- मुंबई की अगली महापौर सामान्य वर्ग की महिला होंगी, यह फैसला महाराष्ट्र शहरी विकास विभाग की लॉटरी से हुआ है
- बीएमसी में अनुसूचित जनजाति के केवल दो पार्षद हैं, इसलिए ST आरक्षण नियमों के अनुसार लागू नहीं होगा
- उद्धव ठाकरे गुट ने लॉटरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाया और नियमों में बदलाव का विरोध किया है
मुंबई की 74 हज़ार करोड़ वाली महापालिका की कुर्सी पर सामान्य वर्ग की एक महिला मेयर बैठेगी, इसका फैसला लॉटरी से हो चुका है. मुंबई की अगली महापौर सामान्य वर्ग की एक महिला होंगी. गुरुवार को महाराष्ट्र शहरी विकास विभाग द्वारा आयोजित लॉटरी के बाद ये तय हो गया है. हालांकि वो महिला कौन होगी ये साफ नहीं है, गेंद BJP और शिवसेना के पाले में है. ये दोनों दल मिलकर तय करेंगे कि किसका नाम फाइनल किया जाए.
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उद्धव गुट के हाथ से गया 'किंगमेकर' बनने का मौका
बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद किसी भी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा थोड़ा धुंधला है.चर्चा थी कि इस बार मेयर की कुर्सी ST (अनुसूचित जनजाति) के लिए आरक्षित हो सकती है. मज़ेदार बात ये है कि बीएमसी में एसटी कैटेगरी के केवल दो ही पार्षद जीते हैं, और वो दोनों ही उद्धव ठाकरे गुट के हैं.
सत्ता के गलियारों में चर्चा तेज थी कि अगर लॉटरी में मेयर पद एसटी के लिए निकलता, तो उद्धव गुट के पास 'किंगमेकर' बनने का मौका होता. पर इसमें एक तकनीकी पेंच भी दिखा, नए नियम के अनुसार किसी भी आरक्षण कैटेगरी के लिए कम से कम तीन सदस्य होना अनिवार्य है, वरना आरक्षण लागू नहीं होगा. चूंकि मुंबई में ST कैटेगरी के सिर्फ दो ही सदस्य हैं, इसलिए बीएमसी में ST आरक्षण लागू नहीं होगा.
उद्धव गुट ने किया लॉटरी के नियमों का विरोध
उद्धव गुट का आरोप है कि लॉटरी की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. उनका आरोप है कि सत्ताधारी गठबंधन महायुति ने अपने हिसाब से नियमों को मोड़ने की कोशिश की. इस प्रक्रिया का शिवसेना (यूबीटी) नेता और मुंबई की पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर ने विरोध किया, जिन्होंने दावा किया कि इस निर्णय पर पहुंचने के लिए नियमों को किसी को सूचित किए बिना बदल दिया गया. उन्होंने कहा कि पिछले दो महापौर सामान्य वर्ग से थे, इसलिए नए महापौर को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग से होना चाहिए था. पेडनेकर ने कहा कि लॉटरी की प्रक्रिया जिस तरह से संचालित की गई, उसकी निंदा की जाती है.
सामान्य वर्ग की महिला बनेगी मुंबई की मेयर
मुंबई महानगरपालिका में “सामान्य वर्ग महिला” आरक्षण आने से मुंबई की राजनीति की बिसात पूरी तरह बदल गई है. सामान्य वर्ग का मतलब है कि अब मेयर की रेस में जातिगत बाध्यता खत्म हो गई है. उद्धव ठाकरे गुट को उम्मीद थी कि आरक्षण OBC या ST के लिए निकलेगा.
बीएमसी में केवल 2 पार्षद अनुसूचित जनजाति (ST) के हैं और दोनों उद्धव गुट के हैं. अगर लॉटरी ST के लिए निकलती, तो उद्धव गुट का मेयर बनना लगभग तय था. उद्धव गुट का आरोप है कि 'सामान्य' वर्ग रखकर उनके हाथ से मौका छीन लिया गया. बीजेपी के पास महिला पार्षदों की एक लंबी फौज है जो सामान्य वर्ग से आती हैं.
बीजेपी किसे बनाएगी मुंबई की मेयर?
बीजेपी के पास 89 पार्षद हैं, जिनमें बड़ी संख्या में अनुभवी महिला नेता हैं. सामान्य वर्ग होने से पार्टी अपने सबसे प्रभावशाली और प्रशासनिक रूप से सक्षम चेहरे को आगे कर सकती है. बीजेपी को बहुमत के लिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना (29 पार्षद) की जरूरत है. सामान्य वर्ग होने से दोनों पार्टियों के बीच सहमति का चेहरा ढूंढना आसान हो गया है, क्योंकि उम्मीदवारों का विकल्प बहुत बड़ा है.
उधर लॉटरी निकलते ही बीजेपी के भीतर मेयर पोस्ट की दावेदारी ने ज़ोर पकड़ लिया है. सियासी गलियारों में सबसे ऊपर नाम अलका केरकर का है, जो तीन बार की पार्षद और पूर्व उपमहापौर रह चुकी हैं. बीजेपी के कोर ग्रुप और संगठन के बेहद करीब होने के कारण उनका पलड़ा भारी माना जा रहा है. लेकिन मुकाबला कड़ा है. रितू तावडे और राजश्री शिरवाडकर जैसे अनुभवी चेहरे भी रेस में मजबूती से डटे बताए जा रहे हैं. पार्टी अब एक ऐसे चेहरे की तलाश में है जो न केवल प्रशासनिक अनुभव रखता हो, बल्कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले मुंबई के 'मराठी बनाम गैर-मराठी' कार्ड को भी बखूबी बैलेंस कर सके.
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