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खुलकर बोलना और बात पर डट जाना; पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में क्यों 'प्रकट' हुए परगट सिंह?

पहले हॉकी की दुनिया में पहचान फिर खेल से संन्यास लेने के बाद परगट सिंह राजनीति में आए. पहले वो अकाली दल के साथ जुड़े, बाद में कांग्रेस में. परगट सिंह की राजनीति में नेतृत्व से लड़ने-भिड़ने की कहानी हमेशा से चर्चा में रही है.

खुलकर बोलना और बात पर डट जाना; पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में क्यों 'प्रकट' हुए परगट सिंह?
कांग्रेस ने पंजाब में परगट सिंह को अध्यक्ष बनाया है.
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  • पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष परगट सिंह ने पहले हॉकी में विश्व स्तर पर नाम कमाया और राजनीति में आए.
  • उनकी राजनीति की बड़ी बात यह है कि वो पार्टी में रहते हुए भी बड़े नेताओं से लड़ते-भिड़ते रहे.
  • कांग्रेस में रहते हुए भी परगट सिंह ने 2020 में कैप्टन अमरिंदर सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए थे.
चंडीगढ़:

टक्कर हमेशा से ताकतवर नेताओं से, चाहे वो दूसरे दल के नेता हो या फिर अपने दल के... पंजाब कांग्रेस के नए कप्तान बने परगट सिंह का राजनीति की यह बड़ी पहचान रही है. परगट सिंह जब अकाली दल में रहे तो उन्होंने सुखबीर सिंह बादल की खुलकर मुखालफत की. जब कांग्रेस में आए तो विधायक रहते कैप्टन अमरिंदर सरकार के काम-काम की आलोचना करने से भी नहीं चूके. परगट सिंह का राजनीतिक सफर उन टकरावों से भरा रहा है, जो उन्होंने अपनी-अपनी पार्टियों के नेतृत्व से किए. उनकी यही बेबाक शैली जो अक्सर उन्हें पार्टी नेतृत्व से टकराव की स्थिति में ले आई, अब कांग्रेस के भीतर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है.

पहले हॉकी में कमाया नाम, फिर राजनीति में आए

1965 में जालंधर में जन्मे परगट सिंह ने राजनीति में आने से पहले हॉकी के खेल में नाम कमाया. एक समय उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डिफेंडरों में से एक माना जाता था. 1985 में जर्मनी के खिलाफ ऐतिहासिक मैच में जब भारत 1-5 से पीछे था, तब परगट सिंह ने खेल के आखिरी 6 मिनटों में 4 गोल दागकर मैच 5-5 से बराबर कराया. इस करिश्मे ने उन्हें रातों-रात भारत तो भारत ग्लोबल स्टार बना दिया था. 

हॉकी के मैदान में परगट सिंह, तस्वीर 1988 से ओलंपिक मैच की है.

हॉकी के मैदान में परगट सिंह, तस्वीर 1988 से ओलंपिक मैच की है.

खेल से संन्यास लेने के बाद परगट सिंह राजनीति में आए. पहले वो अकाली दल के साथ जुड़े, बाद में कांग्रेस में. परगट सिंह की राजनीति में नेतृत्व से लड़ने-भिड़ने की कहानी हमेशा से चर्चा में रही है. 

2016: अकाली दल में रहते हुए सुखबीर बादल को चुनौती

परगट सिंह का अकाली नेतृत्व के साथ सबसे बड़ा टकराव वर्ष 2016 में सामने आया. जुलाई 2016 में शिरोमणि अकाली दल द्वारा निलंबित किए जाने के बाद उन्होंने 5-6 अगस्त 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को एक तीखा पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की कार्यशैली पर सीधे सवाल उठाए.

परगट ने आरोप लगाया कि अकाली दल की मूल विचारधारा को पीछे छोड़ दिया गया है और जनता की आवाज उठाने को पार्टी विरोधी गतिविधि माना जा रहा है. उन्होंने जालंधर नगर निगम में कथित भ्रष्टाचार और सरकार के कामकाज पर भी सवाल खड़े किए.

जालंधर के पास प्रस्तावित ठोस कचरा प्रबंधन संयंत्र (सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट) को लेकर भी उनके और बादल परिवार के बीच मतभेद बढ़े. अंततः 12 सितंबर 2016 को उन्होंने अकाली दल से इस्तीफा दे दिया और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए.

इस दौर ने परगट सिंह की छवि एक ऐसे नेता की बनाई, जो पार्टी लाइन का आंख मूंदकर समर्थन करने के बजाय अपने नेतृत्व से भी टकराने को तैयार रहता है.

2020: कप्तान अमरिंदर सिंह को लिखा पत्र

कांग्रेस में आने के बाद भी उनका यही स्वभाव कायम रहा. फरवरी 2020 में परगट सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पत्र लिखकर कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए. उन्होंने पत्र में भ्रष्टाचार के मामलों के कमजोर पड़ने, नशे की समस्या, राजस्व रिसाव, रेत और शराब कारोबार तथा बादल परिवार के ट्रांसपोर्ट व्यवसाय के प्रभाव संबंधी चिंताएं जताईं.

उन्होंने बेअदबी (सैक्रिलेज) मामलों के निपटारे को लेकर भी सरकार को घेरा और कहा कि यही मुद्दा 2017 में कांग्रेस की जीत के प्रमुख कारणों में से एक था. इस हस्तक्षेप की अहम बात यह थी कि उस समय परगट सिंह खुद कांग्रेस के विधायक थे और अपनी ही सरकार पर सवाल उठा रहे थे.

बाद में बेअदबी मामलों और शासन व्यवस्था को लेकर उनके और कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच मतभेद और बढ़ गए. पार्टी बदलने के बावजूद उन्होंने अपनी मुखर राजनीतिक शैली नहीं छोड़ी.

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बादल से कप्तान तक और फिर भगवंत मान के खिलाफ

समय के साथ परगट सिंह की भूमिका कांग्रेस सरकार के भीतर आलोचक से बदलकर आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार के सबसे मुखर आलोचकों में शामिल होने तक पहुंच गई. पंजाब विधानसभा में उन्होंने बार-बार बेअदबी मामलों, शासन व्यवस्था, भ्रष्टाचार, नशे और वित्तीय प्रबंधन जैसे मुद्दों पर मान सरकार को घेरा. जुलाई 2025 में उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी सरकार पंजाब की मूल समस्याओं का समाधान करने के बजाय राजनीतिक मुद्दों के जरिए ध्यान भटका रही है.

उन्होंने डेरा सच्चा सौदा और बेअदबी मामलों को भी लगातार विधानसभा में उठाया. दिसंबर 2022 में उन्होंने कहा था कि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के मुद्दे पर उनकी भगवंत मान से मुलाकात हुई थी और बाद में उन्होंने यह मामला तीन बार विधानसभा में उठाया. वर्ष 2026 में भी उन्होंने बजट, भ्रष्टाचार और अधूरे वादों को लेकर मान सरकार की आलोचना जारी रखी.

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कांग्रेस नेतृत्व में चयन के पीछे क्या रही वजह?

कांग्रेस हाईकमान के लिए परगट सिंह सिर्फ एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वह शक्तिशाली राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का सामना कर सकते हैं और यह अनुभव उन्हें राजनीतिक विभाजन की दोनों धाराओं से मिला है. माना जा रहा है कि नेतृत्व चयन प्रक्रिया में यही रिकॉर्ड उनके पक्ष में गया.

न वडिंग के करीबी न चन्नी से दूर

परगट सिंह कमान दिए जाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वो किसी गुट में नहीं हैं. वह चरणजीत चन्नी से भी उतने ही दूर या पास है, जितने अमरिंदर सिंह राजा वडिंग से. ऐसे में कांग्रेस के लिए वह स्वाभाविक पसंद बनकर उभरे हैं. इसके अलावा वह सिख चेहरे वाली शर्त भी पूरी करते हैं. 

अकाली दल-भाजपा सरकार के साथ काम करने का उनका अनुभव भी कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकता है, खासकर तब जब 2027 विधानसभा चुनाव में भाजपा और अकाली दल के संभावित गठजोड़ की चर्चा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनी हुई है. साथ ही अमृतपाल सिंह की अकाली दल (वॉरिस पंजाब दे) भी चुनावी मैदान में सक्रिय है.

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परगट को कमान देने में अमृतपाल फैक्टर

पंजाब की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण पहलू है. परगट सिंह लंबे समय से बेअदबी और डेरा सच्चा सौदा से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं. कांग्रेस विधायक रहते हुए भी उन्होंने बादल परिवार पर डेरा से राजनीतिक संबंध रखने के आरोप लगाए और बेअदबी मामलों की जांच को लेकर सवाल उठाए.

हाल के वर्षों में भी उन्होंने डेरा प्रमुख से जुड़े मामलों में कार्रवाई में देरी के आरोप लगाते हुए आम आदमी पार्टी सरकार को घेरा है. ऐसे में, जब अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाला अकाली दल (वॉरिस पंजाब दे) 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा है, परगट सिंह कांग्रेस के लिए पंथक और सिख राजनीतिक मुद्दों पर एक प्रभावशाली आवाज साबित हो सकते हैं.

परगट सिंह की आगे की चुनौतियां क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या परगट सिंह की वही बेबाक शैली, जिसने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई, संगठनात्मक नेतृत्व में भी उतनी ही प्रभावी साबित होगी. 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में उन्हें न केवल आम आदमी पार्टी का मुकाबला करना होगा, बल्कि कांग्रेस के भीतर मौजूद गुटबाजी को संभालना, भाजपा-अकाली दल की रणनीतियों का जवाब देना और अमृतपाल सिंह की राजनीति से उभर रही चुनौतियों का सामना भी करना होगा. कई मायनों में देखा जाए तो परगट सिंह का पूरा राजनीतिक सफर उन्हें इसी बड़ी राजनीतिक परीक्षा के लिए तैयार करता नजर आता है.

यह भी पढ़ें - परगट सिंह कौन हैं, जिन्हें कांग्रेस ने बनाया पंजाब का अध्यक्ष, 1998 में मिला था पद्म श्री

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