Jantar Mantar Protest History: दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस के पास स्थित ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर अब प्रदर्शन नहीं हो पाएंगे. गृह मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश के बाद अब दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए तीन नई जगहों को चिन्हित किया गया है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और छात्रों के प्रदर्शन के बाद ये फैसला लिया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे मौजूदा प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस की तरफ से इसकी जानकारी दी गई है. ऐसे में आज हम आपको जंतर-मंतर का पूरा इतिहास और यहां होने वाले बड़े प्रदर्शनों के बारे में बताएंगे. साथ ही ये भी जानेंगे कि कैसे जंतर-मंतर राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन का एक प्रतीक बन गया.
खगोल विज्ञान की जादुई दुनिया जंतर-मंतर को किसने बनवाया
आज भले ही जंतर-मंतर की पहचान धरने और नारों से होती हो, लेकिन इतिहास के पन्नों में यह भारत की महान वैज्ञानिक प्रगति का जीता-जागता सबूत है. इसका निर्माण जयपुर के राजा महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था. राजा जयसिंह को गणित और खगोल विज्ञान (Astronomy) से गहरा लगाव था.
जंतर-मंतर कब बनवाया गया
18वीं सदी की शुरुआत 1724 ई. में मुगल सम्राट मोहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान ग्रहों और नक्षत्रों की गणना को सही करने के लिए दिल्ली में देश की पहली वेधशाला (Observatory) बनाई गई. दिल्ली के अलावा राजा जयसिंह ने जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी ऐसी ही 5 वेधशालाएं बनवाई थीं. संस्कृत में जंतर का मतलब यंत्र यानी उपकरण और मंतर यानी मंत्र का अर्थ गणना करना है. यानी जंतर-मंतर का मतलब 'समय और ग्रहों की गणना करने वाली मशीन' होता है.

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पत्थरों से समय मापने वाले अनोखे यंत्र
राजा जयसिंह ने पीतल या अन्य धातुओं की जगह ईंट-पत्थरों से विशाल यंत्र बनवाए, ताकि मौसम बदलने पर भी गणना सटीक रहे. इसमें मुख्य रूप से चार यंत्र शामिल हैं. सम्राट यंत्र, जो 70 फीट ऊंची विशाल धूपघड़ी (Sun Dial) है. यह सूर्य की छाया से सेकंड के हिस्से तक का सटीक स्थानीय समय बताती है. जय प्रकाश यंत्र कटोरी के आकार का है, जो रात या दिन में आसमान में तारों और ग्रहों की सही स्थिति मापने के काम आता था. राम यंत्र बेलनाकार (सर्कुलर) इमारतों वाला है और तारों और ग्रहों की ऊंचाई नापने के लिए बनाया गया था. मिश्र यंत्र पांच अलग-अलग यंत्रों का मेल है, जो दिल्ली में बैठे-बैठे दुनिया के दूसरे शहरों जैसे ज्यूरिख या समरकंद में दोपहर होने का सही समय बता देता था.
जंतर-मंतर कैसे बना आंदोलनों का नया ठिकाना?
जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल बनने के पीछे एक बहुत दिलचस्प कहानी है. पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए दूसरी जगहें तय थीं. 1980 के दशक तक दिल्ली में ज्यादातर आंदोलन अकबर रोड या इंडिया गेट के पास बने बोट क्लब पर हुआ करते थे. अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसान अपने मवेशियों (गायों-भैंसों) के साथ बोट क्लब पहुंच गए. हफ्ते भर चले इस प्रदर्शन से पूरा इलाका ठप हो गया. इसके बाद सरकार ने सुरक्षा और व्यवस्था को देखते हुए बोट क्लब पर रैलियों पर रोक लगा दी.
1993 से शुरू हुई नई परंपरा
बोट क्लब बंद होने के बाद संसद भवन के पास स्थित जंतर-मंतर को आधिकारिक तौर पर प्रदर्शनकारियों के लिए तय किया गया. यहां पहला बड़ा प्रदर्शन साल 1993 में डूसू (DUSU) अध्यक्ष आशीष सूद के नेतृत्व में हुआ था. तब से लेकर आज तक यह देश की आवाज उठाने का मुख्य मंच बन चुका है.

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जंतर-मंतर के बड़े आंदोलन जिन्होंने देश की राजनीति हिला दी
अन्ना हजारे का लोकपाल आंदोलन (2011)
भ्रष्टाचार के खिलाफ और मजबूत लोकपाल बिल की मांग को लेकर अन्ना हजारे ने यहीं से भूख हड़ताल शुरू की थी. इस आंदोलन ने पूरे देश को जोड़ दिया और यहीं से कई नए राजनेताओं का उदय हुआ.
नर्मदा बचाओ आंदोलन और तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन
2013 में मेधा पाटकर के नेतृत्व में विस्थापितों के हक की लड़ाई यहां लड़ी गई. 2017 में सूखा राहत और कर्ज माफी की मांग को लेकर दक्षिण भारत के किसानों ने यहां महीनों तक अनोखे तरीकों से प्रदर्शन किया.
कोर्ट की पाबंदी और वापसी
साल 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गंदगी और शोर-शराबे का हवाला देकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी थी और सभी को रामलीला मैदान जाने को कहा था. हालांकि, साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटा दिया और दिल्ली पुलिस को नई गाइडलाइंस के साथ यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने का आदेश दिया.
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