नई दिल्ली: मिशन 2029 में जुटी बीजेपी में पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम के गठन के बाद अब केंद्र की मोदी सरकार के मंत्रिपरिषद में फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है. माना जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मोदी मंत्रिपरिषद में फेरबदल किया जा सकता है. साथ ही, वर्तमान चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार में युवा जोश डालने और प्रदर्शन के आधार पर कुछ मंत्रियों को हटाने की बात कही जा रही है.
मंत्रिपरिषद में फेरबदल की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है क्योंकि पिछले तीन महीनों में एनडीए का विस्तार हुआ है. जहां प. बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद टीएमसी के 20 लोकसभा और चार राज्यसभा सांसद एनडीए और बीजेपी में आ गए. इसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना यूबीटी के छह सांसद टूट कर शिवसेना शिंदे में मिल चुके हैं. जबकि आम आदमी पार्टी के भी सात राज्य सभा सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया. जाहिर है इनमें से कई को केंद्र में मंत्री पद की उम्मीद होगी.
एनसीपी के दोनों धड़ों का विलय चाहती है बीजेपी!
इसी तरह परिसीमन बिल पर डीएमके और एनसीपी शरद पवार के समर्थन की बात कही जा रही है. जहां डीएमके के मोदी सरकार में शामिल होने की चर्चा गर्म है. वहीं, सूत्रों के मुताबिक बीजेपी चाहती है कि एनसीपी के दोनों धड़ों का विलय हो ताकि उसी हिसाब से मोदी सरकार में उनकी हिस्सेदारी तय हो सके.
तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने एनडीए को समर्थन का किया ऐलान
सबसे बड़ा घटनाक्रम पश्चिम बंगाल में हुआ जहां तृणमूल कांग्रेस के 20 लोक सभा सांसद टूट कर अलग हो गए और उन्होंने एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया है. इस तरह वे अब एनडीए में बीजेपी के बाद दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन गए हैं. उनसे कम संख्या वाले टीडीपी और जेडीयू का एक कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री है. ऐसे में संभावना है कि अगर यह धड़ा सरकार में शामिल होने का फैसला करता है तो उसका दावा भी एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री पद पर बनेगा. हालांकि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए क्या बीजेपी यह जोखिम मोल लेगी क्योंकि दो महीने पहले पार्टी राज्य में इन्हीं नेताओं के खिलाफ तीखी राजनीतिक लड़ाई लड़ रही थी. जनधारणा न बदले, इसलिए बीजेपी ने बाद में इस धड़े से दूरी बनाई और बजाए बीजेपी में विलय के उन्होंने एक गुमनाम दल एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना.
शिवसेना यूबीटी भी करेगी कैबिनेट मंत्री पद पर दावा
दूसरा बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम महाराष्ट्र में हुआ है, जहां शिवसेना यूबीटी के छह सांसद शिवसेना शिंदे में विलय कर लिया. ऐसे में शिवसेना की ताकत बढ़ कर 13 हो गई है. उसका भी एक कैबिनेट मंत्री पद पर दावा बनेगा. अभी उसके पास केवल एक राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार है. इससे पहले आम आदमी पार्टी के सात राज्य सभा सांसद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. सवाल है कि क्या पंजाब विधानसभा चुनाव देखते हुए इनमें से किसी को मोदी मंत्रिपरिषद में जगह मिलेगी.
हाल ही में खाली हुई है जगह
मोदी मंत्रिपरिषद में हाल ही में कुछ स्थान रिक्त हुए हैं। राज्य सभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद जॉर्ज कूरियन और रवनीत सिंह बिट्टू इस्तीफा दे चुके हैं. इसी तरह नवंबर में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और राज्य मंत्री बी एल वर्मा का राज्य सभा कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है. ये दोनों उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद हैं जहां अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में पार्टी को यह भी फैसला करना है कि उन्हें दोबारा राज्य सभा भेजा जाए या नहीं. इनका मंत्रिपरिषद में बने रहना भी इसी बात पर निर्भर करेगा.
दो अन्य राज्य मंत्रियों पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा, को क्रमशः यूपी और दिल्ली में राज्य बीजेपी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. 'एक व्यक्ति, एक पद' के सिद्धांत के तहत यह भी इस्तीफा दे सकते हैं. हालांकि, सूत्रों का इशारा है कि विधानसभा चुनाव देखते हुए पंकज चौधरी मंत्रिपरिषद में बने रहे सकते हैं, ताकि कुर्मी समाज को संदेश दिया जा सके.
सोमवार को नितिन नवीन की टीम में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत के तहत प्रश्न पूछा जा रहा है कि क्या अब वे मंत्रिपरिषद में नहीं रहेंगे. वे इससे पहले 2010 से 2014 तक कोषाध्यक्ष रह चुके हैं. इसके बाद 2014 से 2020 तक बीजेपी में कोषाध्यक्ष का पद रिक्त रहा, लेकिन गोयल अनौपचारिक रूप से इसका काम देखते थे. जे पी नड्डा ने 2020 में राजेश अग्रवाल को कोषाध्यक्ष बनाया था जिन्हें अब नवीन ने हटा कर गोयल को फिर से यह जिम्मेदारी सौंपी है. वैसे तो यह निर्णय प्रधानमंत्री को करना है कि गोयल सरकार में रहें या न रहें, लेकिन ऐसा कम ही होता है जब संगठन में दायित्व मिलने पर सरकार में कंटीन्यू करें. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में प्रमोद महाजन और अरुण जेटली को इसी तरह सरकार से संगठन में भेजा गया था.
इसी तरह कुछ राज्यपालों का कार्यकाल भी अगले महीने समाप्त होने जा रहा है. कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल और उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह का कार्यकाल जुलाई में समाप्त होने वाला है. जबकि उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है। ऐसे में नए राज्यपालों की नियुक्ति की भी चर्चा है.
मंत्रिपरिषद विस्तार में विधानसभा चुनावों को रखा जाएगा ध्यान
सूत्रों के अनुसार, मंत्रिपरिषद विस्तार में अगले साल होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखा जाएगा. अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है. वैसे तो अभी उत्तर प्रदेश से केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रतिनिधित्व पहले से ही है. लेकिन प्रदर्शन के आधार पर कुछ फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अभी उत्तर प्रदेश से कोई ब्राह्मण कैबिनेट मंत्री नहीं है। साथ ही, दलित और अति पिछ़ड़े वर्ग की भी नुमाइंदगी बढ़ाई जा सकती है.
मंत्रियों का प्रदर्शन
पिछली मंत्रिपरिषद की बैठक में कैबिनेट सचिव ने मंत्रालयों के प्रदर्शन पर प्रजेंटेशन दिया था. पेंडिग फाइल, सोशल मीडिया पर मौजूदगी जैसे पैरामीटर्स पर पांच सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले मंत्रालयों का उल्लेख किया गया था. संभावित मंत्रिपरिषद विस्तार में इसे भी ध्यान रखा जा सकता है. इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने कई अनौपचारिक जीओएम या मंत्री समूह बनाए हैं. इन्हें विभिन्न विषयों पर मंथन करने को कहा गया है. अगले महीने इन सबकी अलग-अलग बैठकें होगीं. जिनमें पीएम भी शामिल होंगे. सभी जीओएम संबंधित विषयों पर प्रजेंटेशन देंगे. माना जा रहा है कि मंत्रिपरिषद में फेरबदल की कवायद उसके बाद हो सकती है.
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