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छत्तीसगढ़: 'मदिरा प्रेमियों' ने भरा सरकारी खजाना, 10,751 करोड़ के राजस्व पर सत्ता-विपक्ष में 'शराब युद्ध'

छत्तीसगढ़ में शराबबंदी को लेकर सियासत तेज हो गई है. राज्य में 703 शराब दुकानों से हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व मिल रहा है. सरकार इसे विकास योजनाओं से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष और सामाजिक संगठन इसके सामाजिक दुष्प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं.

छत्तीसगढ़: 'मदिरा प्रेमियों' ने भरा सरकारी खजाना, 10,751 करोड़ के राजस्व पर सत्ता-विपक्ष में 'शराब युद्ध'
शराबबंदी के मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस के नेता आमने-सामने आए।

छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है. एक तरफ सरकार शराब बिक्री से हो रही रिकॉर्ड कमाई को विकास योजनाओं की मजबूती से जोड़ रही है, तो वहीं विपक्ष और सामाजिक संगठन इसे समाज के लिए गंभीर खतरा बता रहे हैं. राज्य में 703 दुकानों के जरिए हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व आना सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसी के साथ शराबबंदी की मांग भी तेज होती जा रही है.

राजस्व में जोरदार बढ़ोतरी

छत्तीसगढ़ में शराब बिक्री ने सरकार की आय में बड़ा इजाफा किया है. साल 2019-20 में जहां करीब 4,952 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था, वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 10,751 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यानी करीब दोगुना इजाफा. सरकार ने अगले वित्तीय सत्र 2026-27 के लिए इसमें 10 प्रतिशत और बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा है. यह साफ संकेत है कि आबकारी विभाग राज्य की आमदनी का बड़ा जरिया बन चुका है.

योजनाओं के लिए जरूरी आय- सरकार

राज्य के आबकारी मंत्री लखन देवांगन का कहना है कि बढ़ा हुआ राजस्व ही विभिन्न जनकल्याण योजनाओं को गति दे रहा है. उनके मुताबिक महतारी वंदन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने में इस आय की अहम भूमिका है. सरकार का तर्क है कि संसाधन बढ़ेंगे तभी विकास तेज होगा.

समाज पर पड़ रहा असर- विपक्ष

वहीं, कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार को घेर रही है. पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का कहना है कि शराब से मिलने वाली आय को महिलाओं की योजना से जोड़ना सही नहीं है. उनका मानना है कि शराब से केवल राजस्व नहीं, बल्कि सामाजिक नुकसान भी होता है, जिसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं और परिवारों पर पड़ता है. विपक्ष का जोर इस बात पर है कि सरकार को केवल कमाई के नजरिए से नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के साथ इस मुद्दे को देखना चाहिए.

मुद्दा पुराना, बहस नई

छत्तीसगढ़ में शराबबंदी का मुद्दा नया नहीं है. 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शराबबंदी का वादा किया था, लेकिन बाद में शराब से जुड़े कथित 2000 करोड़ रुपये के घोटाले में कई लोग फंसे. इस मामले में ईडी और ईओडब्ल्यू की जांच अब भी जारी है. यही वजह है कि शराबबंदी का मुद्दा हर चुनाव और हर बड़े राजनीतिक मौके पर फिर से उठता है.

आंकड़े क्या कहते हैं?

उपलब्ध रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य की करीब 35.6 प्रतिशत आबादी शराब का सेवन करती है. खपत के मामले में छत्तीसगढ़ देश में सबसे आगे बताया जाता है. राजस्व के आंकड़े भी लगातार बढ़ते ग्राफ को दिखाते हैं...

  • 2019-20: 4,952 करोड़ रुपये
  • 2020-21: 4,636 करोड़ रुपये
  • 2021-22: 5,110 करोड़ रुपये
  • 2022-23: 6,783 करोड़ रुपये
  • 2023-24: 8,430 करोड़ रुपये
  • 2024-25: 10,145 करोड़ रुपये
  • 2025-26: 10,751 करोड़ रुपये

राज्य में फिलहाल 703 शराब दुकानें संचालित हो रही हैं, जो इस पूरे तंत्र का आधार हैं.

महिलाओं और समाज की चिंता

सामाजिक संगठनों और महिला समूहों का कहना है कि शराब का असर सीधे परिवारों पर पड़ रहा है. पद्मश्री शमसाद बेगम का कहना है कि शराब के कारण घरेलू हिंसा, सड़क हादसे और अपराध बढ़े हैं. उनका दावा है कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा. 

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