भोपाल फिर सुरक्षा एजेंसियों की नजर में है. कभी सिमी, कभी जेएमबी, कभी हिज्ब-उत-तहरीर, कभी पीएफआई और कभी ISIS से जुड़े मामलों में इस शहर का नाम सामने आया. अब मोहम्मद फराज की गिरफ्तारी ने फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या झीलों का शहर कट्टरपंथी नेटवर्क के निशाने पर है.
लेकिन इसी बीच एक और चौंकाने वाली फाइल सामने आई है. NDTV के पास मौजूद BSNL के अंदरूनी दस्तावेज बताते हैं कि UIDAI ने नवंबर 2023 में चेतावनी दी थी कि मध्य प्रदेश में BSNL की क्लोन आधार मशीनों के जरिए कथित तौर पर आतंकियों के आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं.
फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक घूमती रहीं
चेतावनी बेहद गंभीर थी. मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था. लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी हैरान करने वाला है. न FIR हुई. न किसी आपराधिक जांच का साफ रिकॉर्ड मिला. न ATS को सूचना दिए जाने का कोई ठोस प्रमाण दस्तावेजों में दिखता है. इसके बजाय फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक घूमती रहीं.

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पत्र में यह भी लिखा था कि इस कथित गड़बड़ी में स्थानीय सुपरवाइजर और ऑपरेटर्स की भूमिका भी संदिग्ध है. BSNL ने तुरंत 79 आधार पंजीयन किट को डी-रजिस्टर करने का आदेश दिया. सूची लंबी थी. भोपाल, विदिशा, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, जबलपुर, बालाघाट, मंडला, नरसिंहपुर, सतना, सिवनी, शहडोल, छिंदवाड़ा, ग्वालियर, शिवपुरी और कई अन्य क्षेत्र इसमें शामिल थे.
मशीनें बंद कर दी गईं. लेकिन सवाल खुले रह गए. क्या इन मशीनों से आतंकियों के आधार बने. कितने संदिग्ध पंजीकरण हुए. किन लोगों ने मशीनों का इस्तेमाल किया. क्या किसी से पूछताछ हुई. क्या किसी थाने में मामला दर्ज हुआ.
दो साल से ज्यादा समय तक जवाब नहीं आया
फिर 2 फरवरी 2026 को एक और पत्र सामने आया. इस बार सवाल यह नहीं था कि आतंकियों के आधार कार्ड कैसे बने. सवाल यह था कि Royal Communication को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार किसके पास है? पत्र में माना गया कि UIDAI ने विक्रेता पर आधार पंजीकरण कार्य में कथित धोखाधड़ी और भ्रष्ट आचरण की सूचना दी थी लेकिन निगम ने कहा कि निविदाएं व्यावसायिक क्षेत्र स्तर पर हुई थीं, इसलिए प्रतिबंध लगाने का अधिकार संबंधित क्षेत्र के पास होगा. यानी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चेतावनी के 26 महीने बाद भी सिस्टम यह तय ही कर रहा था कि कार्रवाई कौन करेगा.

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मशीनों को निष्क्रिय किया गया-बीएसएनएल
बीएसएनएल मध्यप्रदेश के मुख्य महाप्रबंधक मिथिलेश कुमार ने NDTV से कहा, “हमने रोकथाम के उपाय किए हैं सभी एहतियाती कदम उठाए गए हैं. मशीनों को निष्क्रिय किया गया. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की सलाह के अनुसार सभी मशीनों को स्टैटिक आईपी के साथ फिर से पंजीकृत किया गया है, ताकि दुरुपयोग रोका जा सके.”
उन्होंने आगे कहा, “बाकी मामले में मैं सक्षम नहीं हूं, हम केवल रोकथाम के उपाय कर सकते हैं अगर उनके पास कोई जानकारी है, तो उसे उस एजेंसी को देना होगा जो जांच के लिए सक्षम है. यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर बीएसएनएल जांच नहीं कर सकता था, तो जांच किसे करनी थी? और किसने यह तय किया कि यह मामला केवल मशीन बंद करने से खत्म हो जाएगा? NDTV ने जब तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा से इस मामले पर पूछा, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है.
71 आतंकी संदिग्ध भोपाल केंद्रीय जेल में
भोपाल की पृष्ठभूमि इस चूक को और गंभीर बना देती है. 2022 में ऐशबाग से जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश का मॉड्यूल पकड़ा गया, 2023 में हिज्ब-उत-तहरीर से जुड़े संदिग्ध पकड़े गए. पीएफआई और आईएसआईएस से जुड़े मामलों में भी भोपाल का नाम आया. अब मोहम्मद फराज मामले में कथित पाकिस्तानी आकाओं और ऑनलाइन कट्टरपंथ का एंगल सामने है. आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि सिमी, पीएफआई, हिज्ब-उत-तहरीर, आईएसआईएस, जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश और सूफा से जुड़े 71 आतंकी संदिग्ध भोपाल केंद्रीय जेल में बंद हैं.

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इस पूरे मामले की गूंज भोपाल के एक पुराने फर्जी पासपोर्ट कांड से भी मिलती है, हाल ही में अदालत ने दो पासपोर्ट अधिकारियों, एक क्लर्क और एक एजेंट को सजा सुनाई मामला आतंकी आरोपी नवाब खान उर्फ समीर उर्फ सलमान से जुड़ा था. नवाब खान पर एक पुलिसकर्मी की हत्या का आरोप था. वह फरार होकर शाजापुर में नई पहचान के साथ रहने लगा. वहीं उसका संपर्क एजेंट अबू बकर से हुआ आरोप है कि फर्जी राशन कार्ड, अंकसूची और मूल निवासी प्रमाणपत्र तैयार किए गए. इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर भोपाल पासपोर्ट कार्यालय में आवेदन हुआ और पासपोर्ट जारी हो गया.
इनको माना गया दोषी
इस मामले में तत्कालीन कार्यवाहक पासपोर्ट अधिकारी तुलसीदास शर्मा, पासपोर्ट जारी करने वाले अधिकारी देवेंद्र जैन, कार्यालय लिपिक सुनील कुमार रजक और एजेंट अबू बकर को दोषी माना गया. अदालत ने उन्हें कठोर कारावास की सजा सुनाई, एक अन्य आरोपी सुभाष व्यास को पर्याप्त साक्ष्य न होने पर बरी कर दिया गया.
फर्जी पासपोर्ट ने कभी एक आतंकी आरोपी को देश से बाहर निकलने का रास्ता दिया था. अब सवाल है क्या फर्जी या समानांतर आधार पंजीकरण ने भी किसी आतंकी नेटवर्क को पहचान का कवच दिया? जवाब अब भी फाइलों में कैद हैं. क्या आतंकियों को मध्य प्रदेश में क्लोन मशीनों से आधार मिला? कितने आधार बने? किन एफआईआर क्यों नहीं हुई? सुरक्षा एजेंसियों को क्यों नहीं बताया गया? 26 महीने बाद भी जवाब नहीं हैं, सिर्फ फाइलें हैं, पत्र हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक डरावना सवाल क्या व्यवस्था ने समय रहते खतरे को पहचाना, या उसे कागजों में दफना दिया?
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