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देश में अब भी बारिश की कमी, झमाझम मॉनसून से भी नहीं हुई पूरी; बना हुआ है सूखे का खतरा?

अगर मानसून किसी इलाके में लम्बे समय तक कमज़ोर रहता, तो इससे महत्वपूर्ण खरीफ फसलों की बुआई की साइकिल प्रभावित होने का खतरा होता है.

देश में अब भी बारिश की कमी, झमाझम मॉनसून से भी नहीं हुई पूरी; बना हुआ है सूखे का खतरा?
  • जुलाई में मॉनसून की बारिश में सुधार हुआ है, लेकिन अगले कुछ दिनों में बारिश की तीव्रता कम होने का अनुमान है
  • भारत मौसम विभाग अप्रैल और मई में मॉनसून की लंबी अवधि का दो बार पूर्वानुमान जारी करता है
  • मॉनसून की असामान्य बारिश से खरीफ फसलों को नुकसान या सिंचाई संकट जैसे गंभीर परिणाम हो सकते हैं
नई दिल्ली:

इस मॉनसून सीजन के दौरान बारिश की कमी 10 जुलाई को पिछले 24 घंटे में 1% बढ़कर 15% हो गई. जाहिर है, जुलाई में मॉनसून की स्थिति में सुधार आयी है, लेकिन अगले कुछ दिन फिर बारिश की तीव्रता कम होने का अनुमान है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन जून से सितम्बर महीने तक चलता है. इस दौरान होने वाली बारिश के पूर्वानुमान के बारे में भारत मौसम विभाग दो बार लंबी अवधि का पूर्वानुमान जारी करता है.

मॉनसून सीजन के दौरान होने वाली बारिश का पहला लंबी अवधि का पूर्वानुमान (Long Range Forecast) अप्रैल के मध्य में जारी किया जाता है, जबकि लंबी अवधि के पूर्वानुमान का दूसरा चरण मॉनसून सीजन शुरू होने के ठीक पहले मई के आखिरी हफ्ते में जारी किया जाता है.

इस फोरकास्ट रिपोर्ट में भारत मौसम विभाग पिछले 50 साल के मानसून सीजन के दौरान होने वाली औसत बारिश को आधार बनाकर बारिश का पूर्वानुमान जारी करता है. उदाहरण के लिए, इस साल 15 अप्रैल को जारी पहले लंबी अवधि का पूर्वानुमान रिपोर्ट में भारत मौसम विभाग ने फोरकास्ट जारी की, जिसमें इस साल जून से सितंबर, 2026 के बीच देशभर में लंबी अवधि का पूर्वानुमान का 92 फ़ीसदी बारिश होने की संभावना है.
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केरल में मॉनसून के पहुंचने की घोषणा करने के दौरान भारत मौसम विभाग 2016 में अपनाए गए नए मानदंडों का इस्तेमाल करता है. ये मानदंड केरल और आसपास के इलाकों के 14 स्टेशनों पर रोज़ाना होने वाली बारिश, हवा की स्थिति और दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के ऊपर आउटगोइंग लॉन्गवेव रेडिएशन (OLR) पर आधारित हैं.

भारत मौसम विभाग मॉनसून की बारिश में कमी या बढ़ोतरी के आंकलन के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाता है.

देशभर में फैले मौसम केंद्र, मौसम विज्ञान के मॉडर्न तकनीक की मदद से मॉनसून की दिशा और दशा पर नज़र रखते हैं. इसमें शामिल हैं:

  • सतह और ऊपरी हवा से जुड़े मौसम संबंधी आंकड़ों की लगातार निगरानी
  • सैटेलाइट और रडार जैसी रिमोट सेंसिंग तकनीकों का इस्तेमाल करके मॉनसून की रियल-टाइम निगरानी
  • अलग-अलग मौसम संबंधी चार्ट का विश्लेषण
  • अलग-अलग जगह पर मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए तैयार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वेदर फोरकास्टिंग मॉडल्स

खरीफ फसलों के लिए पूरे मॉनसून के दौरान एक समान अंतराल पर होने वाली बारिश को अच्छा माना जाता है. लंबे समय तक होने वाली सामान्य तीव्रता वाली बारिश मिट्टी में नमी बनाए रखने में मददगार होती है. मॉनसून सीजन के दौरान हल्की और मध्यम बारिश से फसलों को लगातार पानी और नमी मिलती रहती है. इससे ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करने में भी मदद मिलती है.

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अगर मानसून किसी इलाके में लम्बे समय तक कमज़ोर रहता, तो इससे महत्वपूर्ण खरीफ फसलों की बुआई की साइकिल प्रभावित होने का खतरा होता है. विशेषकर उन इलाकों में जहां सिंचाई के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसानों को मुश्किल झेलना पड़ सकता है.

अगर किसी क्षेत्र में कम समय में मॉनसून के ज़्यादा सक्रिय होने की वजह से बारिश बहुत ज़्यादा होती है तो इससे फसल को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है. मॉनसून के बहुत ज़्यादा सक्रिय होने से बाढ़ और दूसरे कई तरह की आपदाओं का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे खरीफ फसलों को काफी नुकसान पहुंचता है.

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