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लोकसभा में गिरा महिला आरक्षण विधेयक, क्‍या बीजेपी के चक्रव्यूह में फंस गया विपक्ष?

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका है. पार्टी अब इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर यह संदेश देने की रणनीति पर काम कर रही है कि महिला आरक्षण जैसे 'ऐतिहासिक' कदम को विपक्ष ने रोक दिया है. यही वजह है कि अब सवाल उठने लगा है कि क्या विपक्ष बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह में फंस गया है?

लोकसभा में गिरा महिला आरक्षण विधेयक, क्‍या बीजेपी के चक्रव्यूह में फंस गया विपक्ष?
बंगाल चुनाव से ठीक पहले महिला आरक्षण का मुद्दा उठना बीजेपी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है.
  • केंद्र ने महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण के लिए विधेयक संसद में प्रस्तुत किया.
  • हालांकि महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित नहीं किया जा सका.
  • राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहुमत नहीं होने के बावजूद विधेयक लाकर भाजपा ने बड़ा दांव खेला है.
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नई दिल्‍ली:

महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई. हालांकि महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहुमत नहीं होने के बाद भी विधेयक लाकर भाजपा ने बड़ा राजनीतिक दांव खेला है. इसने सत्ता पक्ष और खासतौर पर भाजपा के हाथ में एक ऐसा मुद्दा थमा दिया है, जिससे पार पाना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल होगा. खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना अभी बाकी है और ऐसे में भाजपा इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. 

महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में 298 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया.  मतदान करने वाले 528 सांसदों में से इस संविधान संशोधक विधेयक को दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी. हालांकि यह पारित नहीं हो सका. पार्टी अब इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर यह संदेश देने की रणनीति पर काम कर रही है कि महिला आरक्षण जैसे 'ऐतिहासिक' कदम को विपक्ष ने रोक दिया है. यही वजह है कि अब सवाल उठने लगा है कि क्या विपक्ष बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह में फंस गया है?

ये भी पढ़ें: रास्ते का रोड़ा, असंवैधानिक तरकीब, खोखली कोशिश... महिला आरक्षण बिल पर शाह से राहुल-प्रियंका तक, किसने क्या कहा

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Photo Credit: IANS

बंगाल चुनाव में दिख सकता है असर

इस रणनीति का असर आने वाले चुनावों में साफ दिख सकता है. पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है, जबकि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए भी 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे. इन चुनावों से ठीक पहले महिला आरक्षण का मुद्दा उठना बीजेपी के लिए खासा फायदेमंद माना जा रहा है. पार्टी को पिछले कुछ चुनावों में महिला वोटरों का मजबूत समर्थन मिला है और अब इसी आधार को और पुख्ता करने की कोशिश की जा सकती है. इसके संकेत शुक्रवार से ही मिलने शुरू भी हो गए हैं.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों पर महिला आरक्षण का विरोध करने का आरोप लगाया. लोकसभा में उन्‍होंने कहा कि देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनके ‘‘रास्ते का रोड़ा'' कौन है और विपक्ष के नेताओं को चुनाव में महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा. 

भाजपा इस मुद्दे को खासतौर पर बंगाल में बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है, जहां महिला मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है और महिला आरक्षण को लेकर भावनात्मक अपील विपक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. हालांकि बंगाल चुनाव भाजपा के लिए इस मुद्दे का पहला बड़ा इम्तेहान भी है. 

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ओबीसी आरक्षण के तर्कों की भी काट 

वहीं विपक्ष की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं हैं. महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी और अल्‍पसंख्‍यक आरक्षण की मांग को लेकर भी बीजेपी के पास तर्क तैयार हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण में मुस्लिम आरक्षण की समाजवादी पार्टी की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संविधान के तहत धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. वहीं ओबीसी महिलाओं के आरक्षण की मांग के संबंध में कहा कि जाति जनगणना के बाद रिपोर्ट आएगी और उस पर इस सदन में विचार करने के बाद जो भी सामूहिक मत बनेगा, उस बारे में आगे बढ़ा जा सकता है. 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर लंबे अरसे तक ओबीसी का आरक्षण रोकने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने बार-बार ओबीसी आरक्षण को रोका और अब, जब वे चुनाव हारते जा रहे हैं तो ओबीसी के हितैषी बनने आए हैं. कांग्रेस ने अब तक एक भी ओबीसी प्रधानमंत्री नहीं दिया, वहीं भाजपा ने अति पिछड़े समाज के मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाया.''

भाजपा के इन तर्कों के आगे विपक्ष की रणनीति की धार फिलहाल कुंद होती नजर आ रही है. कुल मिलाकर महिला आरक्षण विधेयक भले ही संसद में पारित न हो सका हो, लेकिन सियासी मैदान में यह बीजेपी के एजेंडे का अहम हिस्सा बन चुका है. आगामी दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस नैरेटिव को कितनी मजबूती से भुनाती है और विपक्ष इससे कैसे निपटता है. 

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