- केंद्र सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की एक ऐसी योजना को मंजूरी दी है जिसे 'समुद्र मंथन' का नाम दिया गया है.
- भारत आज अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल और लगभग 50% प्राकृतिक गैस आयात करता है.
- सरकार ने गहरे समुद्र में तेल और गैस की तलाश करने और भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह कदम उठाया है.
अगर आपसे पूछा जाए कि भारत अपनी जरूरत का सबसे ज्यादा कच्चा तेल कहां से लाता है? तो जवाब होगा- विदेशों से. ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के चलते होर्मुज स्ट्रेट के बाधित रहने के दौरान तेल की सप्लाई बाधित होने की वजह से आज हम सभी जानते हैं कि भारत आज अपनी जरूरत का करीब 85 फीसद कच्चा तेल और लगभग 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस आयात करता है. इसका मतलब है कि अगर युद्ध छिड़ जाए, समुद्री रास्ते बंद हो जाएं या तेल की कीमतें अचानक बढ़ जाएं, तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम लोगों की जेब पर पड़ता है. इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी योजना तैयार की है, जिसका नाम है समुद्र मंथन योजना.
करीब 84,084 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना का मकसद भारत के समुद्रों की गहराइयों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार की खोज को तेज करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना है.
आखिर क्यों पड़ी इस योजना की जरूरत?
भारत के पास मौजूद कई पुराने तेल और गैस क्षेत्र अब परिपक्व हो चुके हैं. इनसे उत्पादन धीरे-धीरे घट रहा है. दूसरी ओर भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं. इलेक्ट्रिक वाहन आने के बावजूद आने वाले कई दशकों तक तेल और गैस की मांग बनी रहेगी. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत के समुद्री इलाकों, खासकर गहरे समुद्र यानी डीपवाटर और अल्ट्रा डीपवाटर क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में हाइड्रोकार्बन मौजूद हो सकते हैं. लेकिन इनकी खोज बेहद महंगी और तकनीकी रूप से कठिन है. इसी वजह से कई कंपनियां इसमें निवेश करने से बचती रही हैं.
क्या है समुद्र मंथन योजना?
समुद्र मंथन योजना केंद्र सरकार की एक वित्तीय सहायता योजना है. इसका उद्देश्य उन कंपनियों को आर्थिक सहयोग देना है जो भारत के गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज करेंगी. सरकार इस योजना के जरिए जोखिम का कुछ हिस्सा अपने ऊपर लेगी ताकि निजी और सरकारी कंपनियां ज्यादा निवेश करने के लिए आगे आएं. यानी अगर किसी क्षेत्र में खोज सफल नहीं होती, तब भी कंपनियों का पूरा पैसा डूबने का खतरा कम होगा.

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84084 करोड़ रुपये कहां खर्च होंगे?
सरकार ने इस पूरी राशि को चार हिस्सों में बांटा है.
- समुद्र के नीचे तेल और गैस की खोज (सिस्मिक सर्वे) में 28,534 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इससे समुद्र के नीचे मौजूद तेल और गैस के संभावित भंडार का आधुनिक तकनीक से सर्वे किया जाएगा.
- ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए 10000 करोड़ रुपये रखे गए हैं. अगर कहीं तेल या गैस मिलती है, तो उसे निकालने और बाजार तक पहुंचाने के लिए समुद्र में साझा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा.
- भारत में उपकरण निर्माण में 2000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा. तेल और गैस उद्योग में इस्तेमाल होने वाले जरूरी उपकरण और सेवाओं का निर्माण भारत में बढ़ाया जाएगा ताकि विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम हो.
- ड्रिलिंग के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी. सबसे बड़ा हिस्सा कंपनियों को जोखिम कम करने के लिए दिया जाएगा. सरकार प्रत्येक योग्य कुएं की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत या 675 करोड़ रुपये, जो भी कम हो, तक सहायता दे सकती है.
डीपवाटर और अल्ट्रा डीपवाटर क्या होते हैं?
इस योजना सबसे बड़ा मकसद भारत के समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार की खोज को तेज करना है. खास तौर पर डीपवाटर (गहरे समुद्र) और अल्ट्रा डीपवाटर (अत्यधिक गहरे समुद्र) क्षेत्रों में.
समुद्र में जहां पानी की गहराई लगभग 500 मीटर से ज्यादा होती है, उसे डीपवाटर कहा जाता है. जब यही गहराई 1,500 मीटर या उससे ज्यादा हो जाती है, तो उसे अल्ट्रा डीपवाटर कहा जाता है. इतनी गहराई में ड्रिलिंग करना बेहद कठिन होता है. इसकी वजह यह है कि गहरे समुद्र में पानी का अत्यधिक दबाव होता है, साथ ही वहां तापमान भी बेहद कम करीब 1 से 5 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच होता है.
हालांकि उस गहरे पानी में भी अत्याधुनिक तकनीक की बदौलत बनीं महंगी मशीनों से खुदाई संभव हुआ है. यही कारण है कि ऐसे प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे महंगे ऊर्जा प्रोजेक्ट माने जाते हैं.

भारत किन इलाकों में करेगा खोज?
एक्सपर्ट्स के अनुसार भारत के कई समुद्री बेसिन में अभी पूरी तरह खोज नहीं किए गए हैं. कृष्णा-गोदावरी बेसिन, महानदी बेसिन, कावेरी बेसिन, अंडमान क्षेत्र, पश्चिमी तट के पास अरब सागर में और पूर्वी हिस्से यानी बंगाल की खाड़ी में पानी के अंदर कई ऐसे इलाके हैं जहां भविष्य में बड़े तेल और गैस के भंडार मिलने की संभावना जताई जाती रही है.
इससे भारत को क्या फायदा होगा?
आयात पर निर्भरता घटेगी: अगर देश में ज्यादा तेल और गैस मिलने लगती है तो विदेशों से आयात कम करना पड़ेगा. सरकार का अनुमान है कि अगर यह योजना सफल रहती है, तो भारत हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपये के कच्चे तेल के आयात में कमी ला सकता है.
विदेशी मुद्रा की बचत: भारत हर साल लाखों करोड़ रुपये का कच्चा तेल आयात करता है. घरेलू उत्पादन बढ़ने पर यह खर्च कम हो सकता है.
ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी: युद्ध, वैश्विक संकट या समुद्री तनाव के समय भी देश के पास घरेलू ऊर्जा स्रोत उपलब्ध रहेंगे.
रोजगार बढ़ेंगे: ऑफशोर ड्रिलिंग, इंजीनियरिंग, जहाज निर्माण, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी सेवाओं में हजारों नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं.
मेक इन इंडिया को मिलेगा बढ़ावाः ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के घरेलू निर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा.
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
समुद्र में तेल और गैस निकालना आसान काम नहीं है. इनकी बेहद ऊंची लागत, निवेश करने के बाद कई सालों तक इंतजार, पर्यावरण से जुड़े जोखिम, समुद्री जैव विविधता पर असर, तेल रिसाव का खतरा और अंतरराष्ट्रीय तकनीक पर निर्भरता जैसी कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. यही कारण है कि सरकार को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा.

क्या इससे पेट्रोल और डीजल सस्ते हो जाएंगे?
इस सवाल का सीधा जवाब कई बातों पर निर्भर है. सबसे पहले तो लागत की तुलना में तेल कितनी मात्रा में मिलती है और इसमें कितना वक्त लगेगा. हां, अगर भविष्य में भारत का घरेलू उत्पादन काफी बढ़ जाता है और आयात पर निर्भरता घट जाती है. तो ऊर्जा लागत पर सकारात्मक असर पड़ सकता है. जिसका लाभ आमजनों तक भी पहुंचेगा.
लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल के उत्पादन पर निर्भर नहीं करतीं. टैक्स, रिफाइनिंग लागत, परिवहन और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. इसलिए अंतिम कॉस्ट निकालने के बाद ही कोई लाभ आमजनों तक पहुंचेगा.
क्या यह भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है?
एनर्जी एक्सपर्ट मानते हैं कि आने वाले 20 से 30 वर्षों तक दुनिया पूरी तरह अक्षय ऊर्जा पर नहीं पहुंच पाएगी. ऐसे में तेल और प्राकृतिक गैस की भूमिका बनी रहेगी. अगर समुद्र मंथन योजना के तहत बड़े भंडार मिलते हैं और उनका व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है, तो भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. ऐसे में सरकार का यह फैसला केवल तेल और गैस खोजने की योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक मजबूती की दिशा में एक बड़ा कदम है.
समुद्र मंथन योजना भारत की ऊर्जा रणनीति का एक अहम हिस्सा है. 84,084 करोड़ रुपये का यह निवेश केवल समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य देश को भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों के लिए तैयार करना है. यदि यह मिशन सफल रहता है, तो भारत की आयात निर्भरता घट सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और घरेलू उद्योगों के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
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