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मां चलाती थीं चाय-समोसे की दुकान, परिवार में थे खाने के भी लाले, जानें मीराबाई चानू के चैंपियन बनने की प्रेरणादायक कहानी

मीरबाई चानू की कहानी देश के करोड़ों युवाओं को प्रेरणा देने के लिए काफी है कि आप सही दिशा में सकारात्मक प्रयास करें, तो आपको चैंपियन बनने से कोई नहीं रोक सकता

मां चलाती थीं चाय-समोसे की दुकान, परिवार में थे खाने के भी लाले, जानें मीराबाई चानू के चैंपियन बनने की प्रेरणादायक कहानी

Mirabai Chanu's 'lifetime' story: सीने में आग और जहनियत में जुनून हो, तो बड़ी से बड़ी बाधाएं पीछे छोड़ी जा सकती हैं. यूं तो भारत ऐसी अनगिनत कहानियों से भरा पड़ा है, लेकिन कुछ कहानियां बहुत ही खास और दिल की गहराइयों को छू जाती हैं. और इन्हीं में से एक है वेटलिफ्टर मीराबाई चानू की कहानी, जिन्होंने रविवार को इतिहास रचते हुए कॉमनवेल्थ  खेलों के इतिहास में लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक कब्जाते हुए करोड़ों भारतीय  खेलप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया. साल 2018 में गोल्ड कोस्ट में पहली बार महाकुंभ में गोल्ड जीतने वाली मीराबाई चानू ने दूसरी बार 2022 में बर्मिंघम, तो अब लगातार तीसरी बार उन्होंने ग्लास्गो पर भी स्वर्ण पर कब्जा कर लिया. वास्तव में गरीबी, संघर्ष और तमाम बाधाओं को पीछे छोड़ते हुए मीराबाई चानू का सफर 'जेन जी' को प्रेरित करने के लिए और संदेश देने के लिए काफी है कि राह में कितनी भी बाधाएं आएं, चैंपियन बनने की राह में बस हार नहीं माननी है. 

विरासत में ही गरीबी और संघर्ष

साल 1994 में जन्मीं मीराबाई चानू मणिपुर के इम्फाल ईस्ट जिले के एक छोटे से गांव नोंगपोक काकचिंग में से आती हैं. और वह अपने माता-पिता की छह संतानों में सबसे छोटी हैं. गरीबी संघर्ष चानू को विरासत में ही मिला. उनका परिवार बहुत ही साधारण और गरीब था. चानू के पिता साइखोम कृति मैतआई  लोक निर्माण विभाग में एक कम वेतन वाले निर्माण श्रमिक थे, तो उनकी माता साइखोम तोम्बी देवी गांव में एक छोटी सी चाय और समोसे की दुकान चलाती थी. 

सीमित आमदनी, 8 लोगों का परिवार, खाने के थे लाले !

आसानी से समझा जा सकता है कि जब किसी परिवार की महिला चाय और समोसे की दुकान चला रही हो. और परिवार में 8 लोग हों, तो बच्चों को पालना और उनके खर्च वहन करना कितना मुश्किल होता है. इस पर भी अगर परिवार में कोई बच्चा खेल की दुनिया का रुख कर ले, तो समस्याएं कैसी हो सकती हैं, समझी जा सकती हैं.  और इस पृष्ठभूमि से खुद को लगातार उठाने के लिए मीराबाई चानू के जीवन में अनगित ऐसे दिन आए, जब उन्हें सुविधा और समय पर सही डाइट नहीं मिल सकी. वेटलिफ्टिंग के लिए प्रोटीन युक्त भारी डाइट (जैसे दूध, मांस, अंडे) की जरूरत होती है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण कई बार मीराबाई के पास खाने के पैसे नहीं होते थे और वे सिर्फ पानी पीकर ही कड़े अभ्यास के लिए चली जाती थीं. मगर,  ये तमाम बातें कभी भी इस चैंपियन का हौसला नहीं डिगा सकीं.

बांस से ट्रेनिंग और ट्रक चालकों की मदद 

शुरुआत में अभ्यास के लिए जब लोहे के बारबेल नहीं थे, तब उन्होंने बांस के तनों को बारबेल बनाकर ट्रेनिंग शुरू की. उनके गांव से इम्फाल के खुमान लम्पक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की दूरी लगभग 20 से 40 किलोमीटर थी. बस का किराया न होने के कारण वे रोज़ाना रेत ले जाने वाले ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट मांगकर ट्रेनिंग सेंटर पहुंचती थीं. साल 2020 में ओलिंपिक्स में कांस्य पदक जीतने के बाद मीराबाई ने चैंपियन बनने की राह में उनकी मदद करने वाले सभी ड्राइवरों को घर बुलाकर उनका सम्मान किया था. 

पुरस्कार और वर्तमान स्थिति

देश के लिए किए गए इस बेमिसाल त्याग और प्रदर्शन के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मान मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार और पद्म श्री (2018) से नवाजा. इसके साथ ही खेल क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए वे मणिपुर पुलिस में एडिशनल सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (ASP - Sports) के पद पर भी कार्यरत हैं.
 

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