- ग्वालियर में टेक्सटाइल वेस्ट यानी कपड़ों के कचरे को संभालने की पहल की जा रही है.
- इस काम में केवल नगर निगम ही नहीं, बल्कि युवा डिजाइनर, महिलाएं, सेल्फ हेल्प ग्रुप और आम नागरिक भी जुड़े हैं.
- इस तरह कपड़े के कचरे को दोबारा उपयोगी संसाधन में बदलने की सर्कुलर इकोनॉमी और वेस्ट-टू-वेल्थ से जोड़ा जा रहा है
हमारे घर में रखे पुराने कपड़ों का आखिर क्या होता है? जो कपड़े बिल्कुल भी पहनने लायक नहीं रह जाते, आखिरकार वे कूड़ेदान में चले जाते हैं और वहां से लैंडफिल या डंपिंग साइट तक पहुंचते हैं. लेकिन अगर इन्हीं पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल होने वाला संसाधन में तब्दील कर दिया जाए तो तस्वीर पूरी तरह से बदल सकती है.
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में इसी सोच के साथ टेक्सटाइल वेस्ट यानी कपड़ों के कचरे को संभालने की पहल की जा रही है. खास बात यह है कि इस काम में केवल नगर निगम ही नहीं, बल्कि युवा डिजाइनर, महिलाएं, स्वयं सहायता समूह (सेल्फ हेल्प ग्रुप) और आम नागरिक भी जुड़े हैं.
आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के मार्गदर्शन में चल रहे स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत ग्वालियर नगर निगम का जोर शहर को कचरा मुक्त बनाने के साथ-साथ कचरे को दोबारा उपयोगी संसाधन में बदलने पर है. इसी सोच को सर्कुलर इकोनॉमी और वेस्ट-टू-वेल्थ से जोड़ा जा रहा है.

Photo Credit: Ministry of Textile
ग्वालियर में रोज कितना कचरा निकलता है?
ग्वालियर शहर से हर दिन करीब 500 से 550 टन ठोस कचरा निकलता है. इस कचरे में कई तरह के अपशिष्ट शामिल होते हैं, जिनमें पुराने कपड़े और कपड़ों की कतरन भी एक हिस्सा है.
सरकारी अध्ययनों और आंकड़ों के अनुसार, कुल ठोस कचरे में टेक्सटाइल वेस्ट की हिस्सेदारी करीब 1.12 फीसद से 5.54 फीसद के बीच हो सकती है.
इस अनुपात को ग्वालियर के रोजाना निकलने वाले कचरे से जोड़ें तो हर दिन कई टन कपड़ा कचरा सामने आ सकता है. यही वह कचरा है जिसे अलग करके दोबारा इस्तेमाल या रीसाइकिल किया जा सकता है. रीसाइकिल इसलिए करना पड़ता है क्योंकि हर कपड़ा एक जैसा नहीं होता.
आज कपड़ों के निर्माण में सिंथेटिक फाइबर और पॉलिएस्टर जैसे पदार्थों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है. ऐसे कपड़ों का प्राकृतिक रूप से खत्म होना आसान नहीं होता. जब इन्हें बिना छंटाई के लैंडफिल में डाल दिया जाता है तो वे लंबे समय तक वहां बने रह सकते हैं.
यही वजह है कि टेक्सटाइल वेस्ट को शुरुआत में ही अलग करना अहम है.
अगर कपड़ा पहनने लायक है तो उसे किसी दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है. अगर वह पहनने लायक नहीं है लेकिन उसका कपड़ा उपयोगी है तो उससे नया उत्पाद बनाया जा सकता है. और जो कपड़ा सीधे दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता, उसे रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जा सकता है.
इसका मतलब ये है कि सही छंटाई के बाद एक ही कपड़े के कई उपयोग संभव हैं.

ग्वालियर में युवाओं ने पुराने कपड़ों से क्या बनाया?
ग्वालियर की पहल का सबसे दिलचस्प हिस्सा युवाओं की भागीदारी है.
ग्वालियर नगर निगम ने स्थानीय युवा डिजाइनरों के साथ मिलकर ‘शून्य - फ्रॉम वेस्ट टू वर्थ' जैसी परियोजना को आगे बढ़ाया है.
इसका मूल विचार है ‘लैंडफिल से हथकरघे तक' और ‘कतरन से कलाकृति'.
इस पहल में घरों और डंपिंग साइटों से जुटाए गए पुराने कपड़ों और कपड़े की कतरनों को इकट्ठा किया गया. इन कपड़ों को सीधे फेंकने के बजाय उनकी छंटाई की गई और फिर डिजाइनिंग के जरिए उन्हें नया रूप दिया गया.

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करीब डेढ़ से दो साल की अवधि में इकट्ठा किए गए कपड़ों के टुकड़ों को इस्तेमाल में लाया गया. इसके बाद करीब चार महीने की मेहनत से इन बेकार कपड़ों से नए परिधान तैयार किए गए.
इनसे जैकेट और आधुनिक ट्राउजर जैसे फैशनेबल कपड़े तैयार किए गए.
यह प्रयोग दिखाता है कि टेक्सटाइल वेस्ट का मतलब केवल पुराने कपड़े नहीं हैं. सही डिजाइन और तकनीक के साथ यही कचरा नए उत्पाद का कच्चा माल बन सकता है.
नगर निगम ने इस पहल पर आधारित ‘शून्य' नाम से एक आधिकारिक डॉक्यूमेंट्री भी तैयार की है, जिसका उद्देश्य दूसरे युवाओं को भी कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग से जोड़ना है.
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RRR सेंटर
पुराने कपड़ों के लिए बनाए गए हैं RRR सेंटर
ग्वालियर में कपड़ा कचरे को व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा करने के लिए RRR यानी Reduce, Reuse और Recycle की अवधारणा अपनाई गई है.
शहर में छह स्थायी RRR सेंटर बनाए गए हैं. विशेष स्वच्छता अभियानों के दौरान इनकी संख्या बढ़ाकर 18 से 20 तक की जाती है.
इन केंद्रों पर आम नागरिक अपने पुराने और अनुपयोगी कपड़े जमा कर सकते हैं.
इसके बाद सबसे जरूरी काम होता है छंटाई.
कपड़ों को उनकी स्थिति और उपयोगिता के आधार पर अलग किया जाता है.

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पहनने लायक कपड़ों का क्या होता है?
कई बार लोग ऐसे कपड़े भी फेंक देते हैं जो उनके लिए पुराने हो चुके होते हैं, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति के लिए अभी भी उपयोगी होते हैं.
ऐसे कपड़ों को छांटकर साफ किया जाता है और फिर जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाया जाता है.
इसके लिए ‘स्लम हाट' और ‘नेकी की दीवार' जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है.
इससे एक तरफ कपड़ा लैंडफिल में जाने से बच जाता है और दूसरी तरफ जरूरतमंद व्यक्ति को बिना कीमत कपड़ा मिल जाता है.
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जो कपड़े पहनने लायक नहीं हैं, उनका क्या होगा?
अब सवाल आता है उन कपड़ों का जिन्हें पहनना संभव नहीं है. ऐसे कपड़ों को भी सीधे कूड़े में नहीं भेजा जाता.
इन्हें नगर निगम की देखरेख में काम कर रहे महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाता है.
इन महिलाओं को पुराने कपड़ों से उपयोगी उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
इसके तहत करीब 50 हजार थैले बनाने का लक्ष्य रखा गया है.
इन थैलों को स्थानीय बाजारों और स्कूलों में बांटने की योजना है.
इसका एक उद्देश्य प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल को कम करना भी है.
यानी पुराने कपड़े से एक साथ कई फायदे हासिल किए जा रहे हैं. कपड़ा लैंडफिल में जाने से बचता है, प्लास्टिक का विकल्प तैयार होता है और महिलाओं के लिए काम का अवसर पैदा होता है.

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केदारपुर प्लांट में कैसे हो रहा है बड़े स्तर पर काम?
ग्वालियर की टेक्सटाइल वेस्ट पहल के लिए बड़े स्तर पर कचरा प्रसंस्करण और मटेरियल रिकवरी की व्यवस्था भी विकसित की जा रही है.
ग्वालियर के मुख्य लैंडफिल साइट पर 250 टन प्रतिदिन क्षमता की सूखा कचरा प्रसंस्करण इकाई काम कर रही है.
इसके साथ ही केदारपुर में करीब 75.27 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक कचरा प्रसंस्करण और मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी यानी MRF विकसित की जा रही है.
यहां मिश्रित कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में अलग करने का काम मशीनों की मदद से किया जाता है. इस प्रक्रिया में कपड़ा कचरा भी अलग किया जाता है.
इसके बाद अलग किए गए कपड़े को रजिस्टर्ड रीसाइक्लिंग सेलर्स को भेजा जाता है. वहां इस कपड़े से उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले सफाई के कपड़े और इंसुलेशन जैसी सामग्री तैयार की जा सकती है.
इस तरह कपड़ा कचरा एक बार फिर उत्पादन की प्रक्रिया में लौट आता है.

ग्वालियर में केदारपुर साइट पर वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट
पुराने कचरे के पहाड़ को भी हटाया जा रहा है
केदारपुर की चुनौती केवल रोज आने वाले नए कचरे की नहीं है.
यहां वर्षों से जमा करीब 6.03 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे का ढेर भी था.
इस पुराने कचरे को वैज्ञानिक तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई.
दी गई जानकारी के मुताबिक इसका करीब 90 फीसद हिस्सा वैज्ञानिक तरीके से तेजी से साफ किया जा चुका है.
इस तरह ग्वालियर एक तरफ रोज पैदा हो रहे नए कचरे को संभालने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पुराने लैंडफिल के बोझ को भी कम कर रहा है.

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इसे वेस्ट-टू-वेल्थ क्यों कहा जा रहा है?
दरअसल इसका जवाब, इसमें है कि जो कपड़े पहनने लायक हैं वे जरूरतमंदों तक पहुंचते हैं.
जो पहनने लायक नहीं हैं, उनसे थैले जैसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं.
कपड़े की कतरनों से डिजाइन और फैशन उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं.
रीसाइक्लिंग योग्य कपड़ा उद्योगों के लिए सफाई सामग्री या इंसुलेशन जैसे उत्पादों में इस्तेमाल हो सकता है.
इस पूरी प्रक्रिया में केवल कचरा नहीं हटाया जाता बल्कि उससे उपयोगी वस्तुएं तैयार होती हैं. यही वेस्ट-टू-वेल्थ की अवधारणा है.
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