जब भी 1971 के भारत पाक युद्ध की बात होती है. लोंगेवाला पोस्ट का नाम अपने आप सामने आ जाता है. यही वो जगह है जहां सीमित संसाधनों और कम सैनिकों के बावजूद भारतीय सेना ने दुश्मन को रोका और इतिहास रच दिया. इस साहसिक मुकाबले के केंद्र में थे मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी. फिल्म बॉर्डर ने इस कहानी को घर घर तक पहुंचाया. लेकिन रियल लाइफ में मेजर चांदपुरी की बहादुरी, सूझबूझ और लीडरशिप कहीं ज्यादा इंस्पिरेशनल रही है.
कौन थे मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी
मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट के अधिकारी थे. सादा जीवन, मजबूत अनुशासन और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उनकी पहचान थी. सैनिकों के बीच वो एक भरोसेमंद कमांडर के रूप में जाने जाते थे. जो हर हाल में अपने जवानों के साथ खड़े रहते थे.
लोंगेवाला पोस्ट की वो ऐतिहासिक रात
4 और 5 दिसंबर 1971 की रात पाकिस्तान की बड़ी टुकड़ी टैंकों के साथ लोंगेवाला पोस्ट की ओर बढ़ी. भारतीय चौकी पर सैनिक कम थे. लेकिन मेजर चांदपुरी ने पीछे हटने के बजाय मोर्चा संभालने का फैसला किया. अंधेरी रात, रेगिस्तान और भारी दबाव के बीच उन्होंने हर कदम सोच-समझकर उठाया.
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सूझ-बूझ और लीडरशिप की मिसाल
मेजर चांदपुरी ने जवानों का हौसला बनाए रखा और सही जगहों पर हथियार तैनात किए. उन्होंने समय रहते उच्च अधिकारियों को स्थिति की जानकारी दी और मदद मांगी. उनकी रणनीति साफ थी. दुश्मन को रोके रखना, जब तक मदद न पहुंच जाए. यही फैसला लड़ाई का टर्निंग पॉइंट बना.
एयरफोर्स के साथ तालमेल
सुबह होते ही भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने मोर्चा संभाला. दुश्मन के टैंक और वाहन रेगिस्तान में फंस गए. ये तालमेल मेजर चांदपुरी की सूझ-बूझ का नतीजा था. जिसकी वजह से सीमित बल के बावजूद पाकिस्तान की सेना को पीछे हटना पड़ा.
आज भी जिंदा है विरासत
मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को उनकी बहादुरी के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. उनकी कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि नेतृत्व, धैर्य और देशभक्ति की मिसाल है. लोंगेवाला की दहाड़ आज भी हर भारतीय को गर्व से भर देती है. बॉर्डर फिल्म के जरिए उनकी विरासत तक घर घर तक पहुंच गई है.
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