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उज्जैन में सांची से भी बड़ा स्तूप! 350 फीट के टीले का 2000 साल पुराना रहस्य खोलेगी ASI, 1939 में रोकी थी खुदाई

मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित वैश्य टेकरी में सांची से भी बड़े 2000 साल पुराने बौद्ध स्तूप के दफन होने के संकेत मिले हैं. मजदूरों के बेहोश होने के बाद 1939 में रुकी इसकी खुदाई एएसआई एक बार फिर शुरू करने जा रही है. जिससे 2000 साल पुराना रहस्‍य सामने आ सकता है.

उज्जैन में सांची से भी बड़ा स्तूप! 350 फीट के टीले का 2000 साल पुराना रहस्य खोलेगी ASI, 1939 में रोकी थी खुदाई
Ujjain sanchi stupa Vaishya tekri asi excavation 2000 years old mystery.

नौ दशकों से मध्य प्रदेश के सबसे बड़े पुरातात्विक रहस्यों में से एक उज्जैन के बाहरी इलाके में एक विशाल टीले के नीचे सबकी नजरों के सामने छिपा हुआ है. यह सांची के स्तूप से बड़ा हो सकता है, 2,000 वर्ष से भी अधिक पुराना हो सकता है और संभव है कि इसका संबंध उस दौर से हो जब सम्राट अशोक उज्जैन से जुड़े हुए थे. लेकिन वैश्य टेकरी के नीचे वास्तव में क्या है, यह आज तक निश्चित रूप से कोई नहीं जानता, क्योंकि इसे जानने की आखिरी गंभीर कोशिश 1939 में अचानक रोक दी गई थी.

सीएम यादव ने दिया खोज और अध्‍ययन पर जोर 

अब मध्य प्रदेश एक बार फिर इस रहस्य की परतें खोलना चाहता है. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस स्थल की नए सिरे से खोज और अध्ययन पर जोर दिया है. राज्य सरकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI के साथ मिलकर वैश्य टेकरी की व्यवस्थित खुदाई की संभावना पर काम कर रही है. ब्रिटिश काल की एक पुरातात्विक रिपोर्ट में इस स्थल के भीतर मौजूद संरचना को "अब तक ज्ञात सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप" बताया गया था.

350 फीट चौड़ा और 100 फीट ऊंचा है टीला  

1938-39 की खुदाई के दौरान दर्ज किए गए आंकड़े असाधारण थे. जिस विशाल टीले के भीतर मुख्य स्तूप होने का अनुमान लगाया गया था, उसका व्यास लगभग 350 फीट और ऊंचाई कम से कम 100 फीट आंकी गई थी. तुलना करें तो सांची के महान स्तूप का व्यास करीब 120 फीट और ऊंचाई लगभग 54 फीट है. अगर, आधुनिक और वैज्ञानिक खुदाई में शुरुआती अनुमान सही साबित होते हैं, तो वैश्य टेकरी मध्य भारत में प्राचीन बौद्ध इतिहास की हमारी समझ को ही बदल सकती है. लेकिन, ASI किसी संभावना को खुदाई से पहले इतिहास का स्थापित तथ्य मानने को तैयार नहीं है.

सांची से भी बड़ा स्तूप होने के संकेत 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संयुक्त महानिदेशक नंदिनी भट्टाचार्य ने NDTV से कहा कि टीले की बनावट, पुरानी रिपोर्टों और यहां से मिले पुरातात्विक संकेतों को देखकर यह संभावना जरूर बनती है कि यहां सांची से भी बड़ा स्तूप मौजूद हो सकता है. लेकिन उन्होंने साफ किया कि जब तक वैज्ञानिक खुदाई नहीं होती, इसे निश्चित तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता.

सम्राट अशोक और उनकी पत्‍नी से कनेक्‍शन 

पुरातत्वविदों के लिए यह फर्क बेहद महत्वपूर्ण है. परंपरागत मान्यताएं वैश्य टेकरी को मौर्य काल और अशोक से जोड़ती हैं. माना जाता है कि सम्राट बनने से पहले अशोक उज्जैन के प्रशासक या राज्यपाल रहे थे. कुछ विवरणों में यहां बौद्ध स्मारक के निर्माण को अशोक की पत्नी देवी से भी जोड़ा गया है, जो विदिशा के एक समृद्ध नगरश्रेष्ठी की पुत्री थीं.

कनकगिरि विहार से भी जोड़ा जाता है नाता 

कुछ विद्वानों ने वैश्य टेकरी को बौद्ध परंपराओं में वर्णित कनकगिरि विहार से भी जोड़ा है. इससे भी अधिक दिलचस्प संभावना यह है कि यह वही विशाल स्तूप हो सकता है जिसका वर्णन सदियों बाद चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किया था. हालांकि, इनमें से कोई भी संबंध अभी निर्णायक रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है. इतना जरूर निश्चित है कि 1938-39 में जब पुरातत्वविदों ने वैश्य टेकरी में खुदाई शुरू की, तो उन्हें बेहद असामान्य संरचना मिली.

एक मुख्य स्तूप और दो छोटे स्तूपों के अवशेष मिले थे 

तत्कालीन रिपोर्ट में एक विशाल गोलाकार टीले का वर्णन किया गया है, जिसके चारों ओर आयताकार धंसा हुआ क्षेत्र था. आंशिक खुदाई में एक मुख्य स्तूप और दो छोटे स्तूपों के अवशेष सामने आए थे. मुख्य संरचना की निर्माण शैली भी सामान्य स्तूपों से अलग थी. इसका भीतरी हिस्सा स्थानीय मुरम को बेहद सघन तरीके से दबाकर तैयार किया गया था, जबकि बाहरी हिस्से पर मिट्टी के गारे से जुड़ी बड़ी ईंटों की परत थी. आधार में कटोरे जैसी चिनाई भी मिली, जिसके बारे में माना गया कि वह विशाल टीले के बाहर की ओर पड़ने वाले दबाव को रोकने के लिए बनाई गई थी.

निर्माण पद्धति को बताया गया था असामान्य 

पुरानी रिपोर्ट में इस निर्माण पद्धति को "असामान्य" बताते हुए कहा गया था कि ऐसी तकनीक अन्यत्र देखने को नहीं मिली. पुरातत्वविदों के वहां पहुंचने से पहले ही बाहरी ईंटों का बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका था. माना गया कि समय और बारिश के साथ ऊपरी हिस्सा भी बह गया होगा. इसी कारण दो सबसे बड़े सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं. स्तूप की मूल ऊंचाई वास्तव में कितनी थी और उसकी पूरी वास्तु योजना कैसी थी? फिर खुदाई अचानक रुक गई.

90 साल से सिर्फ टीला बनकर रही गई वैश्‍य टेकरी 

उस दौर के अभिलेखों के मुताबिक, खुदाई के दौरान गैस से जुड़ी एक घटना हुई जिसमें वहां काम कर रहे मजदूर बेहोश हो गए. इसके बाद काम बंद कर दिया गया और उत्खनन को उसके तार्किक निष्कर्ष तक कभी नहीं पहुंचाया जा सका. करीब 90 वर्षों से वैश्य टेकरी फिर से सिर्फ एक विशाल टीला बनकर रह गई.  

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खुदाई-संरक्षण में 40 करोड़ खर्च करेगी सरकार 

उज्जैन के संभागायुक्त आशीष सिंह ने NDTV को बताया कि जिस जमीन पर यह पुरातात्विक स्थल फैला है, वह पूरी तरह निजी स्वामित्व में है. खुदाई-संरक्षण के लिए जमीन अधिग्रहित करने पर करीब 40 करोड़ खर्च होने का अनुमान है. इसका प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है. सिंह के मुताबिक, प्रशासन राज्य और केंद्रीय पुरातत्व विभागों के साथ समन्वय कर रहा है और अगर खुदाई को मंजूरी मिलती है तो आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा.

क्‍या महाकाल की नगरी प्राचीन और विशाल बौद्ध स्मारकों का घर? 

यानी वैश्य टेकरी के अगले अध्याय का फैसला केवल कुदाल और खाइयों से नहीं होगा. खुदाई शुरू होने से पहले भूमि अधिग्रहण, संरक्षण योजना, मौसम, जमीन की स्थिति और वैज्ञानिक उत्खनन की पूरी पद्धति पर काम करना होगा. करीब नौ दशक से जमीन के नीचे दबा यह रहस्य अब फिर सामने आने की प्रतीक्षा में है. अगर शुरुआती संकेत सही निकले, तो उज्जैन केवल महाकाल की नगरी ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के सबसे विशाल बौद्ध स्मारकों में से एक का घर भी साबित हो सकता है.

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