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यूपी मंत्रिमंडल विस्तार में गैर यादव और गैर जाटव जातियों का जोड़, माया और अखिलेश दोनों का एक साथ तोड़

बीजेपी ने हार से बड़ा सबक लिया है. रविवार को मंत्रिमंडल विस्तार में छह नए मंत्री शामिल किए, जबकि दो का प्रमोशन हुआ. इनमें एक ब्राह्मण को छोड़कर बाकी सात ओबीसी, अति पिछड़े और गैर जाटव अनुसूचित जाति से हैं.

यूपी मंत्रिमंडल विस्तार में गैर यादव और गैर जाटव जातियों का जोड़, माया और अखिलेश दोनों का एक साथ तोड़
  • योगी कैबिनेट विस्तार में गैर जाटव अनुसूचित जाति और गैर यादव ओबीसी को शामिल कर भाजपा ने राजनीतिक संतुलन साधा है
  • राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी 21 प्रतिशत है और इनमें जाटव समुदाय बहुजन समाज पार्टी का मजबूत वोट बैंक रहा है
  • 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के 'संविधान खतरे में' के प्रचार से भाजपा को नुकसान हुआ
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश में योगी कैबिनेट के विस्तार में कई राजनीतिक संदेश छुपे हैं. इनमें एक बड़ा संदेश यह भी है कि बीजेपी कैसे गैर जाटव अनुसूचित जाति और गैर यादव ओबीसी तबके को अपने साथ फिर से लाना चाह रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही बीजेपी ने इस रणनीति पर काम शुरू कर दिया था, जिसके अपेक्षित परिणाम भी पार्टी को मिले. लेकिन 2024 में अखिलेश यादव के 'पीडीए प्रयोग' और 'संविधान खतरे में' के नैरेटिव ने बीजेपी को नुकसान पहुंचाया. अखिलेश यादव ने गैर जाटव एससी और गैर यादव ओबीसी वोटों में सेंध लगाई थी. अब बीजेपी 2027 के चुनाव से पहले फिर से इन वोटों को एकजुट रखने में जुट गई है.

अगर अनुसूचित जाति की बात करें तो पूरे देश में उत्तर प्रदेश में एससी आबादी सबसे अधिक है. यही कारण है चुनाव परिणामों में एससी वोट निर्णायक होते हैं. राज्य में 21 प्रतिशत आबादी इसी वर्ग से है. विधानसभा की 403 में 84 और लोकसभा की 80 में से 17 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. इनके अलावा करीब 90 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां एससी वोट जीत-हार तय करने में बड़ा प्रभाव डालते हैं.

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अनुसूचित जाति के वोटों में बड़ी आबादी जाटवों की

अनुसूचित जाति के वोटों में बड़ी आबादी (50 प्रतिशत से अधिक) जाटवों की है, जो बहुजन समाज पार्टी के कट्टर वोट बैंक रहे हैं. तमाम उतार-चढ़ाव आने के बावजूद राज्य का जाटव वोट मायावती के साथ चट्टान की तरह आज भी खड़ा है. बीजेपी ने दलित वोटों को साथ लाने के लिए जाटवों के साथ ही बाकी उपजातियों जैसे पासी, कोईरी, वाल्मीकि, खटीक, गोंड आदि पर ध्यान केंद्रित किया. बीजेपी ने संगठन से लेकर सरकार में इन्हें महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व दिया. बेबी रानी मौर्य, असीम अरुण, गुलाब देवी, दिनेश खटीक आदि को मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया. इसी तरह पासी समाज के कौशल किशोर, कोरी समाज के भानुप्रताप वर्मा, गड़ेरिया समाज के एसपी सिंह बघेल आदि को बड़ी जिम्मेदारियां दी गईं. रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाना और लक्ष्मण आचार्य को राज्यपाल बनाना इसी रणनीति के तहत किया गया. पार्टी ने ब्रज से लेकर बुंदेलखंड तक हर क्षेत्र में दलित नेतृत्व तैयार किया और गैर जाटव दलितों की भागीदारी बढ़ाई.

बीजेपी को इसका लाभ भी मिला. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव तथा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को गैर जाटव अनुसूचित जाति के जमकर वोट मिले. CSDS के आंकड़ों के अनुसार 2014 में मोदी लहर में करीब 45% गैर-जाटव दलितों ने भाजपा को वोट दिया. राज्य की सभी 17 एससी सीटें बीजेपी की झोली में गई. इसी तरह 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गैर-जाटव वोटों का लगभग 58% हिस्सा हासिल किया. महत्वपूर्ण बात यह है कि जाटव वोटों का भी एक छोटा हिस्सा बीएसपी से भाजपा की ओर खिसका. राज्य की 84 आरक्षित सीटों में बीजेपी ने 70 से भी अधिक सीटें जीतकर बीएसपी और सपा का सूपड़ा साफ कर दिया.
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बीएसपी के कमजोर होने से सीधा फायदा बीजेपी को मिला

2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं, क्योंकि सपा और बसपा ने गठबंधन कर लिया था. इसके बावजूद बीजेपी अपने गैर जाटव वोट बैंक को बचाने में कामयाब रही. बीजेपी ने 17 में से 15 लोकसभा सीटें जीतीं. वहीं बीएसपी ने अपना जाटव आधार को बचाया. उसे दो सीटें मिलीं. इस बीच बीएसपी लगातार कमजोर होती गई, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलने लगा. 2022 विधानसभा चुनाव में बीएसपी के कमजोर होने से दलित वोटों का बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर तथा कुछ हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर गया. इस चुनाव में बीजेपी ने 84 में से 63 सीटें जीतीं, जबकि बीएसपी केवल एक सीट पर सिमट गई.

2024 में विपक्ष के 'संविधान खतरे में' नैरेटिव ने बीजेपी को पहुंचाया नुकसान

लेकिन बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में परेशानी आई. विपक्ष ने यह प्रचार किया कि बीजेपी अगर चार सौ सीटें ले आती है तो संविधान बदल कर आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा. इस कारण बड़ी संख्या में गैर जाटव और कुछ हद तक जाटव वोट इंडिया गठबंधन को मिल गया. बीजेपी को इसका नुकसान उठाना पड़ा. पार्टी 17 में से केवल 8 सीटें ही जीत सकी, जबकि सपा कांग्रेस गठबंधन को 9 सीटों पर कामयाबी मिली. सपा की जीत का यह आलम रहा कि जहां 2014 में वह एक भी आरक्षित सीट नहीं जीत पाई थी, वहीं 2024 में उसके पासी अनुसूचित जाति के उम्मीदवार अवधेश प्रसाद ने अयोध्या फैजाबाद की सामान्य सीट पर जीत हासिल कर सनसनी फैला दी. पासी समाज के आर के चौधरी, चिरायु समुदाय के पुष्पेंद्र सरोज, दरोगा प्रसाज सरोज और कोरी समाज के जीतेंद्र कुमार दोहरे, खरवार समुदाय के छोटेलाल जैसे नेताओं ने जीत हासिल की. 

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बीजेपी ने इस हार से बड़ा सबक लिया है. रविवार को मंत्रिमंडल विस्तार में छह नए मंत्री शामिल किए जबकि दो का प्रमोशन हुआ. इनमें एक ब्राह्मण को छोड़कर बाकी सात ओबीसी, अति पिछड़े और गैर जाटव अनुसूचित जाति से हैं. भूपेंद्र चौधरी जाट (ओबीसी), सोमेंद्र तोमर गुर्जर (ओबीसी), हंसराज विश्वकर्मा लोहार (अति पिछड़ा), कैलाश राजपूत लोध (ओबीसी), कृष्णा पासवान पासी (एससी), सुरेंद्र दिलेर वाल्मीकि (एससी) और अजीत पाल गड़ेरिया (एससी) बिरादरी से आते हैं.

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यह गैर जाटव एससी और गैर यादव ओबीसी वोटों को लामबंद करने की बड़ी कोशिश मानी जा रही है. बीजेपी के लिए यह कोशिश इसलिए भी जरूरी हो गई है, क्योंकि आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर का उभार दलित राजनीति में नए समीकरण बना रहा है. वे मायावती के जाटव वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं. युवा और आक्रामक दलितों में वे लोकप्रिय हो रहे हैं जो मायावती से ऊब चुके हैं. 2024 में उन्होंने नगीना लोकसभा सीट जीतकर साबित किया कि वे बीएसपी के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वे बीएसपी के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं और इस उभार ने पारंपरिक राजनीति करने वाले दलों को चौकन्ना कर दिया है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति एक ऐसे तिराहे पर खड़ी है जहां बीजेपी अपना जनाधार बचाने, सपा उसे छीनने और चंद्रशेखर नई राह बनाने में लगे हैं.

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लेखक के बारे में
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अखिलेश शर्मा
Executive Editor, NDTV India
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