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Ground Report: रात के अंधेरे में धमाके, टूटते पहाड़; अरावली में मैंने जो देखा वो भयावह है

राजस्थान में कुल 16,116 खनन पट्टे हैं, जिनमें 10,060 सक्रिय हैं. करीब 18,000 क्वारी लाइसेंस जारी किए गए हैं. अरावली क्षेत्र में उदयपुर, राजसमंद, अलवर, सिरोही और भीलवाड़ा सबसे ज्यादा प्रभावित जिले हैं. हाल ही में 126 नए खनन पट्टों की अधिसूचना जारी हुई, जिनमें 50 पट्टे अरावली क्षेत्र के जिलों में हैं.

Ground Report: रात के अंधेरे में धमाके, टूटते पहाड़; अरावली में मैंने जो देखा वो भयावह है
अरावली पर NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट.
  • सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र की नई परिभाषा तय करने के आदेश दिए हैं, जिससे सियासी विवाद गहराया गया है.
  • जयपुर के निकट अरावली में अवैध खनन से पहाड़ कट चुके हैं और गहरे गड्ढे बन गए हैं.
  • स्थानीय लोग खनन को अवैध मानते हैं लेकिन रोजगार की वजह से चुप्पी साधे हुए हैं और शिकायत नहीं करते.
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जयपुर:

अरावली को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र की नई परिभाषा तय करने के आदेश दिए हैं. सरकारें अपने-अपने तर्क दे रही हैं, बयान आ रहे हैं काउंटर बयान चल रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बना हुआ है कि असल में ज़मीन पर अरावली की हालत क्या है. पहाड़ कितने बचे हैं. जख़्म कितने गहरे हैं. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने एनडीटीवी रिपोर्टर सुशांत पारीक निकल पड़े सच की तलाश में. अपनी आंखों से देखने के लिए सुनने के लिए और महसूस करने के लिए कि अरवली की व्यथा क्या है. पड़ताल शुरू हुई जयपुर से करीब तीस किलोमीटर दूर, अरावली की गोद में बसे गांवों से.

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बेबस पहाड़ों से पहली मुलाकात

मैं जब जयपुर से निकला दिल्ली रोड पर अरावली की के पहाड़ सामने नजर आने लगे. लेकिन ये पहाड़ अब वैसे नहीं दिखते जैसे किताबों में पढ़े गए थे. गांव साईंवाड़ा के करीब पहुंचते ही दूर से ही अरावली की बेबसी साफ नजर आने लगती है. जगह-जगह कट चुके पहाड़, ऐसे जैसे किसी ने शरीर से मांस नोच लिया हो और हड्डियां खुली छोड़ दी हों. गांव में घुसते ही गाड़ी जैसे ही अंदर बढ़ती है, मोटरसाइकिलों पर कुछ युवक आगे-पीछे घूमते दिखते हैं. नजरें लगातार गाड़ी पर टिकी हुई हैं. खामोशी में भी एक अजीब सी चौकसी है. यह इलाका वही है जहां सबसे ज्यादा खनन हो रहा है.

यहां की सड़कें अस्वाभाविक रूप से बेहद खराब हैं. गड्ढों से भरी, उखड़ी हुई. स्थानीय लोग बताते हैं कि यह जानबूझकर ऐसा किया गया है ताकि बड़ी गाड़ियां यहां तक न पहुंच सकें. लेकिन इन टूटी सड़कों के किनारे कहीं भी किसी लीजधारक का बोर्ड नजर नहीं आता. नजर आते हैं तो बस कटे हुए पहाड़ और उनकी जगह बने गहरे तालाब.

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इसी रास्ते पर मुकेश नाम का एक युवक मिला. पहले तो उसने ख़ान माफिया और खनन पर बात करने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन जब समझाया गया कि यह मुद्दा उसके गांव और भविष्य से जुड़ा है, तो वह धीरे से बोलने लगा. उसने बताया कि यहां सब कुछ पूरी तरह इलीगल है. गांव के कई लोगों की ट्रैक्टर-ट्रॉलियां खनन में लगी हैं. उन्हें रोज़गार मिला हुआ है, इसलिए कोई बोलता नहीं. कोई शिकायत नहीं करता."

मैं जब खनन के ठीक मुहाने पहुंचा तो जमीन  सैकड़ों फ़ीट नीचे गहरा गड्ढा बना हुआ था. वहां एक कमरे का अस्थायी ऑफिस दिख. जैसे ही कर्मचारी की नजर कैमरे पर पड़ी, वह गायब हो गया.रिपोर्टिंग शुरू होते ही गांव के कुछ लोग इकट्ठा हो गए.

इन्हीं में एक बुजुर्ग हैं रामचंद्र. धीमी आवाज में कहते हैं कि ग्रामीणों को नहीं पता कि कितनी परमिशन है और कितनी खुदाई हो रही है. गांव के लोगों का इसमें कोई भला नहीं है, यह सब सरकार को देखना चाहिए. आगे बढ़ने पर एक पहाड़ पूरी तरह गायब हो चुका है, मानो कभी था ही नहीं. वहां ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में चेजा पत्थर भरकर ले जाया जा रहा है. सवाल पूछते ही लोग भाग खड़े होते हैं. आगे बढ़ते हुए अचानक एक युवक बाइक पर पीछे से आता है और गाड़ी के आगे चलने लगता है. गाड़ी रोकने पर वह शीशा खुलवाकर कहता है कि आगे मत जाइए, रास्ता खराब है. एक तरह से यह चेतावनी भी है और रोकने की कोशिश भी.

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आगे रास्ता वाकई इतना खराब हो गया कि चारपहिया वाहन ले जाना मुश्किल हो गया. मजबूरी में लौटना पड़. लौटते वक्त वही ट्रैक्टर चालक फिर नजर आते हैं, जो अवैध रूप से पत्थर ढो रहे हैं. इसके बाद मेरी पड़ताल जमवारामगढ़ इलाके में पहुंचती है. यहां भी अरावली की हालत अलग नहीं है. जगह-जगह पहाड़ पूरी तरह कट चुके हैं. जहां कभी ऊंची पहाड़ियां थीं अब खुला मैदान है.

यहां खनन लीज के बोर्ड जरूर लगे हैं, लेकिन खनन पट्टे की सीमा तक सीमित नहीं दिखता. अधिकांश माइन्स पचास साल की लीज पर दी गई हैं. एक बोर्ड जगनी मीणा के नाम से लगा है. उस पर लिखा है कि लीज 1999 में आवंटित हुई और 2049 में पूरी होगी. लेकिन 26 साल में आधे से ज्यादा पहाड़ खोद दिया गया है.

ऑफिस में बैठे एक युवक से बात होती है. वह मालिक के पति नेम सिंह मीणा का नंबर देता है. फोन पर बात करने पर जवाब मिलता है कि वे खाटूश्याम आए हुए हैं और अभी बात नहीं कर सकते. लीज की अवधि और खनन के दायरे पर कुछ भी बताने से इनकार कर दिया जाता है. ग्रामीण रामचंद्र बताते हैं कि आसपास के इलाकों में रात के अंधेरे में धमाके गूंजते हैं. सुबह सूरज निकलने से पहले पत्थर सीमाएं पार कर चुके होते हैं. लगातार ब्लास्टिंग से गांवों में डर का माहौल है, लेकिन कोई खुलकर माफिया के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं.

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कई जगह बिना अनुमति के ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से चेजा पत्थर निकाला जा रहा है. एक ट्रैक्टर चालक से पूछने पर पता चलता है कि किसी ठेकेदार ने भेजा है. जयपुर की गुर्जर की थड़ी तक माल पहुंचाना है. नाम और नंबर पूछते ही चालक मौके से भाग जाता है.

अलवर और दौसा में अरावली के सबसे गहरे घाव

जयपुर के बाद NDTV की टीम अलवर और दौसा पहुंचती है. यहां अरावली के घाव और भी गहरे नजर आते हैं. अलवर के घिघोली और गोलता इलाके में बड़े पैमाने पर अवैध खनन से पहाड़ पूरी तरह खत्म हो चुके हैं. रामगढ़, राजगढ़, लक्ष्मणगढ़, मालाखेड़ा और अलवर ग्रामीण क्षेत्रों में पहाड़ रातों-रात छलनी किए जा रहे हैं. कई जगह पचास फीट से ज्यादा गहरे गड्ढे बन चुके हैं.

दौसा जिले के मूही, जोनेटा और भावता गांवों में पहाड़ियों को कई फीट तक खोदा गया है. भावता में प्रेशर प्लांट के आसपास भी खनन जारी है. करनावर और सांवलिया जी धाम के पास खनन से प्राकृतिक संपदा और धार्मिक स्थलों का सौंदर्य प्रभावित हो रहा है.

आंकड़ों के पीछे छुपी सच्चाई

असल में खनन विभाग राजस्थान सरकार को सबसे अधिक राजस्व देने वाला विभाग है. पिछले वर्षों में वैध पट्टों की संख्या बढ़ी, लेकिन उसी आड़ में अवैध खनन कई गुना बढ़ गया. राजस्थान में कुल 16,116 खनन पट्टे हैं, जिनमें 10,060 सक्रिय हैं. करीब 18,000 क्वारी लाइसेंस जारी किए गए हैं. अरावली क्षेत्र में उदयपुर, राजसमंद, अलवर, सिरोही और भीलवाड़ा सबसे ज्यादा प्रभावित जिले हैं. हाल ही में 126 नए खनन पट्टों की अधिसूचना जारी हुई, जिनमें 50 पट्टे अरावली क्षेत्र के जिलों में हैं.

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'अरावली बचाओ मुहिम' कितनी कारगर?

अरावली बचाओ मुहिम के तहत सरकार ने 29 दिसंबर से 15 जनवरी तक विशेष अभियान शुरू किया है. बीस जिलों में जिला और ब्लॉक स्तर की समितियां बनाई गई हैं. जयपुर में कार्रवाई के दौरान दो एक्सकेवेटर मशीनों सहित 16 वाहन जब्त किए गए. लेकिन सवाल वही है जब हर रात धमाके हो रहे हैं और हजारों वाहन पत्थर लेकर निकल रहे हैं, तो क्या यह अभियान पर्याप्त है. असल में यह लड़ाई सिर्फ अरावली के पहाड़ों की नहीं है. यह लड़ाई पानी की है, पर्यावरण की है और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है.

अगर आज अरावली के ज़ख़्मों को नहीं देखा गया, तो कल ये पहाड़ इतिहास की किताबों में ही रह जाएंगे. ज़मीन पर बचेंगे तो बस गहरे गड्ढे, सूखी धरती और एक सवाल कि क्या हम समय रहते कुछ कर सकते थे.
 

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