू हुई थी. जिला परिषद चुनावों के बाद इस पर अंतिम फैसला होना तय माना जा रहा था, लेकिन उससे पहले ही अजित पवार का आकस्मिक निधन हो गया. संपादकीय का कहना है कि अजित पवार के जाने से पवार परिवार ही नहीं, बल्कि पूरी महाराष्ट्र की राजनीति में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है, और इस उलझन को सुलझने न देना ही कई राजनीतिक शक्तियों का स्वार्थ बन गया है.

सामना में साफ तौर पर कहा गया है कि एनसीपी के विलय या टूट की राजनीति में प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे की भूमिका संदिग्ध है और उन्हें यह विलय स्वीकार नहीं है. संपादकीय के मुताबिक, यह पूरा घटनाक्रम अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस के 'एजेंडे' के तहत आगे बढ़ाया गया है.

अजित पवार के निधन के तुरंत बाद सुनेत्रा पवार द्वारा उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने को लेकर भी सामना ने कड़ी टिप्पणी की है. संपादकीय में कहा गया है कि महाराष्ट्र अभी अजीत पवार के निधन के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि बीजेपी की राजनीतिक चालों ने राज्य को दूसरा झटका दे दिया. अजित पवार की चिता की आग ठंडी होने से पहले ही शपथ ग्रहण समारोह होना, कई लोगों के लिए असहज और चौंकाने वाला रहा.

हालांकि सामना ने यह भी स्वीकार किया है कि महाराष्ट्र को पहली महिला उपमुख्यमंत्री मिली हैं और इसके लिए बधाई दी जानी चाहिए, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या यह पद किसी राजनीतिक कर्तृत्व और क्षमता के आधार पर मिला है, या फिर यह सत्ता की अंदरूनी खींचतान का नतीजा है.

संपादकीय में यह आरोप भी लगाया गया है कि सुनेत्रा पवार को शपथ ग्रहण की जानकारी तक परिवार को नहीं दी गई और वे अपने दोनों बेटों के साथ चुपचाप राजभवन पहुंचीं. सामना ने इसे संवेदनहीन राजनीति बताते हुए कहा कि खुद अजित पवार की भाषा में कहें तो, 'फिलहाल राजनीति बेहद घटिया हो गई है,' और इसके सूत्रधार बीजेपी का मौजूदा नेतृत्व है.

सामना ने हिंदुत्व और ‘सूतक' (शोक) के मुद्दे को उठाते हुए लिखा है कि जब घर में शोक का वातावरण हो, तब इस तरह का शपथ ग्रहण समारोह बीजेपी की कथित सनातनी विचारधारा से भी मेल नहीं खाता. हकीकत यह है कि अजित पवार के जाने के बाद पार्टी में नेतृत्व का शून्य पैदा हो गया और इसी का फायदा उठाकर कई लोगों की महत्वाकांक्षाएं उफान पर आ गईं.

संपादकीय में एनसीपी की स्थिति को 'खुले समुद्र में बिना कप्तान की नाव' की संज्ञा दी गई है. सामना का कहना है कि नाव का इंजन भले ही फडणवीस के पास हो, लेकिन इसका रिमोट कंट्रोल भी उन्हीं के हाथ में है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सुनेत्रा पवार इस राजनीतिक तूफान में पार्टी को संभाल पाएंगी.

भविष्य की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए सामना ने लिखा है कि 2029 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी शत-प्रतिशत अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और उससे पहले शिंदे गुट और अजित पवार गुट के कई विधायक बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. उस समय सुनेत्रा पवार की असली परीक्षा होगी. संपादकीय के अंत में कहा गया है कि सुनेत्रा पवार अगर ‘गूंगी गुड़िया' बनकर नहीं, बल्कि प्रभावी नेतृत्व के साथ काम करती हैं, तो पार्टी के भीतर कई नेताओं की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया है कि सुनेत्रा पवार, अजीत पवार नहीं हैं. उपमुख्यमंत्री पद अगर सिर्फ दिखावे तक सीमित रहा, तो यह उनके लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित होगा. इस तरह सामना के संपादकीय ने एनसीपी में चल रही उठापटक और उसमें भाजपा की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हुए महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति पर तीखा प्रहार किया है.

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