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Maruti कंपनी से 200 करोड़ की मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज, HC ने भ्रूण लाने पर लगाई फटकार

Jabalpur High Court News: याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब आरोपों के समर्थन में ठोस सामग्री हो. इस मामले में याचिका अस्पष्ट और बिना आधार की पाई गई, इसलिए इसे खारिज किया जाता है.

Maruti कंपनी से 200 करोड़ की मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज, HC ने भ्रूण लाने पर लगाई फटकार
Jabalpur High Court: 200 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग से जुड़ी याचिका खारिज.

200 Crore Compensation Plea Dismissed: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने 200 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग से जुड़ी एक याचिका को खारिज कर दिया. यह वही मामला है, जिसमें याचिकाकर्ता कोर्ट में भ्रूण लेकर पहुंच गया था. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि याचिका गंभीर आरोपों पर आधारित है, लेकिन उसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए.

न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ के समक्ष दायर याचिका में याचिकाकर्ता दयाशंकर पांडेय ने आरोप लगाया था कि उन्होंने Maruti Suzuki India Limited में 200 करोड़ रुपये से अधिक के कथित गबन का खुलासा किया था. उनका दावा था कि इस खुलासे के बाद उनके और उनके परिवार पर हमले हुए. इस दौरान एक हमलें में उनकी पत्नी का गर्भपात हो गया. याचिकाकर्ता ने अदालत से कंपनी से 200 करोड़ रुपये की वसूली कराने, अपनी बेटी के इलाज के लिए 82 लाख रुपये दिलाने और पुलिस को निष्पक्ष जांच के निर्देश देने की मांग की थी.

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याचिका के साथ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए

याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और कंपनी की ओर से कहा गया कि याचिका केवल आरोपों पर आधारित है. इसमें कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं. रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने भी पाया कि कथित शिकायतों की प्रतियां तक याचिका के साथ प्रस्तुत नहीं की गईं. 

कोर्ट में भ्रूण लाना बेहद आपत्तिजनक

इसके बाद अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब आरोपों के समर्थन में ठोस सामग्री हो. इस मामले में याचिका अस्पष्ट और बिना आधार की पाई गई, इसलिए इसे खारिज किया जाता है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि पिछली तारीख पर याचिकाकर्ता द्वारा अदालत कक्ष में भ्रूण लाना बेहद आपत्तिजनक है. न्यायालय ने टिप्पणी की कि अदालत को भावनात्मक प्रदर्शन या नाटकीयता का मंच नहीं बनाया जा सकता, इस तरह की हरकतें न्यायालय की गरिमा के खिलाफ हैं.

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तो कार्रवाई की जा सकती है 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी घटना दोहराई गई तो संबंधित न्यायालय आवश्यक कानूनी कार्रवाई कर सकता है. साथ ही यह भी कहा कि यदि पुलिस की कार्रवाई से असंतोष है तो याचिकाकर्ता कानून के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित उपाय कर सकता है.

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