Mutual Divorce: शादी टूटना कभी आसान नहीं होता है, लेकिन हर रिश्ता लड़ाई-झगड़े और कड़वाहट के साथ खत्म हो, ये भी जरूरी नहीं. आजकल कई कपल्स समझदारी दिखाते हुए म्यूचुअल डिवोर्स ले रहे हैं, जहां तलाक आपसी सहमति से लिया गया फैसला होता है. इसमें न कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं, न एक-दूसरे पर आरोप लगाने की नौबत आती है, सिर्फ शांत तरीके से अलग होने की प्रोसेस होती है. इन दिनों म्यूचुअल डिवोर्स काफी चर्चाओं में है. आइए जानते हैं यह होता क्या है, कैसे होता है और इसमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
म्यूचुअल डिवोर्स क्या होता है
म्यूचुअल डिवोर्स में पति और पत्नी दोनों मिलकर ये तय करते हैं कि अब इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना है. इसमें कोई एक दूसरे पर आरोप नहीं लगाता, बल्कि दोनों अपनी मर्जी से कोर्ट में जाकर शादी खत्म करने की अर्जी देते हैं. इस प्रक्रिया में सबसे खास बात ये होती है कि पहले से ही बच्चे, पैसे और संपत्ति से जुड़े मुद्दों पर आपसी सहमति बना ली जाती है, जिससे आगे किसी तरह का विवाद न हो.
भारत में इसका कानून क्या कहता है
भारत में म्यूचुअल डिवोर्स को कानून पूरी तरह मान्यता देता है. अलग-अलग धर्मों के लिए अलग कानून जरूर हैं, लेकिन हर जगह एक बात कॉमन है, तलाक तभी होगा जब दोनों पक्ष अपनी मर्जी से इसके लिए तैयार हों. कोर्ट भी यही देखता है कि फैसला किसी दबाव या धोखे में नहीं लिया गया है, बल्कि दोनों ने सोच-समझकर ये कदम उठाया है.
म्यूचुअल डिवोर्स के लिए जरूरी शर्तें
1. म्यूचुअल डिवोर्स लेने के लिए कुछ बेसिक शर्तें होती हैं, जिनका पूरा होना जरूरी है. सबसे पहले, कपल को कम से कम एक साल से अलग रहना चाहिए, ताकि ये साबित हो सके कि रिश्ता वास्तव में टूट चुका है.
2. इसके अलावा दोनों की सहमति पूरी तरह से स्वेच्छा से होनी चाहिए, यानी किसी भी तरह का दबाव या मजबूरी नहीं होनी चाहिए. इसके साथ ही बच्चे की कस्टडी, खर्च और प्रॉपर्टी जैसी चीजों पर पहले से ही आपसी सहमति होना जरूरी होता है, ताकि कोर्ट में कोई विवाद न बचे.
म्यूचुअल डिवोर्स का पूरा प्रोसेस
1. म्यूचुअल डिवोर्स की प्रक्रिया एक तय क्रम में चलती है. सबसे पहले दोनों मिलकर एक जॉइंट पिटीशन तैयार करते हैं, जिसमें यह लिखा होता है कि वे आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं और सभी मुद्दों पर पहले ही सहमति बन चुकी है. इसके बाद कोर्ट में पहली सुनवाई होती है, जहां जज दोनों से उनकी मर्जी की पुष्टि करता है.
2. पहली सुनवाई के बाद आमतौर पर कोर्ट 6 महीने का 'कूलिंग ऑफ पीरियड' देता है, ताकि अगर कपल चाहें तो अपने फैसले पर दोबारा विचार कर सकें. हालांकि, कुछ मामलों में अगर कोर्ट को लगता है कि रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका है, तो यह समय कम या खत्म भी किया जा सकता है.
3. इसके बाद दूसरी सुनवाई होती है, जिसमें दोनों फिर से अपनी सहमति दोहराते हैं. अगर कोर्ट को सब कुछ सही लगता है, तो वह तलाक की फाइनल डिक्री जारी कर देता है और शादी कानूनी रूप से खत्म हो जाती है.
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