- ग्वालियर में गाय के गोबर से बन रही तुलसी बीज वाली राखी, सेना के जवानों को भेजेंगी.
- 150 महिलाएं बना रही हर्बल राखी, आदिवासी महिलाओं को रोजगार, प्लास्टिक फ्री त्योहार.
- रक्षाबंधन 28 अगस्त को, बाजार में ईको राखी की धूम.
28 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाना है, जिसकी झलक पूरे देश में दिख रही है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं. वहीं, भाई भी बहन की रक्षा करने का वचन देता है. रक्षाबंधन के पर्व पर बाजार भी तरह-तरह की राखियों से सज गए हैं, लेकिन हम आपको ऐसी राखियों के बारे में बात करेंगे, जो ईकोफ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल हैं.
इन राखियों में प्लास्टिक का प्रयोग नहीं हो रहा है और न ही कार्बन उत्सर्जित करने वाली वस्तु से बनाई गई हैं. यह राखियां देशी गाय के गोबर से बनाई जा रही है.

राखी में तुलसी के बीज, सेना को भेजती हैं राखियां
इन ईको-फ्रेंडली राखियों में तुलसी के बीज मिश्रित हैं. यानी उपयोग के बाद ये खाद के काम आएंगी और जिस गमले या जमीन में डाली जाएंगी, वहां तुलसी के पौधे उग जाएंगे. यह राखियां खास तौर से सेना के जवानों को पहनाई जाएंगी, जो सीमा पर तैनात रहकर देश की रक्षा करते हैं. इनको बनाने वाली लेखिता सिंघल बताती हैं कि वह राखियों की दो साल से ऑनलाइन सप्लाई कर रही हैं. उनका मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण है.

अनोखी और हर्बल राखियों को ग्वालियर में महिलाओं का एक समूह देसी गाय के गोबर से तैयार कर रहा है. साथ ही ये राखियां वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के लिए रोजगार का साधन बन रही हैं.
150 महिलाएं बना रही राखियां, वन्य क्षेत्र में भी काम जारी
ग्वालियर के सिटी सेंटर में रहने वाली लेखिता सिंघल पिछले कुछ वर्षों से गाय के गोबर की राखी बना रही हैं. हर बार की तरह यूं तो इस बार भी रक्षाबंधन के त्योहार पर महंगी-महंगी राखियों से बाजार सजे हुए हैं, लेकिन अबकी बार इस त्यौहार पर भाइयों की कलाई पर हर्बल राखी भी देखने को मिलेगी. इन राखियों को तैयार करने के लिए लगभग 150 महिलाओं का समूह बनाने में जुटा हुआ है. जिसमें कुछ ग्वालियर में तो कुछ वन्य क्षेत्र के इलाकों में बनाई जा रही हैं.
आदिवासी महिलाओं को भी मिलता है काम
इस अभियान के पीछे दो मकसद हैं एक- देसी नस्ल की ऐसी गाय, जिन्हें दूध न देने के कारण लोग छोड़ देते हैं, उन्हें बचाना. दूसरा वन्य क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी ग्रामीण महिलाओं को उनके घर पर ही रोजगार के अवसर मुहैया कराना है. गोकृति से जुड़ीं महिलाएं अपने घरों पर ही इस तरह की सामग्री तैयार करती हैं. सामग्री की फिनिशिंग, रंगाई और पैकेजिंग करने के बाद लोगो, मार्केटिंग का काम वन बंधु परिषद से जुड़ी महिलाएं करती हैं.
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