- भारत को कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में क्रिटिकल चरण पूरा करके बड़ी कामयाबी मिली है
- इस तकनीक में जापान, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देश सफल नहीं हो पाए, भारत ने झंडे गाड़ दिए
- भारत ने परमाणु ईंधन के लिए विदेशों पर निर्भर रहने के बजाय देश में उपलब्ध थोरियम से बिजली बनाने का लक्ष्य चुना
भारत ने हाल ही में परमाणु ऊर्जा के मोर्चे पर बड़ी सफलता हासिल की है. तमिलनाडु के कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली है. मतलब रिएक्टर में अब बिना रुके न्यूक्लियर चेन रिएक्शन लंबे समय तक अपने आप चल सकता है. सवाल ये है कि जब जापान, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देश परमाणु ब्रीडर तकनीक से पीछे हट चुके हैं या उन्हें बंद कर चुके हैं, तब भारत इस बेहद कठिन और जटिल तकनीक को क्यों अपना रहा है? आइए समझते हैं.
दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहता भारत
दुनिया के तमाम अन्य परमाणु रिएक्टर यूरेनियम बेस्ड होते हैं. लेकिन भारत के पास यूरेनियम खनिज बेहद सीमित है. तेल और गैस के मामले में भी वह खाड़ी देशों पर निर्भर है. खाड़ी युद्ध और मौजूदा ईरान युद्ध की वजह से पैदा हुए तेल-गैस के संकट ने भारत को सिखाया कि विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता कभी भी धोखा दे सकती है. ऐसे में उसे ऐसा परमाणु रिएक्टर बनाना होगा, जिसमें ईंधन से लेकर तकनीक तक के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े.

भारत के पास थोरियम के एक-तिहाई भंडार
भारत के पास यूरेनियम का बेहद भंडार भले ही सीमित है, लेकिन थोरियम के मामले में भारत की गिनती सबसे संपन्न देशों में होती है. दुनिया में थोरियम के जितने भंडार हैं, उसका एक-तिहाई भारत के पास है. यही वजह है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने इसी थोरियम की मदद से ऊर्जा स्वतंत्रता पाने का प्लान बनाया. इसके लिए फास्ट ब्रीडर तकनीक का सफल होना जरूरी था.
जितना ईंधन जलेगा, उससे ज्यादा पैदा होगा
अब भारत ने कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का क्रिटिकल चरण पूरा करके इस जटिल तकनीक में मास्टरी हासिल कर ली है. यह तकनीक अन्य परमाणु रिएक्टरों से बिल्कुल अलग और जादुई लगती है. आमतौर पर रिएक्टर ईंधन जलाकर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, लेकिन ब्रीडर रिएक्टर जितना ईंधन प्रयोग करते हैं, उससे कहीं ज्यादा पैदा करते हैं.

भारतीय ऊर्जा स्वतंत्रता की 3 स्तरीय योजना
इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR) के डायरेक्टर श्रीकुमार पिल्लई के शब्दों में, यह भारत की न्यूक्लियर कम्युनिटी का पिछले 20 वर्षों का सपना था, जो अब साकार हुआ है. भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा ने भारत की परमाणु ऊर्जा के लिए 3 चरणों की योजना तैयार की थी.
पहला चरणः PHWR से प्लूटोनियम बनाना
प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) पहला चरण है. इसमें नेचुरल यूरेनियम के प्रयोग से न सिर्फ बिजली पैदा होती है बल्कि बाई प्रोडक्ट के रूप में प्लूटोनियम 239 निकलता है, जो प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता. भारत ने 1960 के दशक में ही पहला प्लूटोनियम रीप्रोसेसिंग प्लांट लगा लिया था. दशकों के अनुभव से अब इस तकनीक में महारत हासिल कर ली है. यह क्षमता कुछ ही देशों के पास है.

दूसरा चरणः प्लूटोनियम से रिएक्टर चलाना
दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर आता है. इसमें प्लूटोनियम को फ्यूल के तौर पर प्रयोग किया जाता है. कलपक्कम में 1985 में ही फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चालू कर दिया गया था. इसमें प्लूटोनियम को फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इसकी खास बात ये है कि ये जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन तैयार कर देता है. कलपक्कम PFBR का ब्रीडिंग रेशियो 1.05 है.
तीसरा चरणः थोरियम से सदियों तक बनेगी बिजली
अभी यूरेनियम-238 जैसे पदार्थों का प्रयोग करके नया प्लूटोनियम बनाया जाता है. थोरियम सीधा परमाणु ईंधन के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकता, इसलिए भविष्य में थोरियम की मदद से यूरेनियम-233 तैयार किया जाएगा, जो तीसरे चरण की ऊर्जा स्वतंत्रता का आधार बनेगा. डॉ. पिल्लई कहते हैं कि थोरियम बेस्ड सिस्टम से सदियों तक भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी की जा सकेंगी. एक बार थोरियम का इस्तेमाल शुरू हो गया तो अगले 500 से 700 साल तक भारत को अटूट बिजली मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा.
विकसित देश भी हो गए फेल
- ऐसा नहीं है कि अन्य देशों ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर पर काम नहीं किया. जापान, फ्रांस और अमेरिका ने इस पर काम किया था, लेकिन नाकाम रहे.
- जापान के मोंजू रिएक्टर में 1995 में सोडियम लीक होने से आग लग गई थी, जिसके बाद जनता का भरोसा उठ गया और आखिरकार उसे बंद करना पड़ा.
- फ्रांस का सुपरफिनिक्स रिएक्टर 1990 के दशक के आखिर में तकनीकी समस्याओं और भारी लागत की वजह से फेल हो गया. इसके बाद उसने कन्वेंशनल रिएक्टर लगाए.
- अमेरिका ने भी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर पर रिसर्च की थी. चूंकि उसके पास पर्याप्त यूरेनियम है, इस वजह से उसने तकनीक से कमर्शल प्रोसेसिंग का प्लान छोड़ दिया.
सबसे बड़ी चुनौती में हासिल की महारत
फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती लिक्विड सोडियम का इस्तेमाल है. यह हवा और पानी के संपर्क में आते ही भयानक प्रतिक्रिया करता है. भारत ने पिछले चार दशकों में सोडियम को सुरक्षित रूप से संभालने की कला सीख ली है. वैज्ञानिकों ने स्पेशल लीक डिटेक्शन सिस्टम और सोडियम की आग बुझाने के लिए खास पाउडर तक विकसित कर लिए हैं. इमरजेंसी टीमों को कैसे ट्रेंड करना है, ये भी सीख लिया है. दशकों के इसी अनुभव का कमाल है कि आज भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिनके पास क्लोज्ड फ्यूल साइकिल की क्षमता है.

इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR) के डायरेक्टर श्रीकुमार पिल्लई
इसी साल शुरू हो सकता है बिजली उत्पादन
कलपक्कम में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) अब शुरू हो चुका है, लेकिन फिलहाल ये बहुत कम पावर पर काम कर रहा है. आने वाले महीनों में अगर सबकुछ ठीक रहता है और रेग्युलेटरी क्लियरेंस मिल जाती है, तब धीरे-धीरे इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाएगी. अगर प्रयोग कामयाब रहे तो इस साल के अंत से यहां बिजली उत्पादन शुरू हो सकता है. PFBR के सफल होने के साथ ही कलपक्कम में अब दो और ब्रीडर रिएक्टरों- FBR 1 और 2 पर काम शुरू हो चुका है.
कलपक्कम का शाब्दिक अर्थ 'पथरीली जगह' होता है, भारत की परमाणु ऊर्जा का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है. लेकिन अब इसने एक महत्वपूर्ण मुकाम पार कर लिया है. अब वह ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, जहां से तीन चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम की पूरी तस्वीर साफ नजर आ रही है. ये भारत के विजन और लगन का ही परिणाम है कि जिस तकनीक को हासिल करने में विकसित देश भी पीछे हट गए, भारत उस पर आगे बढ़ते हुए सदियों तक ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की राह पर लगातार आगे बढ़ रहा है.
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