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13 साल की उम्र से मंच पर, तीजन बाई की कभी न भुलाई सकेगी ये कहानी

छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को देश-दुनिया में पहुंचाने वाली पद्म विभूषण डॉ तीजन बाई का 70 साल की उम्र में निधन हो गया.

पुरुषों के वर्चस्व वाली 'कापालिक शैली' को चुनने वाली देश में थीं पहली महिला .
  • पंडवानी को क्षेत्रीय लोक परंपरा से अंतरराष्ट्रीय स्तर की लोककला बनाया.
  • पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला है.
  • उनके निधन पर राष्ट्रपति-पीएम मोदी ने जताया दुख.

छत्तीसगढ़ की संस्कृति को देश के कोने-कोने और विदेशों तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया. वह 70 वर्ष की थीं. वह पंडवानी गायन के लिए जानी जाती थीं. कला के क्षेत्र में इतने बड़े योगदान देने के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया था. वह देश की ऐसी भी पहली महिला थीं, जिन्होंने वेदमती शैली के साथ कापालिक शैली को भी चुना, जिसमें सिर्फ पुरुषों का वर्चस्व था. मात्र 13 साल की उम्र में ही उन्होंने मंच पर कला का प्रदर्शन शुरू कर दिया था और देखते ही देखते वह काफी विख्यात हो गईं.

जब तीजन बाई ने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया, तब उस समय महिलाएं केवल बैठकर पंडवानी गाती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता है. तीजन बाई पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली 'कापालिक शैली' को चुना और खड़े होकर दमदार आवाज में प्रदर्शन करना शुरू किया.

छत्तीसगढ़ की लोककला को अंतरराष्ट्रीय दर्जा दिलाया

डॉ तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गांव में हुआ था और  'पारधी' अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं. अपनी दमदार आवाज, मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति और भावपूर्ण प्रस्तुति शैली के लिए प्रसिद्ध तीजन बाई ने पंडवानी को एक क्षेत्रीय लोक परंपरा से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित लोककला का दर्जा दिलाया.

teejan bai padma award

पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला है, जिसमें महाभारत के प्रसंगों को प्रभावशाली कथा-वाचन, लोकगायन और संगीत के साथ जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनकी प्रस्तुतियों ने देश-विदेश के दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया और इसी के साथ उनका नाम देश के सबसे सम्मानित एवं लोकप्रिय लोक कलाकारों में शामिल हो गया.

नाना की सुनाई कहानियां हो गईं याद

बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी को छत्तीसगढ़ी हिंदी में महाभारत की कहानियां गाते सुनकर उन्हें ये कहानियां याद हो गई थीं, जिसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी लिया.

भारतीय लोककलाओं में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने भी उन्हें कई बार सम्मान दिया है. उन्हें साल 1988 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. फिर 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया. इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि भी दी गई थी.

राष्ट्रपति और पीएम मोदी ने जताया दुख

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, "प्रख्यात पंडवानी कलाकार तीजन बाई के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है. उन्होंने अपनी सशक्त आवाज, प्रभावशाली उपस्थिति और अनोखी प्रस्तुति से महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत किया. अपनी विलक्षण प्रतिभा, समर्पण और वर्षों की साधना से उन्होंने छत्तीसगढ़ की समृद्ध पंडवानी परंपरा को देश-विदेश में पहचान दिलाई. भारतीय सांस्कृतिक विरासत का प्रसार करने में उनका अमूल्य योगदान स्मरणीय रहेगा. मैं उनके प्रियजनों और प्रशंसकों के प्रति गहन संवेदनाएं व्यक्त करती हूं."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट किया, "सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई के निधन से अत्यंत दुख हुआ है. उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई. उनका जाना कला और संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है. शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं. ओम शांति."

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