- नवी मुंबई एयरपोर्ट का निर्माण 2007 में मंजूर हुआ था लेकिन मार्च 2015 तक उस पर कोई काम शुरू नहीं हो पाया था
- जम्मू-श्रीनगर रेलमार्ग का निर्माण 1994 में मंजूर हुआ था और 2014 तक केवल 40 प्रतिशत ही पूरा हुआ था
- प्रगति व्यवस्था के तहत अब तक 3000 से अधिक लटके प्रोजेक्ट की समस्याओं को दूर किया जा चुका है
पिछले महीने नवी मुंबई एयरपोर्ट से विमानों का परिचालन शुरू हो गया. इस एयरपोर्ट के निर्माण की अनुमति 2007 में दी गई थी जब केंद्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में काबिज थी. लेकिन आप शायद विश्वास नहीं करेंगे कि मार्च 2015 तक इस प्रोजेक्ट पर रत्ती भर भी काम नहीं हो सका और अगर इसी तरह से काम आगे बढ़ता तो नवी मुंबई एयरपोर्ट पर 2049 से पहले विमानों का आना जाना शुरू नहीं हो पाता.
यही हाल कमोबेश जम्मू-उधमपुर -श्रीनगर बारामूला रेलमार्ग का था. रणनीतिक तौर पर अहम इस रेल मार्ग के निर्माण की मंजूरी 31 मार्च 1994 को मिली थी. 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब तक इस प्रोजेक्ट का केवल 40 फ़ीसदी काम ही पूरा हो सका था. जिस धीमी रफ़्तार से इस प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था उससे इसे पूरा होने के लिए साल 2039 तक इंतजार करना पड़ता लेकिन इसे पिछले साल जून में ही शुरू कर दिया गया. अब दिल्ली से श्रीनगर तक की यात्रा ट्रेन से करना संभव हो गया है.
असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बोगोबिल रेल रोड ब्रिज प्रोजेक्ट को अनुमति तो मार्च 1997 में दी गई लेकिन 2015 तक उसपर 64 फ़ीसदी ही काम हो सका था और इस रफ़्तार से काम पूरा होते होते 2027 तक इंतजार करना पड़ सकता था लेकिन इसे 2018 में ही पूरा कर लिया गया. इस ब्रिज के बन जाने से असम से चीन सीमा तक जाने की दूरी और समय में काफ़ी कमी आ गई है.
PRAGATI: आखिर क्या है ये प्रगति?
अधर में लटके इन सभी प्रोजेक्ट को पूरा करना संभव हो पाया प्रगति ( PRAGATI : Pro-Active Governance and Timely Implementation ) नाम से शुरू की गई नई प्रशासनिक व्यवस्था से. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने मार्च 2015 में इस व्यवस्था की शुरुआत की जिसकी अबतक 50 बैठकें हो चुकी हैं. इसी हफ़्ते इसकी 50वीं बैठक हुई है. इस व्यवस्था के तहत शुरुआत में हर महीने के आखिरी बुधवार को खुद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में PRAGATI की बैठक होती थी. बैठक में देश के अलग अलग राज्यों में सालों से लटके ऐसे प्रोजेक्ट को पूरा करने में आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास होता और धीरे धीरे उन बाधाओं को दूर किया जाता ताकि प्रोजेक्ट को पूरा किया जा सके.
PRAGATI की बैठक के लिए पहले से ही उन प्रोजेक्ट की पहचान की जाती है जो सालों से किसी कारण से लटके पड़े हैं. फिर उसी के मुताबिक़ उन प्रोजेक्ट से जुड़े केंद्र सरकार के विभागों और राज्य सरकारों के अधिकारियों को बुलाया जाता है. चूंकि बैठक की अध्यक्षता खुद प्रधानमंत्री करते हैं इसलिए अफसरों की जवाबदेही काफ़ी बढ़ जाती है. इन बैठकों में उन्हीं प्रोजेक्ट को चुना जाता है जिसमें 500 करोड़ से ज्यादा पैसा खर्च होना होता है.

SWAGAT: स्वागत जैसी व्यवस्था का कमाल
सालों तक भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी खामी ये रही है कि सरकार राजनीतिक फ़ायदे के लिए बड़ी बड़ी परियोजनाओं का ऐलान तो कर देती हैं लेकिन वो केवल फाइलों तक सीमित रह जाता है. परियोजनाएं या तो धरातल पर उतर ही नहीं पाती हैं या फिर उन्हें पूरा करने में सालों लग जाते हैं जिसके चलते उसका खर्च अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है. इस हालत को बदलने के लिए नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मार्च 2015 में इस नई व्यवस्था की शुरू की.
कैबिनेट सचिव टी वी सोमनाथन के मुताबिक़ PRAGATI में अबतक 3000 से भी ज्यादा के लंबित पड़े प्रोजेक्ट की बाधाओं को दूर किया जा चुका है. इनमें से क़रीब 380 मामलों में सीधे प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया है. शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सोमनाथन ने बताया कि ऐसे प्रोजेक्ट को पूरा करने में सबसे बड़ी समस्या भूमि अधिग्रहण की आती है. उसके बाद पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के चलते भी प्रोजेक्ट लटके रहते हैं.
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