Girbala Singh Case: मध्यप्रदेश में एक अभूतपूर्व स्थिति सामने आई है, जहां रिटायर्ड जिला जज और उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग भोपाल-2 की अध्यक्ष गिरिबाला सिंह, गिरफ्तारी और जेल जाने के 15 दिन बाद भी अपने पद पर बनी हुई हैं. एक्ट्रेस ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़े दहेज प्रताड़ना मामले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के बावजूद उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लंबित है. सरकार और आयोग के बीच पत्राचार जारी है, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है. इस मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था, कानूनी प्रक्रिया और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
गिरफ्तारी के बाद भी कुर्सी बरकरार
गिरिबाला सिंह को सीबीआई ने दहेज प्रताड़ना और मौत के मामले में गिरफ्तार किया था, जिसके बाद से वह जेल में हैं. इसके बावजूद वह अभी भी उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग भोपाल-2 की अध्यक्ष पद पर बनी हुई हैं. यह स्थिति इसलिए असामान्य मानी जा रही है क्योंकि आमतौर पर किसी अधिकारी की गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर विभागीय कार्रवाई शुरू हो जाती है.
सरकार और आयोग के बीच फंसा मामला
खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने 20 मई 2026 को आयोग के रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर गिरिबाला सिंह की नियुक्ति, अर्हता, कार्यकाल और पद से हटाने की प्रक्रिया से संबंधित रिपोर्ट मांगी थी. हालांकि अब तक आयोग की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं मिलने के कारण कार्रवाई अटकी हुई है. सूत्रों का कहना है कि शासन को आवश्यक जानकारी भेजी जा चुकी है, लेकिन निर्णय लंबित है.
मंत्री ने दोहराई वही बात, निर्णय टला
राज्य के मंत्री गोविंद राजपूत ने इस मामले में कहा कि आयोग से रिपोर्ट मांगी गई है और उसके आधार पर ही आगे की कार्रवाई होगी. हालांकि विपक्ष और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि इतने गंभीर मामले में निर्णय लेने में देरी क्यों हो रही है.
दहेज प्रताड़ना और संदिग्ध मौत का मामला
गिरिबाला सिंह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80(2), 85, 3/5 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज किया गया है. उनकी बहू ट्विशा शर्मा की 12 मई को संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी, जिसके बाद यह मामला सामने आया. पहले उन्हें निचली अदालत से अग्रिम जमानत मिली थी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया, जिसके बाद सीबीआई ने गिरफ्तारी की.
पहली बार बना ऐसा मामला
यह मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार है कि एक न्यायिक पृष्ठभूमि की अधिकारी जेल में रहते हुए भी किसी संवैधानिक पद पर बनी हुई है. इससे न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी बहस छिड़ गई है.
सुविधाओं का भी बना हुआ अधिकार
उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष को सरकारी वाहन, ड्राइवर, माली और कुक जैसी सुविधाएं मिलती हैं. जब तक औपचारिक रूप से पद से हटाया नहीं जाता, तब तक इन सुविधाओं का अधिकार बना रहता है, जो इस मामले में भी चर्चा का विषय बना हुआ है.
आयोग की चुप्पी पर सवाल
राज्य उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष जस्टिस सुनीता यादव से इस मामले में संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. इस चुप्पी ने मामले को और जटिल बना दिया है.
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