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कर्ज के चक्रव्यूह में MP! आज पैदा हुए बच्चे पर ₹55000 की उधारी; 100रु की नई उधारी में 30 पुराने कर्ज पर खर्च

मध्य प्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. CAG की State Finances Audit Report के अनुसार राज्य की नई उधारी का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में खर्च हो रहा है. वर्तमान में प्रति व्यक्ति कर्ज 55 हजार रुपये से अधिक पहुंच चुका है, जबकि कुल देनदारियां 5.31 लाख करोड़ रुपये के पार हैं.

कर्ज के चक्रव्यूह में MP! आज पैदा हुए बच्चे पर ₹55000 की उधारी; 100रु की नई उधारी में 30 पुराने कर्ज पर खर्च
  • MP सरकार ने हाल ही में बाजार से 2800 करोड़ रुपये दो सरकारी प्रतिभूतियों के माध्यम से उधार लिए हैं.
  • CAG की रिपोर्ट के अनुसार राज्य द्वारा लिए नए कर्ज का लगभग 30% हिस्सा पुराने कर्ज की अदायगी में खर्च हो रहा है.
  • वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच MP का कुल कर्ज 83 हजार करोड़ से बढ़कर लगभग 3.33 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

मध्य प्रदेश में आज पैदा होने वाला बच्चा किसी बैंक से कर्ज लेकर दुनिया में नहीं आता. उसके माता-पिता ने भी उसके नाम कोई लोन नहीं लिया होता. लेकिन राज्य सरकार के कुल कर्ज को आबादी में बांटकर देखें तो उसके हिस्से में भी करीब 55,323 रुपये का कर्ज दर्ज हो जाता है. उसे यह रकम कभी बैंक में जाकर नहीं चुकानी होगी. लेकिन जिस दिन वह 22 साल का होगा, तब भी मध्य प्रदेश सरकार के आज लिए गए कुछ कर्ज की किस्तें बाकी होंगी.

राज्य सरकार ने हाल में बाजार से 2,800 करोड़ रुपये जुटाने के लिए दो सरकारी प्रतिभूतियां जारी कीं. इनमें 1,600 करोड़ रुपये आठ साल के लिए लिए, जबकि 1,200 करोड़ रुपये की दूसरी उधारी 22 साल की अवधि के लिए है. यानी 2026 में लिया यह कर्ज 2048 तक मध्य प्रदेश की वित्तीय देनदारी बना रहेगा.

State Finances Audit Report 2024-25

लंबे समय के लिए कर्ज लेना अपने आप में असामान्य नहीं है. सरकारें सड़क, बांध, सिंचाई परियोजनाओं और दूसरी बड़ी परिसंपत्तियों के लिए दशकों की अवधि में पैसा जुटाती हैं. लेकिन मध्य प्रदेश की कहानी में एक दूसरा आंकड़ा इस 22 साल की उधारी को ज्यादा महत्वपूर्ण बना देता है.

विधानसभा में पेश CAG की State Finances Audit Report 2024-25 बताती है कि राज्य ने उस वित्त वर्ष में जितना नया कर्ज लिया, उसका 29.43 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज की देनदारियां चुकाने में चला गया. पिछले दस साल का औसत भी लगभग यही, 29.30 प्रतिशत है. सीधी भाषा में कहें तो मध्य प्रदेश सरकार अगर बाजार से 100 रुपये उधार लेती है तो उसमें से करीब 30 रुपये पहले से लिए गए कर्ज को संभालने में खर्च हो रहे हैं. यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.

नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुका रही सरकार

कर्ज लेकर सड़क बनाई जाए, सिंचाई परियोजना तैयार की जाए या ऐसा उद्योग ढांचा बनाया जाए जिससे आने वाले दशकों में अर्थव्यवस्था बढ़े, तो उधारी भविष्य के लिए निवेश हो सकती है. लेकिन जब नए कर्ज का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज की किस्त और उसकी देनदारी में जाने लगे तो नए विकास के लिए उपलब्ध रकम अपने आप कम होने लगती है. CAG ने इसी खतरे की तरफ इशारा किया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने कर्ज में नई उधारी का बड़ा हिस्सा जाने से पूंजीगत खर्च के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित होते हैं. CAG ने यह भी दर्ज किया है कि हाल के वर्षों में राज्य का कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि के मुकाबले तेज रफ्तार से बढ़ा है और इस रफ्तार को आंकड़ों में देखें तो तस्वीर और साफ होती है.

2016 के मुकाबले बढ़ा एमपी का कर्जा

2015-16 में मध्य प्रदेश का आंतरिक कर्ज करीब 83,718 करोड़ रुपये था. 2024-25 तक यह बढ़कर करीब 3.33 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसमें केंद्र सरकार के कर्ज, सार्वजनिक खाते की देनदारियां और दूसरी liabilities जोड़ने पर राज्य का कुल बोझ कहीं बड़ा हो जाता है. वित्त मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश की कुल बकाया देनदारियां अब करीब 5.31 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी हैं. यानी पांच लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा अब पीछे छूट चुका है.

कर्ज लेने की रफ्तार भी बढ़ी है. 2024-25 में राज्य ने लगभग 89,797 करोड़ रुपये की उधारी ली. 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह रकम करीब 1.01 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई. अब 2026-27 के बजट में करीब 1.06 लाख करोड़ रुपये की सकल उधारी का अनुमान है. लेकिन उसी बजट में एक और आंकड़ा है. करीब 34,437 करोड़ रुपये पुराने कर्ज के मूलधन की अदायगी के लिए रखने होंगे.

कर्जे की लाइन मोटी होती जा रही है

इसका अर्थ यह है कि सरकार एक तरफ नया कर्ज ले रही है और दूसरी तरफ पुराने कर्ज की बड़ी किस्तें भी चुका रही है. 2026-27 में राज्य की शुद्ध उधारी करीब 71,753 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. इसी दौरान राजकोषीय घाटा लगभग 71,458 करोड़ रुपये, यानी GSDP का करीब 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है.

लेकिन कर्ज की असली कीमत सिर्फ मूल रकम नहीं होती. उसके साथ हर साल ब्याज भी आता है. मध्य प्रदेश के बजट में ब्याज की यह लाइन लगातार मोटी होती जा रही है. 2024-25 में राज्य ने करीब 25,888 करोड़ रुपये ब्याज भुगतान पर खर्च किए. 2026-27 में इसके बढ़कर करीब 33,735 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है. यानी सिर्फ दो साल में सालाना ब्याज का बोझ करीब आठ हजार करोड़ रुपये बढ़ सकता है.

45 प्रतिशत खर्च पहले से तय

राज्य को 2026-27 में लगभग 3.08 लाख करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्तियां होने का अनुमान है. लेकिन इनमें से करीब 1.38 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 45 प्रतिशत रकम, वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में चली जाएगी. दूसरे शब्दों में, सरकार के खजाने में आने वाले हर 100 रुपये में करीब 45 रुपये के खर्च की दिशा पहले से तय है. यहीं कर्ज का असर सिर्फ वित्त विभाग की बैलेंस शीट से निकलकर स्कूल, अस्पताल, सड़क, सिंचाई और दूसरी सरकारी प्राथमिकताओं तक पहुंचने लगता है.

कर्ज सिर्फ बोझ के रूप में नहीं- वित्तमंत्री देवड़ा

सरकार हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने रखती है. वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा का कहना है कि कर्ज को सिर्फ बोझ के रूप में देखना सही नहीं है. सरकार के मुताबिक उधारी नियमों और तय सीमाओं के भीतर की जा रही है और उसका उपयोग पूंजीगत व्यय में हो रहा है. सड़क, सिंचाई, आधारभूत ढांचा और दूसरी परिसंपत्तियां बनाने के लिए सरकार को बड़ी पूंजी की जरूरत होती है.

सरकार यह भी कहती है कि नियमित खर्च चलाने के लिए कर्ज नहीं लिया जाता. केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को पूंजीगत परियोजनाओं के लिए 50 साल की अवधि के ब्याजमुक्त ऋण भी मिलते हैं. लेकिन CAG की रिपोर्ट सरकार की इसी दलील के बीच एक असहज सवाल रख देती है. 

अगर हर 100 रुपये की नई उधारी में करीब 30 रुपये पुरानी देनदारियों को संभालने में चले जा रहे हैं, तो वास्तव में नई परिसंपत्तियां बनाने के लिए कितनी उधारी बच रही है. और यह सवाल हर गुजरते साल के साथ ज्यादा महत्वपूर्ण होता जाएगा. 

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