- उत्तरकाशी के धराली में मलबे के सैलाब से पांच से अधिक लोगों की मौत और पचास से ज्यादा लापता हैं
- रेस्क्यू ऑपरेशन में मूवमेंट सेंसर, स्निफिंग डॉग्स और एडवांस पेनिट्रेटिंग रडार तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है
- हीट सेंसर जमीन के पंद्रह से बीस फीट नीचे जिंदा लोगों की सांस और हार्ट बीट का पता लगाते हैं
Uttarkashi Cloudburst: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली नाम की जगह पर मलबे के सैलाब ने तबाही मचा दी, अब तक साफ नहीं हो पाया है कि ये बादल फटने से हुआ या फिर ग्लेशियर लेक फटने से ये सैलाब नीचे की तरफ आया. इस हादसे में अब तक 5 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, वहीं 50 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं. ये तमाम लोग मलबे में दबे हैं, जिनकी तलाश पिछले चार दिनों से लगातार जारी है. रेस्क्यू ऑपरेशन को टीवी या फिर सोशल मीडिया पर देखने वाले लोगों के मन में कई तरह के सवाल हैं. जिनमें एक सवाल ये भी है कि जिस तकनीक की मदद से लोगों का पता लगाने की कोशिश हो रही है, वो आखिर कितनी कारगर है?
कैसे हो रही लापता लोगों की तलाश?
सबसे पहले ये जानते हैं कि धराली में लापता यानी मलबे में दबे लोगों की तलाश कैसे की जा रही है. इसके लिए कई तरह के उपकण इस्तेमाल हो रहे हैं, इसके अलावा सेना के स्निफिंग डॉग्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे सेंसर्स का इस्तेमाल हो रहा है, जो हीट और मूवमेंट से मलबे में दबे लोगों का पता लगाते हैं. इसके अलावा एडवांस पेनिट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल भी किया जा रहा है.
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हीट सेंसर वाले रेस्क्यू रडार: रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू होने के बाद ऐसे ही सेंसर्स का इस्तेमाल हुआ था, जिसमें हीट और मूवमेंट का पता लगाया जाता है. हालांकि ये सेंसर सिर्फ जिंदा लोगों का पता लगाने में सक्षम होते हैं. जमीन के 15 से 20 फीट नीचे तक ये हीट, ब्रीदिंग, हार्ट बीट और बाकी तरह की मूवमेंट को सेंस कर लेते हैं. हालांकि अब धराली में किसी के जिंदा होने की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी हैं, ऐसे में ये तकनीक ज्यादा कारगर नहीं रह गई है.
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स्निफिंग डॉग्स: कुत्तों में इंसानों की तुलना में सूंघने की शक्ति काफी ज्यादा होती है. ये कई किलोमीटर दूर से ही चीजों की गंध सूंघ लेते हैं और खतरे को भी भांप लेते हैं. ऐसे में धराली रेस्क्यू ऑपरेशन में स्निफिंग डॉग्स का भी इस्तेमाल हो रहा है. ये डॉग्स सेना या पुलिस के होते हैं और इन्हें सूंघने की ट्रेनिंग दी जाती है. आमतौर पर ऐसे कुत्ते 5 से 6 फीट गहराई में दबी किसी चीज या फिर डेड बॉडी को आसानी से सूंघ लेते हैं. यानी जो शव मलबे में ज्यादा गहराई तक नहीं दबे हैं, स्निफिंग डॉग्स केवल उन्हीं का पता लगा सकते हैं.
पेनिट्रेटिंग रडार सिस्टम: एडवांस पेनिट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल भी ऐसे ही रेस्क्यू ऑपरेशन में होता है. उत्तरकाशी के धराली में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है. ये सिस्टम डेड बॉडी का भी पता लगा सकता है. ये जमीन के नीचे एक हाई फ्रीक्वेंसी वेव भेजता है, जिससे मिट्टी, पत्थर, हड्डी और अन्य धातुओं की पहचान रंगों के जरिए की जाती है. इस तकनीक से 20 से 30 फीट नीचे तक दबी चीजों की पहचान की जा सकती है.
रेस्क्यू ऑपरेशन तक जगी है उम्मीद
धराली में जब तक रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है तब तक उन परिवारों की उम्मीदें जिंदा हैं, जिनके अपने मलबे में दबे हैं. उम्मीदें अब सिर्फ आखिरी बार चेहरा देखने की हैं, जो धीरे धीरे धूमिल होती जा रही हैं. करीब एक हफ्ते बाद लोगों को मृत घोषित कर दिया जाता है और इसके साथ ही रेस्क्यू ऑपेशन भी थम जाता है. उत्तराखंड के उत्तरकाशी में ही हुए एक ऐसे ही हादसे में 9 मजदूरों की मौत हो गई थी, जिनमें से सात मजदूरों का आज तक पता नहीं लग पाया है. साथ ही पहले भी ऐसे कई मामले देखे गए हैं.
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