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'जीवन के आखिरी पड़ाव पर अहंकार की लड़ाई'... बॉम्बे HC ने 90 साल की महिला का मानहानि केस 20 साल के लिए टाला

Mumbai News: बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस जैन ने कहा कि यह उन मामलों में से एक है जहां जीवन के अंतिम पड़ाव पर पक्षकारों के बीच अहंकार की लड़ाई सिस्टम को जाम कर देती है. इससे अदालत उन मामलों को नहीं ले पाती जिन्हें वास्तव में प्राथमिकता की आवश्यकता है.

'जीवन के आखिरी पड़ाव पर अहंकार की लड़ाई'... बॉम्बे HC ने 90 साल की महिला का मानहानि केस 20 साल के लिए टाला
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मानहानि के मुकदमे को 20 साल के लिए टाला. (AI इमेज)
  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने मानहानि के मुकदमे को अहंकार की लड़ाई बताते हुए इसे न्यायिक व्यवस्था के लिए बाधा माना
  • जस्टिस जितेंद्र एस. जैन की एकल पीठ ने मामले को अगले बीस वर्षों तक सुनवाई के लिए स्थगित करने का आदेश दिया
  • यह मुकदमा 2017 में तारिणीबेन ने ध्वनि देसाई के खिलाफ 20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग के साथ दायर किया था
मुंबई:

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मानहानि के मुकदमे पर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे अहंकार की लड़ाई बताया. कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों के बीच "अहंकार की लड़ाई" न्यायिक व्यवस्था को बाधित कर रही है. जस्टिस जितेंद्र एस. जैन की एकल पीठ ने मंगलवार को आदेश दिया कि इस मामले को अगले 20 सालों तक सुनवाई के लिए न लिया जाए और इसे साल 2046 के बाद के लिए सूचीबद्ध कर दिया.

20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग

यह मुकदमा 90 साल की तारिणीबेन 57 साल के ध्वनि देसाई ने साल 2017 में किल्किलराज भंसाली और अन्य के खिलाफ दायर किया था. मामला 2015 में 'श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी' की वार्षिक आम बैठक AGM के दौरान हुई कथित घटनाओं से जुड़ा है. पिटीशनर्स का दावा है कि उन घटनाओं से उन्हें मानसिक उत्पीड़न और कष्ट हुआ, जिसके बदले उन्होंने ब्याज सहित 20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है.

अहंकार की लड़ाई ने सिस्टम को जाम किया

जस्टिस जैन ने कहा, "यह उन मामलों में से एक है जहां जीवन के अंतिम पड़ाव पर पक्षकारों के बीच अहंकार की लड़ाई सिस्टम को जाम कर देती है. इससे अदालत उन मामलों को नहीं ले पाती जिन्हें वास्तव में प्राथमिकता की आवश्यकता है.” अदालत ने पहले सुझाव दिया था कि बिना शर्त माफी मांगकर इस विवाद को सुलझाया जा सकता है. लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि 90 वर्षीय वादी अभी भी मानहानि के मुकदमे को आगे बढ़ाने पर अड़ी हुई हैं.

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केस को अगले 20 सालों तक हाथ में न लिया जाए

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल 'सुपर सीनियर सिटीजन' होने के नाते इस मामले को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए. न्यायमूर्ति ने अपने आदेश में कहा, "मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता, सिवाय इसके कि इस मामले को अगले 20 सालों तक हाथ में न लिया जाए, इसे 2046 के बाद के लिए लिस्ट करें."

इससे पहले 27 मार्च, 2025 को एक अन्य पीठ ने चेतावनी दी थी कि यदि पिटीशनर के वकील अगली तारीख पर पेश नहीं हुए, तो मामले को खारिज कर दिया जाएगा. साल 2019 में भी कोर्ट ने वादियों को गवाहों की सूची और संबंधित दस्तावेज जमा करने का समय दिया था, लेकिन विवाद सुलझने के बजाय लंबा खिंचता गया.

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