NEET Exam Changes : देश की सबसे कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट पेपर 2026 लीक होने से मचे बवाल के बाद सरकार ने कई सख्त कदम उठाए हैं. जिसमें फार्स्ट ट्रैक कोर्ट और हाई पावर्ड टास्क फोर्स शामिल है. इसके अलावा इन दिनों एक बड़ा बदलाव चर्चा में है, वो है नीट पेपर परीक्षा सीबीटी मोड में कराना. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि भविष्य में NEET परीक्षा को JEE Main की तर्ज पर साल में दो बार आयोजित करने और पेन-पेपर मोड की जगह कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) मोड में कराने पर विचार किया जा सकता है. हालांकि इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन यह प्रस्ताव लाखों मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इस मुद्दे पर जब एनडीटीवी ने एजुकेशन एक्सपर्ट रजनीश शर्मा से बात की तो उन्होंने साल में दो बार परीक्षा कराने के सुझाव का स्वागत किया, लेकिन साथ ही कंप्यूटर आधारित परीक्षा लागू करने से पहले देशभर में जरूरी तकनीकी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया. इसके अलावा क्या-क्या चुनौतियां और फायदे हो सकते हैं स्टूडेंट्स को इस फैसले से आगे हम विस्तार से बता रहे हैं..
नीट परीक्षा साल में दो बार कराने का क्या पड़ेगा असर?
मेंटल प्रेशर होगा कमरजनीश कहना है कि फिलहाल यह परीक्षा साल में एक बार आयोजित की जाती है. ऐसे में अगर नीट परीक्षा वाले दिन छात्र का प्रदर्शन किसी कारण खराब हो जाता है तो उसकी पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर जाता है और स्टूडेंट के सामने एक साल के इंतजार की चुनौती खड़ी हो जाती है. इसके कारण स्टूडेंट पर मेंटल प्रेशर बढ़ जाता है. जिससे तैयारी पर असर पड़ता है.
लेकिन सरकार JEE Main की तरह NEET भी साल में दो बार आयोजित कराती है तो छात्रों को दूसरा मौका तो मिलेगा ही, इससे 'एक दिन की गलती से पूरा साल खराब हो जाने' का डर कम होगा और मेंटल स्ट्रेस में भी कमी आएगी. एक्सपर्ट ने इसे छात्रों के हित में उठाया गया सकारात्मक कदम बताया.
CBT मोड को लेकर हो सकती हैं चुनौतियां
कंप्यूटर आधारित परीक्षा कराने को लेकर रजनीश ने गांव-गिरांव के बच्चों को लेकर चिंता व्यक्त की. उनका मानना है कि बड़े शहरों और महानगरों के बच्चे टेक्निकली ज्यादा बेहतर होते हैं, जबकि दूरदराज के गांव से आने वाले कई छात्रों के पास कंप्यूटर और डिजिटल संसाधनों की सीमित पहुंच होती है.जिसके कारण उनके लिए सीबीटी मोड में परीक्षा थोड़ा चैलेंजिंग हो सकती है.
CBT से पहले इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने की जरूरत
ऐसे में अगर सरकार भविष्य में CBT मोड लागू करने का फैसला करती है तो उससे पहले देश के उन एरियाज में कंप्यूटर, इंटरनेट और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करनी होगा, जहां अभी भी संसाधनों की कमी है. इसके बाद ही सीबीटी मोड को पूरी तरीके से इंप्लीमेंट किया जाना चाहिए.
फिजिक्स पेपर में हो सकती है परेशानी
एक्सपर्ट के मुताबिक, NEET के जूलॉजी और बॉटनी जैसे सब्जेक्ट में पेन-पेपर और कंप्यूटर आधारित परीक्षा के बीच बहुत बड़ा अंतर महसूस नहीं होगा. छात्र चाहे प्रश्न स्क्रीन पर पढ़ें या पेपर में, इन दोनों की प्रकृति ऐसी है कि उत्तर देने की प्रोसेस लगभग समान रहती है.
लेकिन, फिजिक्स को लेकर स्थिति अलग हो सकती है. दरअसल, फिजिक्स में प्रश्नों को समझने, उन्हें हल करने और रफ वर्क करने के दौरान आंख, दिमाग और हाथ के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होती है. ऐसे में स्टूडेंट पहले प्रश्न पढ़ता है, फिर दिमाग में उसे हल करने की स्ट्रेटजी बनाता है और फिर कागज पर उतारता है. इसके बाद CBT मोड में दोबारा कंप्यूटर स्क्रीन पर जाकर सही ऑप्शन को चुनेगा. यह पूरी प्रोसेस प्रैक्टिस मांगती है. ऐसे में सीबीटी मोड से शुरुआत में कुछ छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.
रजनीश का कहना है कि सबसे पहले साल में दो बार परीक्षा आयोजित करने जैसे बदलाव लागू किए जा सकते हैं. इसके बाद चरणबद्ध तरीके से टेक्निकल प्रेमवर्क का एनालिसिस करके विस्तार किया जाए. जब सभी छात्रों को लगभग समान डिजिटल सुविधाएं अवलेबल हो जाएं, तब CBT मोड को व्यापक स्तर पर लागू करना प्रैक्टिकल होगा.
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