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'बच्चे की पसंद नहीं, उसका हित सर्वोपरि', हाईकोर्ट ने बेटे की कस्टडी को लेकर सुनाया बड़ा फैसला

बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा- सिर्फ बच्‍चे की पसंद के आधार पर उसकी कस्‍टडी मां या पिता को नहीं दी जा सकती. इसमें बच्‍चे का हित सर्वोपरि है.

'बच्चे की पसंद नहीं, उसका हित सर्वोपरि', हाईकोर्ट ने बेटे की कस्टडी को लेकर सुनाया बड़ा फैसला
mp high court 12 year old child custody with mother shehdol ghaziabad case.
  • जबलपुर हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया.
  • पिता की दलील थी कि 12 वर्ष का बेटा अपनी इच्छा व्यक्त करने की स्थिति में है.
  • हाईकोर्ट ने कहा- बच्चे की पसंद कस्टडी तय करने का आधार नहीं बन सकती.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा- केवल बच्चे की पसंद के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसे किस अभिभावक के पास रहना चाहिए. अदालत के लिए सबसे अहम कसौटी बच्चे का सर्वोत्तम हित और उसका कल्याण है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 12 वर्षीय बच्चे की कस्टडी उसकी मां के पास बरकरार रखने का आदेश दिया है. 

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने 20 अगस्त 2026 को प्रथम अपील क्रमांक 552/2020 पर फैसला सुनाया. मामला शहडोल फैमिली कोर्ट के 20 जुलाई 2020 के आदेश के खिलाफ पिता अभिषेक सिंह की ओर से दायर अपील से जुड़ा था. फैमिली कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मां अन्नन्या उर्फ प्रिया सिंह से पिता को सौंपने की मांग खारिज कर दी थी.

पिता ने बच्‍चे की मां पर लगाए थे ये आरोप 

पिता की ओर से दलील दी गई कि बच्चा अब 12 वर्ष का है और अपनी इच्छा व्यक्त करने की स्थिति में है. पिता ने यह भी आरोप लगाया गया कि मां बच्चे को शहडोल से गाजियाबाद ले गई, जिससे पिता के मुलाकात के अधिकार प्रभावित हुए. वहीं, मां की ओर से कहा गया कि बच्चा गाजियाबाद में रहकर पढ़ाई कर रहा है. उसकी देखभाल और शिक्षा लगातार उनके साथ बेहतर तरीके से हो रही है. बच्‍चे की मां की ओर से बताया गया कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली है, हाईकोर्ट के 22 दिसंबर 2021 के निर्देश के बावजूद गाजियाबाद जाकर बच्चे से मिलने का प्रयास नहीं किया. 

बच्‍चे की पसंद ही कस्‍टडी का आधार नहीं 

हाईकोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है. अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पसंद महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अकेले उसकी इच्छा कस्टडी तय करने का आधार नहीं बन सकती.

कोर्ट ने कहा कि बच्चे की उम्र और विकास के इस महत्वपूर्ण चरण में मां की देखभाल, मार्गदर्शन, शिक्षा और भावनात्मक सहारा उसके हित में महत्वपूर्ण हैं. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 'विवेक सिंह बनाम रोमानी सिंह' और 'रुचि मज्जू बनाम संजीव मज्जू' के फैसलों का भी हवाला दिया.

मुलाकात और वीडियो कॉल की व्‍यवस्‍था तय की    

अदालत ने मां के पास कस्टडी बनाए रखते हुए पिता के लिए मुलाकात की व्यवस्था भी तय की. पिता हर शनिवार को शहडोल में बच्चे से मिल सकेंगे. इसके अलावा हर रविवार रात 8 से 8:30 बजे तक वीडियो कॉल पर बात कर सकते हैं. बच्‍चे की मां को अपना मोबाइल नंबर पिता के साथ साझा करना होगा. कोर्ट ने अपने फैसले में पिता से गाली-गलौज या किसी तरह का दुर्व्यवहार नहीं करने की शर्त भी रखी है. उल्लंघन की स्थिति में वीडियो कॉल बंद की जा सकती है. दोनों पक्ष जरूरत पड़ने पर ट्रायल कोर्ट में विजिटेशन व्यवस्था में बदलाव की मांग कर सकेंगे. इन्हीं निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा कर दिया.

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