- पंजाब में हिंदू और सिख समुदायों के बीच गहरा सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध होने के कारण ध्रुवीकरण मुश्किल है
- भाजपा पंजाब में विकास और सिख समुदाय पर फोकस करती है. कुछ प्रतीकों के जरिए ही सभी दल बात करते हैं.
- पंजाब के हिंदू वोटर जाति और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर वोट करते हैं, जिससे एकजुट हिंदू वोट बनाना कठिन होता है
भाजपा बीते कई चुनावों से पंजाब में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है. देश के कई राज्यों में उस पर हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने के आरोप लगते रहे हैं. सवाल है कि आखिर पंजाब में वह ऐसा क्यों नहीं कर पाती. पंजाब को लेकर इसकी एक वजह यह भी मानी जाती है कि राज्य में हिंदू भले ही बड़ी संख्या में हैं, लेकिन उनका सिखों के साथ रिश्ते अविभाज्य है. यदि वे हिंदू धर्म में आस्था रखते हैं तो सिखों की परंपरा का भी पूरा सम्मान करते हैं. दोनों ही समुदायों में किसी तरह के अलगाव का भाव नहीं है. इसके अलावा आरएसएस या फिर भाजपा भी यहां सिखों के विपरीत जाकर हिंदुओं को साथ लाने के बारे में विचार नहीं करते.
इसके अलावा पंजाब में सांस्कृतिक एकता भी दिखती है. यहां हिंदू की भाषा पंजाबी है और यह भी एकता का सूत्र है. इसके अलावा हिंदू भी कई ऐसे डेरों में आस्था रखते हैं, जिनसे सिख भी जुड़े हैं. पंजाब में भले ही 1 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले हिंदुओं का वोट 38 प्रतिशत है, लेकिन उनका पोलराइजेशन हिंदू होने के नाम पर नहीं होता. 2022 में राम मंदिर की लहर के दौर में भी आम आदमी पार्टी ने हिंदू बहुल 22 में से 15 सीटों पर जीत पाई थी. इसके बाद कांग्रेस को 5 और भाजपा को 2 पर जीत मिली थी. यही कारण है कि पंजाब में कभी हिंदू फोकस रणनीति नहीं बनी.
यहां ज्यादातर राजनीतिक दल कहते हैं कि हम हिंदू और सिख को लेकर अलग-अलग रणनीति नहीं बनाते. यहां रणनीतिकार मानते हैं कि हम दोनों को अलग ही नहीं मानते. राजनीतिक दल हिंदुओं को अपने ही तरीके से लुभाने के प्रयास करते हैं. सबका तरीका भी अलग ही है. जैसे 2013 में दिवंगत प्रकाश सिंह बादल ने तीन हिंदू शहीदों मति दास, सति दास और दयाल दास के नाम पर स्मारक का ऐलान किया था. हालांकि इस पर काम नहीं हो सका. इसके अलावा पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी में भगवान परशुराम चेयर भी है. परशुराम जयंती पर छुट्टी का भी ऐलान हुआ था, लेकिन अब तक अमल नहीं हुआ है.
यही नहीं आम आदमी पार्टी भी इस पर फोकस कर रही है. हाल ही में अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर में माता जानकी और बेटों लव और कुश के नाम पर मंदिर का ऐलान किया है. ऐसा शायद इसलिए किया गया है ताकि चुनाव से पहले भाजपा से मुकाबला किया जा सके. दिलचस्प बात यह है कि हिंदू मुद्दों को उठाने की चैंपियन भाजपा ने यहां ऐसा कोई ऐलान नहीं किया. शायद यह भी वजह है कि भाजपा को लगता है कि हिंदू वोट तो उसे मिल ही जाएंगे, लेकिन सिखों के बीच भी पैठ जरूरी है. भाजपा का फोकस पंजाब में विकास के मुद्दों पर ऐलान और सिखों पर रहा है. हाल ही में आए पीएम मोदी ने अफगानिस्तान से गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूपों को लाने की बात कही थी. इसके अलावा सिख समाज से जुड़े तीर्थों में दी गई सुविधाओं की बात उन्होंने की थी.
पंजाब में एक और बात यह है कि हिंदू वोटरों के नाम पर ध्रुवीकरण मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि समाज कई जातियों और क्षेत्र के नाम पर भी वोट करता है. राज्य में सवर्ण हिंदू की आबादी करीब 20 फीसदी है. इसके अलावा 18 से 19 पर्सेंट दलित और ओबीसी वर्ग के लोग हैं. यही नहीं जहां ओबीसी और दलितों की आबादी गांवों और कस्बों में है तो वहीं सवर्ण समाज की संख्या शहरों में ज्यादा है. भाजपा को 2024 में 18 फीसदी वोट पंजाब में मिला था. साफ है कि पार्टी का दायरा बढ़ रहा है, लेकिन अब भी जीत के उस जरूरी आंकड़े से दूरी है. यही वजह है कि भाजपा ने जाट सिख नेता केवल सिंह ढिल्लो को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. हिंदू जाट सुनील जाखड़ भी अहम भूमिका में हैं. फिर रवनीत सिंह बिट्टू का भी कद बढ़ाया गया है.
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