- लोकसभा में 31वें संशोधन बिल को पास कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई मत चाहिए थे, जो नहीं मिल सके
- महिला आरक्षण बिल फिलहाल अटक गया है और 2034 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू होना मुश्किल नजर आता है
- महिला आरक्षण के लिए अगली जनगणना पूरी होना जरूरी है, जो अभी चल रही है और समय लेगी
पहले ही बहुत देर हो चुकी थी अब और कितना इंतजार? 31वां संशोधन बिल लोकसभा से पास नहीं हो सका. घंटों लंबी बहस और मतभेदों के बीच शुक्रवार को यह बिल लोकसभा में गिर गया. सरकार को बिल को पास करवाने के लिए दो-तिहाई वोटों की जरूरत थी. लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े. विरोध में 230 वोट पड़े, जो दो तिहाई से बहुत कम हैं. पीएम मोदी की अंतरआत्मा की आवााज सुनने वाली अपील को विपक्षी दलों ने नहीं सुना. अब सवाल यह है कि अब नहीं तो महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण कब मिलेगा. क्या महिलाओं के लिए कोटा 2034 से पहले संभव हो पाएगा. या फिर बीच की कोई और राह अभी भी निकल सकती है?
महिला आरक्षण संशोधन बिल फिलहाल तो थम गया है. सरकार विपक्ष से इस बिल को पास करने में मदद की अपील कर रही थी ताकि इसे जल्दी से जल्दी लागू किया जा सके. हालांकि, अब फिलहाल तो ऐसा होता नहीं दिख रहा है.
क्या अब 2034 के पहले महिला कोटा संभव होगा?
2023 के मूल कानून के हिसाब से संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी लागू होना था, जब अगली जनगणना पूरी हो जाए. मतलब यह कि यह 2034 से पहले लागू होना मुश्किल लगता है. वजह ये है कि अभी जनगणना चल रही है. इसे पूरा होने में वक्त लगेगा. इसके बाद सीटों का डिलिमिटेशन यानी कि नया बंटवारा भी होगा. जबकि नए बिल के हिसाब से महिला आरक्षण को 2029 तक लागू होना था. इसके लिए सीटों का बंटवारा 2011 की जनगणना के आधार किया जाना था. पर इसे जरूरी बहुमत नहीं मिल पाया.

मोदी सरकार के सामने अब क्या विकल्प?
केंद्र सरकार 31वें संशोधन बिल में दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ाने जैसे कुछ बदलाव कर सकती है. मतलब यह कि 2011 के बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाया जाए. इसके बाद बिल को नए सिरे से पेश किया जाए. सहमति बनाने के लिए विपक्ष के सुझाव लिए जाएं.
ओबीसी कोटे से क्यों हिचक रही है बीजेपी?
कई विश्लेषकों का कहना है कि ओबीसी महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा देने से पहले पूरे ओबीसी समुदाय के लिए ही राजनीतिक आरक्षण को संविधान में शामिल करना होगा. फिलहाल ओबीसी आरक्षण शिक्षा और नौकरी तक सीमित है, विधायिकाओं में नहीं. महिलाओं के बिल के पिछले प्रयास (1996, 1997, 1998, 2008–2010) ओबीसी उप-कोटा की मांगों की वजह से ही अटकते रहे. यही पुरानी खाई 2023–26 की बहस में भी दिखाई दी. बीजेपी ने ओबीसी वोट बैंक में बड़ा विस्तार किया है. विश्लेषकों का तर्क है कि अगर वह अभी ओबीसी राजनीतिक आरक्षण का दरवाज़ा खोलती है तो सीट–शेयर, 50% कैप और आंतरिक उप-वर्गीकरण पर बड़े विवाद खड़े हो सकते हैं, जिसे वह टालना चाहती है.
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विपक्ष लगातार ओबीसी महिलाओं के अलग कोटे की मांग कर रहा है. वह आरोप लगा रहा है कि बीजेपी महिला आरक्षण का क्रेडिट तो लेना चाहती है लेकिन ओबीसी महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी देने से बच रही है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसलों में कहा है कि कुल आरक्षण 50% से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता और ओबीसी कोटा के लिए “समकालीन, भरोसेमंद तथ्यात्मक डेटा” ज़रूरी है. यही तर्क राष्ट्रीय स्तर पर भी उठेगा.
क्या जातिगत जनगणना के बगैर संभव है ओबीसी कोटा?
संसद चाहे तो संविधान में संशोधन कर लोकसभा-विधानसभाओं में ओबीसी वर्ग के लिए राजनीतिक आरक्षण और उसमें से ओबीसी महिलाओं का उप-कोटा तय कर सकती है. भले ही नई जातिगत जनगणना पूरी नहीं हुई हो. संविधान किसी विशेष डेटा स्रोत को अनिवार्य नहीं ठहराता.लेकिन किस जाति समूह को कितना हिस्सा मिलेगा, इसका आधार तय करने के लिए ठोस, नए और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य जातिगत आंकड़े जरूरी होंगे. वरना अदालतों में इसे मनमाना मानकर चुनौती दी जा सकती है.
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