बुंदेलखंड और चंबल की सीमा पर बसी दतिया विधानसभा सीट मध्यप्रदेश की हाई-प्रोफाइल सीटों में शुमार है. यहां 30 जुलाई को उपचुनाव में जनता अपने नए विधायक के नाम पर मुहर लगाएगी. जिसके लिए आज यानि मंगलवार शाम 5 बजे चुनाव प्रचार थम जाएगा. प्रचार के अंतिम घंटों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.मुख्य मुकाबला बीजेपी के आशुतोष तिवारी और कांग्रेस के पूर्व विधायक घनश्याम सिंह के बीच माना जा रहा था. हालांकि, आजाद समाज पार्टी (ASP) और दामोदर यादव की चुनावी मैदान में मौजूदगी से यह चुनाव अब त्रिकोणीय मुकाबले का रुप ले चुका है. वैसे देखा जाए तो दतिया में हुए पिछले चुनाव इस बात के गवाह हैं कि ये सीट बीजेपी का गढ़ तो रही है लेकिन फिर भी जीत के लिए उसे भी कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा है. इस बार का मतदान तय करेगा कि दतिया की जनता 2023 के बदलाव के फैसले पर कायम रहती है या बीजेपी अपने पुराने गढ़ को दोबारा हासिल करने में कामयाब होती है.
अंतिम घंटों में ताकत का प्रदर्शन और बैठकों का दौर
प्रचार के अंतिम दिन कांग्रेस ने दतिया में पूरी सियासी ताकत झोंक दी है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और वरिष्ठ विधायक फूल सिंह बरैया की अगुवाई में बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया गया. वहीं बीजेपी के बड़े नेताओं ने गांव-गांव जाकर चौपालों के जरिए अंतिम वोट बैंक को साधने की रणनीति बनाई है.
ये दलबदल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मां पीतांबरा पीठ में दर्शन के कार्यक्रम के बाद हुई एक संक्षिप्त सभा में पूरा भी हो गया. अब आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं पिछले तीन चुनावों में दतिया की जनता ने क्या फैसला सुनाया है.
पिछले तीन चुनावों के नतीजे
दतिया विधानसभा सीट लंबे समय तक बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का गढ़ मानी जाती रही है. हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराकर बड़ा सियासी उलटफेर किया था. पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं

जातीय समीकरणों की उलझन और उम्मीदवारों की साख
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया में उम्मीदवारों का चयन और जातीय गणित चुनाव का रुख तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा. इस विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण, कुशवाहा, यादव और दलित (अनुसूचित जाति) मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है. बीजेपी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बजाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पृष्ठभूमि वाले आशुतोष तिवारी पर दांव खेला है. वहीं कांग्रेस ने दतिया के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और अनुभवी नेता घनश्याम सिंह को प्रत्याशी बनाया है. यादव वोट बैंक को साधने के लिए बीजेपी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रभाव पर भरोसा जता रही है. दूसरी ओर, आजाद समाज पार्टी की मौजूदगी और स्थानीय स्तर पर असंतुष्ट गुटों का रुख दलित और पिछड़ा वर्ग के वोटों में बंटवारा कर सकता है
अब कैसे खाली हुई दतिया विधानसभा सीट?
दतिया सीट पर उपचुनाव की स्थिति दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत के एक फैसले के बाद बनी. इसी वर्ष 2 अप्रैल को अदालत ने को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले के एक पुराने मामले में दतिया के तत्कालीन कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को दोषी पाते हुए तीन साल के कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी.सजा का ऐलान होते ही मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत राजेंद्र भारती की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी. सीट रिक्त घोषित होने के बाद निर्वाचन आयोग ने इस उपचुनाव का ऐलान किया.
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30 जुलाई को तय होगा दतिया का जनादेश
देखा जाए तो दतिया उपचुनाव केवल एक विधायक चुनने का चुनाव नहीं है, बल्कि यह बुंदेलखंड और चंबल सीमांत क्षेत्र में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए साख का सवाल है. बीजेपी जहां अपनी इस पारंपरिक सीट को फिर से हासिल करने के प्रयास में है, वहीं कांग्रेस अपनी जीती हुई सीट को बचाने के लिए पूरी तरह एकजुट नजर आ रही है. 30 जुलाई के मतदान में दतिया की जनता यह तय करेगी कि वह किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधती है.
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