इस स्वतंत्रता दिवस पर जब देश भर में तिरंगा लहराएगा, तो उसमें ग्वालियर की खादी का हुनर साफ झलकेगा. दरअसल लाल किले से लेकर देश के 18 अलग-अलग राज्यों और सेना के ठिकानों तक, इस बार ग्वालियर में बने तिरंगे की शान देखने को मिलेगी. देश में सरकारी नियमों के तहत राष्ट्रीय ध्वज बनाने की अनुमति सिर्फ दो ही जगहों को है, जिनमें से उत्तर भारत में अकेला ग्वालियर का 'मध्य भारत खादी संघ' ही यह काम करता है. इस बार 196 कारीगरों ने दिन-रात मेहनत करके ये झंडे तैयार किए हैं, जिन्हें अलग-अलग लेवल पर 20-25 तरीके की कड़ी जांच के बाद ही बाहर भेजा जाता है.
कर्नाटक के बाद ग्वालियर ही है अधिकृत केंद्र
बता दें कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर फहराए जाने वाले आधिकारिक तिरंगों का बड़ा हिस्सा ग्वालियर में ही तैयार होता है. पूरे देश में आईएसआई मार्क वाले खादी के तिरंगे बनाने का अधिकार सिर्फ दो संस्थाओं को मिला है—एक कर्नाटक का हुब्बल्ली केंद्र और दूसरा ग्वालियर. ग्वालियर से बने झंडे मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात और दक्षिण भारत तक भेजे जाते हैं.
1925 में चरखे से हुई थी शुरुआत
ग्वालियर की इस संस्था का इतिहास काफी पुराना है. इसकी शुरुआत साल 1925 में 'चरखा संघ' के रूप में हुई थी. पहले यहां साल भर में केवल 10 से 12 हजार झंडे ही बन पाते थे, लेकिन अब मांग इतनी बढ़ गई है कि हर साल 20 से 30 हजार झंडे तैयार हो रहे हैं. इस बार संस्था ने करीब 70 लाख रुपये से ज्यादा कीमत के झंडे सप्लाई किए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी अधिक हैं.
हाथ से धागा बनाने से लेकर सिलाई तक का सफर
ग्वालियर में तिरंगा तैयार करने में 5 से 6 दिन का समय लगता है. यहां धागा तैयार करने से लेकर बुनाई, रंगाई और सिलाई तक का सारा काम कारीगर अपने हाथों से ही करते हैं. कपड़ा तैयार होने के बाद उसके तीनों रंगों, सिलाई की मजबूती और सही नाप-तोल की बारीकी से जांच की जाती है. करीब 20 से 25 अलग-अलग जांचों में पास होने के बाद ही इस पर आईएसआई का ठप्पा लगाया जाता है.
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कार के छोटे झंडे से लेकर बड़े तिरंगे तक
यहां अलग-अलग 9 से 10 साइज में तिरंगे बनाए जाते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा मांग 2 बाय 3 फीट से लेकर 6 बाय 4 फीट वाले झंडों की रहती है. इसके अलावा मंत्रियों और बड़े अधिकारियों की गाड़ियों पर लगने वाले सबसे छोटे आकार के झंडे भी यहीं बनते हैं. नियम बहुत सख्त होने के कारण कई बार मांग के हिसाब से पूरे झंडे तैयार नहीं हो पाते,फिर भी इसके कारीगर दिन-रात काम करके देश के गौरव को घर-घर तक पहुंचाने में जुटे हैं.
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