अमेरिकी सेना की वापसी और तालिबान की सत्ता में वापसी के 5 सालों के बाद अफगानिस्तान आज ऐसा मुल्क बनकर रह गया है, जहां मानवाधिकार नाम की कोई चीज नहीं है.
अफगानिस्तान कभी अमेरिकी विदेश नीति का अहम हिस्सा था. 20 साल तक चले युद्ध में अमेरिका ने 2.3 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए थे. अब इसी अफगानिस्तान में लाखों बच्चे भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं. महिलाओं और लड़कियों से उनके सबसे बुनियादी अधिकार छीन लिए हैं.
तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से इंटरनेशनल डोनर ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली मानवीय सहायता में भारी कटौती की है, जिसकी जरूरत वहां की लगभग 45% आबादी को है. अमेरिका ने भी अपनी फंडिंग में बड़ी कटौती कर दी है. इस कटौती का सबसे बुरा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ा है. आज के समय में अफगानिस्तान महिलाओं के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक जगहों में से एक है.
24 लाख लड़कियों की पढ़ाई छूटी
अफगानिस्तान अब दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहां लड़कियों को छठी क्लास के बाद पढ़ाई करने की इजाजत नहीं है. यह पाबंदी इतने लंबे समय से लागू है कि लड़कियों की एक बहुत बड़ी आबादी किशोरावस्था में आ चुकी हैं और उनमें से किसी ने भी कभी सेकंडरी स्कूल की क्लास में कदम नहीं रखा.
सत्ता में आने के बाद मार्च 2022 में तालिबान ने लड़कियों के सेकंडरी स्कूल में जाने पर रोक लगा दी थी. इसके बाद दिसंबर 2022 में यूनिवर्सिटी में पढ़ने पर भी पाबंदी लगा दी थी. तालिबान का कहना था कि यह सब अस्थायी है लेकिन 5 साल से ये रोक बदस्तूर जारी है.

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UNESCO का अनुमान है कि अभी 24 लाख लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही हैं. एजेंसी का कहना है कि महिलाओं की सेकंडरी और हायर एजुकेशन पर लगी रोक के कारण 2066 तक 6 लाख अफगानी महिलाएं वर्कफोर्स से बाहर हो सकती हैं. इससे कुल मिलाकर 9.6 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है और कम उम्र में शादी का खतरा बढ़ सकता है.
UNESCO का कहना है कि अफगानिस्तान में 10 साल से ज्यादा उम्र के 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं, जो एक सिंपल सी लाइन भी नहीं पढ़ सकते. यहां साक्षरता दर सिर्फ 37% है.
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घर की चहारदीवारी में कैद महिलाएं
तालिबान के सत्ता में आने का सबसे ज्यादा खामियाजा महिलाओं और लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है.
तालिबान ने न सिर्फ महिलाओं को पढ़ने से रोका, बल्कि नौकरी करने से भी रोक दिया. महिलाएं घर से बाहर बिना चेहरा ढंके नहीं निकल सकतीं. और तो और अगर लंबी यात्रा पर जाना है तो पुरुष साथी का होना जरूरी है.

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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, अब आधी महिलाएं महीने में सिर्फ एक या दो बार ही घर से बाहर निकलती हैं. अकेलेपन की इस स्थिति के कारण महिलाएं मानसिक रूप से टूट रही हैं. UN का कहना है कि 10 में से 7 महिलाएं अब अपने मानसिक स्वास्थ्य को 'खराब' या 'बहुत खराब' बताती हैं.
भुखमरी की कगार पर पहुंचा अफगानिस्तान
तालिबान के राज में अफगानिस्तान भुखमरी की कगार पर भी पहुंच गया है. 'सेव द चिल्ड्रन' नाम की संस्था की एक रिपोर्ट बताती है कि हर 10 में से एक अफगानी बच्चा गंभीर रूप से कुपोषित है.
UNICEF का अनुमान है कि इस साल एक करोड़ से ज्यादा बच्चों को मानवीय मदद की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बजट में कटौती के कारण लगभग 600 मेडिकल सेंटर बंद हो गए हैं.

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CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानियों के पास अब काम के लिए बहुत ज्यादा मौके नहीं रह गए हैं. महिलाओं के काम करने पर लगी पाबंदी के कारण घरों की कमाई कम हुई है.
तालिबान ने सत्ता में आने के बाद अफीम के उत्पादन पर भी रोक लगा दी है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, तालिबान के आने के बाद से अफीम के उत्पादन में 95% की गिरावट आई है. जबकि, पहले अफीम ग्रामीण आय का बहुत बड़ा जरिया था. संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि अफीम पर रोक के बाद अब मेथम्फेटामाइन जैसी सिंथेटिक ड्रग्स का उत्पादन और तस्करी बढ़ सकती है.
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