महाराष्ट्र की सियासत में जून 2026 का महीना एक नए और बेहद संगठित राजनीतिक बदलाव का गवाह बना है. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसदों का एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होना महज एक दलबदल नहीं, बल्कि 'ऑपरेशन टाइगर' नाम के एक बेहद गुप्त और सुनियोजित मिशन की सफलता है. राजनीतिक गलियारों से लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया तक में अब यह बात खुलकर सामने आ रही है कि इस पूरे ऑपरेशन के असली सूत्रधार और मास्टरमाइंड सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे हैं. साल 2022 के ऐतिहासिक विधायक विभाजन के चार साल बाद हुए सांसदों के इस बड़े उलटफेर को अंजाम देने के लिए डॉ. श्रीकांत शिंदे ने लगभग एक साल तक पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बुनी. शिवसेना के स्थापना दिवस पर खुद वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने भी यह स्वीकार किया है कि 'ऑपरेशन टाइगर' की सफलता में डॉ. श्रीकांत शिंदे की बड़ी भूमिका रही है. उन्होंने दिल्ली से लेकर मुंबई तक कानूनी और सांगठनिक स्तर पर इस पूरे अभियान की कमान संभाली, जिसने उन्हें अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया है.
स्थापना दिवस पर रामदास कदम का बड़ा बयान और मांग
शिवसेना के स्थापना दिवस के मौके पर पार्टी के वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने मंच से इस पूरे घटनाक्रम पर एक बड़ा खुलासा किया. रामदास कदम ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि "ऑपरेशन टाइगर को सफल बनाने में जितना योगदान एकनाथ शिंदे का है, उतना ही महत्वपूर्ण योगदान श्रीकांत शिंदे का भी है." उन्होंने आगे मांग करते हुए कहा कि "अब समय आ गया है कि पार्टी में श्रीकांत शिंदे की जिम्मेदारी और बढ़ाई जाए तथा उन्हें शिवसेना का राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाए." रामदास कदम का मानना है कि पार्टी संगठन को मजबूत करने और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में श्रीकांत शिंदे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके चलते उन्हें यह बड़ी सांगठनिक जिम्मेदारी मिलनी ही चाहिए. जब रामदास कदम मंच से यह बात कह रहे थे, तब डॉ. श्रीकांत शिंदे ने विनम्रता से हाथ जोड़ लिए, जबकि शिवसेना के मुख्य नेता और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी इस पर मुस्कुराते नजर आए.
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पर्दे के पीछे काम करने वाले नेता
डॉ. श्रीकांत शिंदे की राजनीतिक शैली हमेशा से अपेक्षाकृत शांत और संगठन केंद्रित रही है. वे आमतौर पर सुर्खियों से दूर रहकर संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान देते हैं. लेकिन इस बार उन्होंने सीधे तौर पर नेतृत्व की भूमिका निभाई और उद्धव ठाकरे खेमे के असंतुष्ट सांसदों के साथ संवाद स्थापित करने का काम अपने हाथ में लिया. सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन टाइगर की नींव लगभग एक वर्ष पहले रखी गई थी. इस दौरान डॉ. शिंदे ने उन सांसदों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा जो महाविकास आघाड़ी में अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर असहज महसूस कर रहे थे. बताया जाता है कि इस पूरी रणनीति की जानकारी पार्टी के बेहद सीमित और भरोसेमंद नेताओं तक ही सीमित रखी गई थी.
दिल्ली से मुंबई तक पूरी रणनीति की निगरानी
ऑपरेशन टाइगर के दौरान दिल्ली और मुंबई के बीच कानूनी तथा राजनीतिक स्तर पर लगातार समन्वय बनाए रखने की जिम्मेदारी भी डॉ. श्रीकांत शिंदे के पास थी. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Om Birla) से मुलाकात के लिए समय निर्धारण, सांसदों के दस्तावेजों की तैयारी, संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन तथा मीडिया की नजरों से बचते हुए पूरे अभियान को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है. जब छह सांसदों ने अलग समूह बनाकर बाद में शिंदे शिवसेना में शामिल होने की प्रक्रिया शुरू की, तब यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था बल्कि लंबे समय से चल रही राजनीतिक तैयारी का परिणाम था.
सांसदों का विश्वास जीतने की रणनीति
डॉ. श्रीकांत शिंदे ने यह समझ लिया था कि महाविकास आघाड़ी में कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) के बढ़ते प्रभाव के कारण शिवसेना (यूबीटी) के कई सांसद स्वयं को हाशिये पर महसूस कर रहे थे. इन सांसदों को लग रहा था कि पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका सीमित होती जा रही है और संगठनात्मक स्तर पर उनकी बातों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा. ऐसे समय में डॉ. शिंदे ने संवाद, समन्वय और राजनीतिक आश्वासन के माध्यम से इन नेताओं का विश्वास जीतने का प्रयास किया. यही कारण माना जा रहा है कि छह सांसदों ने अंततः इतना बड़ा राजनीतिक निर्णय लेने का साहस दिखाया.
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ऑपरेशन सिंदूर से ऑपरेशन टाइगर तक
डॉ. श्रीकांत शिंदे ने हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान मजबूत की है. संसद में विभिन्न मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखने और पार्टी संगठन को मजबूत करने के प्रयासों ने उन्हें युवा नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑपरेशन टाइगर की सफलता ने यह साफ कर दिया है कि डॉ. श्रीकांत शिंदे केवल चुनाव जीतने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि वे संगठन निर्माण, राजनीतिक प्रबंधन और रणनीतिक निर्णयों में भी प्रभावी भूमिका निभाने की क्षमता रखते हैं.
महाराष्ट्र की राजनीति में नया शक्ति केंद्र?
2022 में विधायकों के विद्रोह ने महाराष्ट्र की राजनीति बदल दी थी. चार साल बाद 2026 में सांसदों के इस बड़े घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं. इस पूरे अभियान में डॉ. श्रीकांत शिंदे की भूमिका ने यह संकेत दिया है कि शिवसेना के भविष्य के संगठनात्मक ढांचे और राष्ट्रीय विस्तार में उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है. ऑपरेशन टाइगर की सफलता के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया सवाल तेजी से उठ रहा है—क्या डॉ. श्रीकांत शिंदे अब केवल एक सांसद नहीं, बल्कि शिवसेना के अगले दौर की राजनीति के प्रमुख रणनीतिकार और शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहे हैं?
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