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दतिया उपचुनाव: नहीं चला दामोदर यादव वाला 'तीसरा फैक्टर', न काम आई गुटबाजी; टूटा सालों पुराना ट्रेंड

दतिया उपचुनाव परिणाम में न तो ASP के दामोदर यादव का 'तीसरा फैक्टर' चला और न ही कांग्रेस की गुटबाजी रोड़ा बनी. जानिए कैसे टूटा उपचुनावों का सालों पुराना ट्रेंड और क्यों हारी बीजेपी.

दतिया उपचुनाव: नहीं चला दामोदर यादव वाला 'तीसरा फैक्टर', न काम आई गुटबाजी; टूटा सालों पुराना ट्रेंड

दतिया उपचुनाव का जनादेश सिर्फ हार-जीत का आंकड़ा भर नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की पारंपरिक उपचुनाव की राजनीति और संगठनात्मक ढर्रे को खारिज करने वाला एक बड़ा सियासी संदेश है. तीसरे उम्मीदवार दामोदर यादव द्वारा वोट काटने और अपनी ही पार्टी में गुटबाजी के बावजूद कांग्रेस का बाजी मार लेना यह साफ करता है कि बीजेपी का वोट बैंक केवल बिखरा ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के प्रति उदासीन भी हुआ. अमूमन 60 से 70 फीसदी उपचुनाव जीतने का रिकॉर्ड रखने वाली बीजेपी के लिए यह हार एक बड़ी चेतावनी है—जहां न तो 'चेहरा बदलो' का दांव चला, न प्रशासनिक तंत्र का असर दिखा और न ही नरोत्तम मिश्रा का चुनावी वजूद अपनी छाया से बाहर आ सका. इस जनादेश ने बीजेपी नेतृत्व को स्थानीय राजनीतिक संरचना की अनदेखी के परिणामों का अहसास कराया है, तो वहीं कांग्रेस को ग्वालियर-चंबल अंचल में नई सियासी संजीवनी दे दी है.

दामोदर यादव की मौजूदगी भी नहीं बचा सकी बीजेपी को

आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव की मौजूदगी ने मुकाबले में एक और परत जोड़ दी. ओबीसी और दलित मतों में पैठ रखने वाले दामोदर यादव ने शुरुआती दौर से बड़ी संख्या में वोट हासिल किए और निर्वाचन आयोग ने जब 15 में से 10 दौर की गिनती पूरी की तब तक उन्हें 13,273 वोट मिल चुके थे.सामान्य परिस्थितियों में एक मजबूत तीसरा उम्मीदवार विपक्षी या पिछड़ा वर्ग के वोटों को बांटकर सत्तारूढ़ दल की मदद कर सकता था. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस आरामदायक बढ़त बनाए रही.

यही शायद बीजेपी के लिए सबसे नुकसानदेह चुनावी गणित था. कांग्रेस को जीतने के लिए हर विपक्षी वोट अपने पीछे एकजुट करने की जरूरत नहीं पड़ी. बड़ी संख्या में वोट तीसरे उम्मीदवार के पास जाने के बावजूद वह सत्तारूढ़ दल को हरा सकी. इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल कांग्रेस के पक्ष में वोटों के ध्रुवीकरण की नहीं थी.

बीजेपी के अपने संभावित समर्थन आधार में भी सेंध, मतदान से दूरी या विभाजन हुआ.यह साफ संकेत है कि बीजेपी का अपना कोर वोट बैंक भी खिसका और पार्टी समर्थकों में भी निष्क्रीयता या विभाजन देखा गया.

कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी और अलग प्रबंधन

कांग्रेस की जीत इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि मतगणना वाले दिन तक पार्टी खुद आंतरिक विवादों से जूझ रही थी. पूर्व विधायक राजेंद्र भारती, जिनकी अयोग्यता के कारण यह उपचुनाव हुआ, पर कांग्रेस के एक वर्ग ने घनश्याम सिंह के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया था. चुनाव प्रचार के दौरान सिंह ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि भारती और उनके समर्थकों ने उनकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भीतरघात का असर सीमित वोटों तक ही रहेगा.नतीजे से कुछ समय पहले कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी से निष्कासित कर दिया. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि उन्होंने पार्टी के खिलाफ काम किया. वरिष्ठ कांग्रेस नेता मुकेश नायक भी उस विश्वासघात का उल्लेख करते हुए भावुक हो गए, जिसका उनके अनुसार पार्टी ने सामना किया था.

कांग्रेस ने विरोध का सफलता से किया सामना

इसके बावजूद कांग्रेस ने कथित तौर पर राजेंद्र भारती और टिकट के दूसरे दावेदार अवधेश नायक से जुड़े वार्डों में भी अच्छा प्रदर्शन किया. इससे एक असामान्य राजनीतिक तस्वीर सामने आती है - दोनों दलों को विद्रोह का सामना करना पड़ा, लेकिन केवल एक पार्टी उसे सफलतापूर्वक संभाल सकी.कांग्रेस के भीतर गुटबाजी थी, लेकिन उसके पास स्वतंत्र स्थानीय जनाधार वाला उम्मीदवार भी था. बीजेपी के पास मजबूत संगठन था, लेकिन उसका उम्मीदवार विरोधी गुटों और परस्पर टकराती राजनीतिक अपेक्षाओं के बीच फंसा हुआ था.

उपचुनावों के पारंपरिक ढर्रे से अलग दतिया का जनादेश

यह परिणाम मध्य प्रदेश के पिछले उपचुनावों के व्यापक राजनीतिक रुझान के भी विपरीत है. 2014 से 2026 के बीच राज्य में लोकसभा और विधानसभा की कुल 52 सीटों पर उपचुनाव हुए. इनमें बीजेपी ने लगभग 63 प्रतिशत और कांग्रेस ने लगभग 37 प्रतिशत चुनाव जीते.

उपचुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को पारंपरिक रूप से बढ़त मिलती है, क्योंकि मतदाता अक्सर विकास राशि और प्रशासनिक सहयोग की उम्मीद में सरकार के साथ तालमेल बैठाना पसंद करते हैं.कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने और दोबारा चुनाव लड़ने वाले विधायकों की सफलता दर तो 70 प्रतिशत से भी अधिक रही है.

दतिया ने इस रुझान को अस्वीकार कर दिया. बीजेपी ने केवल ऐसी विपक्षी सीट नहीं गंवाई, जो पहले से उसकी पहुंच से बाहर थी. वह सत्ता में होने, वरिष्ठ नेतृत्व को मैदान में उतारने, उम्मीदवार बदलने और कांग्रेस के भीतर खुले आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद चुनाव हार गई.नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि चुनाव केवल बीजेपी ने नहीं, बल्कि पूरी सरकार ने लड़ा था. यह विपक्ष की स्वाभाविक राजनीतिक भाषा हो सकती है, लेकिन परिणाम ने इस बयान को राजनीतिक वजन दे दिया. कांग्रेस ने उस सीट पर सत्तारूढ़ दल के लाभ को मात दी, जो वर्षों तक बीजेपी के सबसे पहचान योग्य प्रदेश नेताओं में से एक से जुड़ी रही.
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बीजेपी नेतृत्व और नरोत्तम मिश्रा के लिए बड़े सबक

पूरी हार का बोझ केवल आशुतोष तिवारी पर डालना अनुचित होगा. उन्हें ऐसा चुनाव विरासत में मिला, जिसमें टिकट ही सबसे बड़ा विवाद बन चुका था. उनसे अपेक्षा की गई कि वे पुरानी व्यवस्था को छेड़े बिना बदलाव का प्रतीक बनें, मिश्रा का उम्मीदवार दिखाई दिए बिना उनके संगठन को विरासत में लें और मिश्रा समर्थकों को नाराज किए बिना मिश्रा विरोधी मतदाताओं को अपने साथ लाएं. ये अपेक्षाएं एक-दूसरे से मेल ही नहीं खाती थीं. मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश बीजेपी संगठन के लिए यह हार ऊपर से उम्मीदवार बदलने की राजनीति की सीमाओं की चेतावनी है. टिकट की घोषणा कुछ मिनटों में बदली जा सकती है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक संरचना नहीं.नरोत्तम मिश्रा के लिए भी यह परिणाम उतना ही असहज है. यदि पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि उनके समर्थकों ने पूरे मन से काम नहीं किया, तो संगठन पर उनका नियंत्रण और अनुशासन कायम रखने की क्षमता सवालों के घेरे में आएगी. यदि यह माना जाता है कि उन्होंने पूरी ताकत से प्रचार किया और फिर भी बीजेपी हार गई, तो उनके बचे हुए राजनीतिक प्रभाव की सीमा पर सवाल उठेंगे. दोनों ही व्याख्याएं उन्हें कमजोर करती हैं.कांग्रेस के लिए यह जीत ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में नई राजनीतिक ऊर्जा दे सकती है, लेकिन इसे पूरे प्रदेश में कांग्रेस की लहर का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी. उसकी सफलता कई कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम रही - एक मजबूत स्थानीय उम्मीदवार, बीजेपी की गुटबाजी, सत्तारूढ़ दल की कमजोर बूथ सक्रियता और ऐसा अभियान, जिसमें विपक्षी पार्टी कभी तय ही नहीं कर सकी कि वास्तविक कमान किसके हाथ में है.
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