Diamond Rain: अगर कोई कहे कि किसी ग्रह पर बारिश में पानी नहीं बल्कि हीरे गिरते हैं, अनगिनत हीरे, तो क्या आपको इस बात पर यकीन होगा? लेकिन ये बात बिल्कुल सच है. हीरों की बारिश वास्तव में होती है. पर कहां होती है और कब होती है, ये जानें.
कहां होती है हीरों की बारिश
यूरेनस और नेपच्यून को आइस जायंट (Ice Giants) कहा जाता है. इन ग्रहों के वायुमंडल में मीथेन (CH₄) की अच्छी-खासी मात्रा मौजूद है. वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्रहों के भीतर गहराई में दबाव लाखों गुना अधिक और तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच जाता है.
इन परिस्थितियों में मीथेन के अणु टूट जाते हैं और उनमें मौजूद कार्बन अलग होकर अत्यधिक दबाव में हीरे के क्रिस्टल में बदल जाता है. ये हीरे ग्रह के भीतर नीचे की ओर गिरते हैं, जिसे डायमंड रेन कहा जाता है.
वैज्ञानिकों ने कैसे किया इसका परीक्षण?
शोधकर्ताओं ने हमारी पृथ्वी पर ही लेजर की मदद से यूरेनस और नेपच्यून जैसी परिस्थितियां तैयार कीं. प्रयोग में प्लास्टिक (जिसमें कार्बन और हाइड्रोजन होते हैं) को अत्यधिक दबाव और तापमान में रखा गया, जिससे सूक्ष्म (नैनो) हीरों का निर्माण हुआ. इस प्रयोग ने इस सिद्धांत को मजबूत किया कि इन ग्रहों के भीतर वास्तव में हीरे बन सकते हैं.
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क्या वहां हीरों की मोटी परत भी हो सकती है?
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि लगातार बनने और नीचे गिरने वाले हीरे ग्रहों के अंदर बड़ी मात्रा में जमा होकर हीरों की मोटी परत बना सकते हैं. हालांकि, इसकी पुष्टि अभी संभव नहीं है क्योंकि इंसान इन ग्रहों के अंदर तक नहीं पहुंच सका है.
क्या पृथ्वी पर भी हो सकती है हीरों की बारिश?
नहीं. पृथ्वी पर ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि यहां का वायुमंडल, तापमान और दबाव यूरेनस व नेपच्यून जैसे ग्रहों से बिल्कुल अलग है. इसलिए पृथ्वी पर पानी, बर्फ या ओले तो गिर सकते हैं, लेकिन हीरों की बारिश नहीं होती.
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