रेल मंत्रालय के अनुसार, साल 2019 से 2025 के बीच भारतीय रेलवे ने 33,000 किलोमीटर से ज्यादा रेल मार्गों का विद्युतीकरण किया है. ये इलेक्ट्रिफाई की गई दूरी लगभग जर्मनी के पूरे रेलवे नेटवर्क के बराबर है. इस बीच आज पीएम नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई है. जिसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन से ट्रेनें चलती हैं. भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कुल 10 डिब्बों की है. जो कि अपनी बिजली खुद बनाती है. सबसे खास बात ये कि इससे धुएं की जगह केवल पानी की भाप निकलती है. यानी ये किसी भी तरह का प्रदूषण नहीं फैलती है.

लेकिन इन सबके बीच ये सवाल जरूर दिमाग में आता है कि जब इलेक्ट्रिक ट्रेन चलाना सबसे बेहतर और किफायती विकल्प माना जाता है, तो आखिर क्यों भारतीय रेलवे हाइड्रोजन ट्रेनों पर भी काम करने पर लगा हुआ है.
बाकी देशों में चलने वाली ट्रेन के मुकाबले भारत की ट्रेन की क्या है खासियत?
- जींद और सोनीपत के बीच ये ट्रेन 89 किलोमीटर की दूरी यह ट्रेन दो घंटे में पूरा करेगी. इस दौरान यह 12 स्टेशनों पर रुकेगी.
- भारत की ये हाइड्रोजन ट्रेन ‘मेक इन इंडिया' अभियान का एक सफल उदाहरण है.
- यह हाइड्रोजन ट्रेन दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन चालित ट्रेन है.
- दुनिया की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन (Coradia iLint) लगभग 600 हॉर्सपावर के आसपास की थी. वहीं भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन में लगा इंजन 3,200 हॉर्सपावर (1,200 किलोवाट) का है.
- यह ट्रेन ‘हाइड्रोजन फ्यूल सेल' तकनीक से संचालित होती है.
- इस तकनीक में हाइड्रोजन को बिजली में बदला जाता है, जिससे ट्रेन को चलाने के लिए आवश्यक ऊर्जा मिलती है.
- सबसे खास बात भारत की इस हाइड्रोजन ट्रेन में 10 डिब्बे हैं, यह अब तक सबसे लंबी हाइड्रोजन चालित यात्री ट्रेनों में शामिल है.
हाइड्रोजन ट्रेन की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में रेल का नेटवर्क काफी फैला हुआ है. ऐसे में हर रूट पर ओवरहेड बिजली लाइन लगाना काफी महंगा साबित होता है. खासकर पहाड़ी और दूरदराज वाले इलाकों में रेल मार्ग पर इलेक्ट्रिफिकेशन की लागत बहुत अधिक पड़ती है. वहीं हाइड्रोजन ट्रेन इसके मुकाबले कम लागत लेती हैं. जिन रूट पर कम भीड़ होती है और जहां रोज कम ट्रेनें चलती हैं, वहां हाइड्रोजन ट्रेन इलेक्ट्रिक इंफ्रास्ट्रक्चर किफायती साबित होता है. भारतीय रेलवे का लक्ष्य साल 2030 तक नेट-जीरो कार्बन एमिशन का है. इस लक्ष्य को पूरा करने में हाइड्रोजन तकनीक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.
हाइड्रोजन ट्रेन ले सकती हैं इलेक्ट्रिक ट्रेनों की जगह?
इलेक्ट्रिक ट्रेन को को हटाना नहीं जा सकती है. हाइड्रोजन ट्रेनें केवल इनका एक पूरक हो सकती है. जिन इलाकों में ओवरहेड बिजली लाइन बिछाना मुश्किल या महंगा होता है. वहां के लिए हाइड्रोजन ट्रेन एक अच्छा ऑप्शन है. अभी दुनिया में बहुत कम देश हैं, जो हाइड्रोजन ट्रेन सिस्टम पर काम कर रहे हैं. भारत जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों ही रेल ट्रांसपोर्टेशन के लिए हाइड्रोजन के इस्तेमाल पर काम चल रहा है.
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