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₹10 की गड़बड़ी का आरोप, 25 साल पहले हुए नौकरी से बर्खास्त; 21 साल तक लड़ी कानूनी जंग तो कोर्ट ने लौटाई इज्जत

Madhya Pradesh High Court: नारायण नायर की कहानी हैरान करने वाली है, जहां ₹10 के आरोप पर उनकी नौकरी छीन ली गई. 21 साल की कानूनी लड़ाई के बाद, हाईकोर्ट ने उन्हें न्याय दिया और रेलवे की याचिका खारिज कर दी. अब उन्हें उनकी नौकरी भी मिल गई है.

₹10 की गड़बड़ी का आरोप, 25 साल पहले हुए नौकरी से बर्खास्त; 21 साल तक लड़ी कानूनी जंग तो कोर्ट ने लौटाई इज्जत
रेलवे कर्मचारी के खिलाफ नहीं मिला कोई भी गवाह.

Madhya Pradesh High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में रेलवे कर्मचारी नारायण नायर की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है. करीब 21 साल से न्याय की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारी को आखिरकार राहत मिल गई. मामला एक मामूली ₹10 के कथित गड़बड़ी से जुड़ा था. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक भावनात्मक और चौंकाने वाले फैसले ने उजागर किया है कि किस तरह एक रेलवे बुकिंग क्लर्क को एक मामूली आरोप के आधार पर नौकरी से निकाल दिया गया और फिर उसे खुद को निर्दोष साबित करने में दो दशक लग गए. इस पूरी कहानी के केंद्र में हैं नारायण नायर.

4 जनवरी 2002 से शुरू होती है कहानी

यह बात 4 जनवरी 2002 की है, जब श्रीधाम रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर पर  नायर ड्यूटी पर थे. उस समय भीड़ थी और लंबी-लंबी लाइन के बीच अफरा-तफरी का माहौल था. उसी दौरान अचानक विजिलेंस की टीम एक डिकॉय यात्री के साथ पहुंच गई. उसने आरोप लगाया था कि नायर को ₹31 वापस करने थे, लेकिन उन्होंने ₹21 ही लौटाए और 10 रुपये बचा लिए. इस आरोप में नायर बार-बार एक ही बात कहते रहे “भीड़ थी… गलती हो सकती है.”

बिना सुनवाई के ही किया बर्खास्त

उनकी उस समय किसी ने नहीं. न तो उनकी सुनी गई और न उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया गया. फिर कार्रवाई भी हो गई और नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए. वर्षों की नौकरी, सिर्फ एक झटके में ही खत्म हो गई और वो भी सिर्फ ₹10 के आरोप में.

निजी रकम, टिकट बंडल... ऐसे किया अन्याय

विजिलेंस टीम ने यह भी कहा कि उनके पास ₹450 अतिरिक्त मिले. नायर ने बताया कि यह उनकी निजी रकम थी, जो उन्होंने अपनी बीमार पत्नी की दवा के लिए रखी थी. लेकिन यह सफाई भी दरकिनार कर दी गई. 

फिर एक और आरोप जुड़ गया कि काउंटर पर टिकटों का एक बंडल मिला. नायर ने कहा कि वह जमीन पर पड़ा था, उन्हें उसकी जानकारी नहीं थी. फिर भी इसे भी उनके खिलाफ सबूत बना दिया.

आंकड़ों में की थी गड़बड़ी

गड़बड़ी सिर्फ आरोपों में नहीं थी, आंकड़ों में भी थी. पहले कहा गया कि 778 रुपये अतिरिक्त मिले. बाद में जांच में यही रकम घटकर सिर्फ ₹7 रह गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. नौकरी चली गई और नाम खराब हुआ वो अलग. इसके बाद शुरू एक लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई, जो 21 साल तक चली.

10 रुपये के आरोप में नहीं था कोई गवाह, कोर्ट ने खोली परतें

जब 2026 में मामला आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंचा तो हाईकोर्ट ने पूरे केस की परतें खोल दीं. जो सामने आया, वह अपराध की कहानी नहीं, बल्कि प्रक्रिया की विफलता की कहानी थी. कोर्ट ने पाया कि ₹10 के आरोप के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था. सिर्फ डिकॉय यात्री का बयान था जो खुद विजिलेंस टीम का हिस्सा था. किसी भी आम यात्री ने कभी शिकायत नहीं की थी.

जांच अधिकारी ही था अभियोजन पक्ष

और सबसे चौंकाने वाली बात जांच अधिकारी ही अभियोजन पक्ष की भूमिका भी निभा रहा था. नियम तोड़े गए. प्रक्रियाएं नजरअंदाज की गईं. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया गया. कोर्ट ने साफ कहा “आरोप संभावनाओं के आधार पर भी साबित नहीं होते.”

नौकरी से नहीं कर सकते बर्खास्त

ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने रेलवे की याचिका खारिज कर दी. साथ ही यह भी कहा कि अगर कोई छोटी चूक थी तो उसके लिए नौकरी से बर्खास्त करना “कठोर और असंगत” सजा थी.

नारायण नायर के लिए यह जीत है, लेकिन बहुत देर से मिली जीत. 21 साल का इंतज़ार और 21 साल की लड़ाई. 21 साल यह साबित करने में कि ₹10 उनकी ईमानदारी तय नहीं कर सकता.

लेकिन इस फैसले के पीछे एक बड़ा सवाल खड़ा है, क्या किसी इंसान की पूरी जिंदगी… सिर्फ ₹10 के आरोप पर बर्बाद की जा सकती है? और अगर हां… तो उस गलती की कीमत कौन चुकाएगा?

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