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सीहोर का ‘रूठिया साम्राज्य’: क्या ब्रिटेन के 'किंग चार्ल्स' लौटाएंगे सेठ जुम्मा लाल से 1917 में लिया कर्ज?

Sehore Ruthia Family: सीहोर के प्रतिष्ठित रूठिया परिवार का 109 साल पुराना इतिहास और ब्रिटिश हुकूमत को दिए गए 35 हजार रुपये के कर्ज की पूरी कहानी दिलचस्प है. अफीम के व्यापार से लेकर 1000 एकड़ जमीन के साम्राज्य तक, जानिए कैसे अब चौथी पीढ़ी अंग्रेजों से अपनी ऐतिहासिक उधारी का हिसाब मांगने की तैयारी में है.

सीहोर का ‘रूठिया साम्राज्य’: क्या ब्रिटेन के 'किंग चार्ल्स' लौटाएंगे सेठ जुम्मा लाल से 1917 में लिया कर्ज?

Sehore Ruthia Family British Government Loan:मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की गलियों में आज भी एक ऐसा नाम गूंजता है, जिसका रसूख कभी सात समंदर पार तक महसूस किया गया था. यह कहानी है रूठिया परिवार की है, जिसने अफीम के व्यापार से लेकर रियल एस्टेट तक अपना साम्राज्य फैलाया. इस परिवार का इतिहास इतना रसूखदार है कि कहा जाता है कि जिस ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, वह हुकूमत आज भी सीहोर की एक पुरानी फाइल की कर्जदार है. करीब 109 साल पहले, यानी 1917 में, जब दुनिया प्रथम विश्व युद्ध के दौर से गुजर रही थी, तब सीहोर के मशहूर रईस सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का कर्ज दिया था. उस जमाने में यह रकम इतनी बड़ी थी कि इससे कई आलीशान हवेलियां खड़ी की जा सकती थीं. आज एक सदी बीत जाने के बाद भी वह कर्ज सरकारी कागजों और धूल भरी अलमारियों में दबा हुआ है. अब इस विरासत की चौथी पीढ़ी के सदस्य विवेक रूठिया उस ऐतिहासिक उधारी का ब्याज समेत हिसाब मांगने की कानूनी तैयारी कर रहे हैं.

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अफीम के व्यापार से खड़ा किया 1000 एकड़ का साम्राज्य

रूठिया परिवार की असली पहचान और रसूख के केंद्र में थे सेठ जुम्मा लाल रूठिया. वे महज़ एक व्यापारी नहीं, बल्कि अपने समय के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में शुमार थे. उनके पास अफीम की खेती और व्यापार का सरकारी लाइसेंस था, जो ब्रिटिश काल में न केवल भारी मुनाफे बल्कि सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक माना जाता था. सेठ जुम्मा लाल का व्यापारिक नेटवर्क मध्य प्रदेश के सीहोर, राजगढ़, शुजालपुर और भोपाल से लेकर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कलकत्ता (अब कोलकाता) तक फैला हुआ था. कपास की खरीद, ऑयल मिल और अनाज के थोक व्यापार के दम पर उन्होंने लगभग 1000 एकड़ कृषि भूमि का विशाल साम्राज्य खड़ा किया था.

सीहोर की 30% बसाहट और 1 रुपये के किराये का विरोधाभास

स्थानीय दावों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, सीहोर शहर का एक बहुत बड़ा हिस्सा—लगभग 30 प्रतिशत—कभी न कभी इसी रूठिया परिवार की जमीनों पर विकसित हुआ है. आज भी इंदौर, सीहोर और भोपाल के प्राइम लोकेशन पर परिवार की कई संपत्तियां मौजूद हैं. हालांकि, समय के साथ इन संपत्तियों के साथ कई अजीबोगरीब स्थितियां भी जुड़ीं. आज के दौर में जहां जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं इस परिवार की कई संपत्तियों पर पुराने किरायेदार महज 1 रुपये से लेकर 500 रुपये के मासिक किराये पर दशकों से काबिज हैं. कई संपत्तियों पर मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है, तो कई एकड़ जमीन सेठ जुम्मा लाल ने समाज सेवा और परोपकार के लिए दान कर दी थी.

ये हैं सेठ जुम्मा लाल रुठिया...जिन्होंने अंग्रेजी सरकार को 1917 में कर्ज दिया था

ये हैं सेठ जुम्मा लाल रुठिया...जिन्होंने अंग्रेजी सरकार को 1917 में कर्ज दिया था

1917 का वो कर्ज और लंदन तक दस्तक की तैयारी

खबरों में इस परिवार का नाम फिर से तब उछला जब 1917 के उस कर्ज का जिक्र हुआ. विवेक रूठिया के अनुसार, उनके पूर्वज सेठ जुम्मा लाल से ब्रिटिश सरकार ने 35 हजार रुपये बतौर कर्ज लिए थे. परिवार का दावा है कि इसके पुख्ता दस्तावेज आज भी उनके पास सुरक्षित हैं. विवेक रूठिया अब इस ऐतिहासिक दावे को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर 1917 की उस राशि का आज के हिसाब से मूल्यांकन किया जाए और उस पर एक सदी का ब्याज जोड़ा जाए, तो यह रकम करोड़ों-अरबों में पहुंच सकती है. यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक साख का है जो एक भारतीय परिवार ने वैश्विक महाशक्ति के सामने कायम की थी.

परंपरा से आधुनिकता की ओर बढ़ता परिवार

सेठ जुम्मा लाल के बाद उनके पुत्र मानकचंद रूठिया ने कमान संभाली, जिनके तीन पुत्रों में से बड़े बेटे विनोद का निधन एक दुर्घटना में हो गया था. वर्तमान में विनय और विवेक रूठिया इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि आज यह परिवार चकाचौंध और प्रचार से दूर रहना पसंद करता है, लेकिन उन्होंने अपने पारंपरिक व्यापार को आधुनिक रुख दिया है. होटल व्यवसाय, पेट्रोल पंप, वेयरहाउसिंग और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में उनकी सक्रियता आज भी बरकरार है. सीहोर की बदलती तस्वीर के बीच, रूठिया परिवार की यह कहानी उस अधूरे पन्ने जैसी है, जिसका आखिरी फैसला अब कानूनी चौखट पर होना बाकी है.
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